भारत-अमेरिका व्यापार अंतिम चरण में, जानें कैसे हुआ मोल-भाव, क्या होगा शामिल और क्या बाहर?

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत तकरीबन पूरी हो चुकी है. भारत की तरफ से अमेरिका को एक व्यापक प्रस्ताव भेज दिया गया है. जानकारों का मानना है कि यह प्रस्ताव लगभग वैसा ही है, जैसा भारत और ब्रिटेन के बीच समझौता हुआ है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप Image Credit: money9live/Canva

भारत और अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक बढ़ाकर 500 अरब डॉलर तक ले जाना चाहते हैं. इसके लिए दोनों देश लंबे समय से एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) पर बात कर रहे हैं. हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के टैरिफ प्लान ने इस बातचीत को बीच में पटरी से उतार दिया था. लेकिन, बताया जा रहा है कि अब यह बातचीत पूरी हो चुकी है. बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत और अमेरिका के बीच ठीक उसी तर्ज पर व्यापार समझौता हो सकता है, जिस तरह का समझौता भारत और ब्रिटेन के बीच हुआ है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत ने अमेरिका को यूके-स्टाइल टोटलाइजेशन समझौते का प्रस्ताव दिया है, जिसने एक संभावित मिनी-ट्रेड पैकेज की उम्मीदें बढ़ा दी हैं. दोनों देशों के बीच सेवाओं, डिजिटल व्यापार, निवेश और आपसी मार्केट एक्सेस पर नए सिरे से बातचीत हो रही है. बहरहाल, सवाल यह है कि प्रस्तावित व्यापार ढांचा कैसा दिख सकता है, इसमें क्या शामिल होगा और किन संवेदनशील सेक्टरों को बाहर रखा जा सकता है.

टोटलाइजेशन समझौता

भारत का अमेरिका को दिया गया ताजा प्रस्ताव सामाजिक सुरक्षा पर दोहरी देनदारी से राहत देने पर केंद्रित है. यूके के साथ हुए समझौते के मॉडल के आधार पर भारत चाहता है कि अमेरिका में अस्थायी तौर पर काम करने वाले भारतीय कर्मचारियों और उनके नियोक्ताओं को दोहरी सोशल सिक्योरिटी देनदारी से छूट मिले. यह समझौता एक उपलब्धि वाला शुरुआती कदम हो सकता है, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापक व्यापार पैकेज की नींव तैयार होगी। IT और सेवाओं के व्यापार में लगे भारतीय पेशेवरों के लिए यह बड़ा राहत कदम साबित होगा.

क्या-क्या हो सकता है शामिल?

रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से दावा किया गया है कि भारत और अमेरिका एक मिनी ट्रेड पैकेज या फ्रेमवर्क डील की ओर बढ़ रहे हैं. इसमें कई बड़े सेक्टरों पर रजामंदी हो सकती है.

1. सेवाओं का व्यापार : भारत की प्राथमिकता साफ है. भारत दोनों देशों के बीच पेशेवरों की आवाजाही को आसान चाहता है. इसके लिए भारत चाहता है H-1B व L-1 वीजा प्रक्रियाओं को सहज किया जाए और टेक कंपनियों के लिए ऑपरेशनल खर्च कम करना जरूरी है. माना जा रहा है कि अमेरिका भी भारतीय IT-सेवाओं पर अपनी निर्भरता को देखते हुए इस क्षेत्र में लचीलापन दिखा सकता है.
2. डिजिटल ट्रेड और डाटा फ्लो : इस समझौते में दोनों देशों के बीच सुरक्षित डाटा ट्रांसफर, क्लाउड सर्विसेज, डिजिटल पेमेंट इंटरऑपरेबिलिटी जैसे मुद्दे शामिल हो सकते हैं. अमेरिका चाहता है कि डिजिटल बाजारों में पारदर्शी नियम हों, जबकि भारत डाटा सुरक्षा को प्राथमिकता देता है. यहां एक संतुलित ढांचा उभर सकता है.
3. मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन : अमेरिकी कांग्रेस का CHIPS Act चीन के लिए जहां बाधक है. वहीं, इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन में अमेरिका भारत को एक भरोसेमंद सहयोगी के रूप में देख रहा है. ऐसे में BTA के तहत दोनों देशों सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, EV, क्रिटिकल मिनरल्स और क्लीन-टेक के क्षेत्र में सहयोग को गहरा कर सकते
4. निवेश और मार्केट एक्सेस : अमेरिका चाहता है कि मेडिकल डिवाइस, ई-कॉमर्स और एग्री-बिजनेस सेक्टरों में भारत ज्यादा मार्केट एक्सेस दे. वहीं भारत चाहता है कि अमेरिकी निवेश में वृद्धि हो, टेक ट्रांसफर बढ़े और जॉइंट वेंचर्स को बढ़ावा दिया जाए, ताकि भारत में इकोनॉमिक ग्रोथ को सपोर्ट मिले.

किन सेक्टरों को बाहर रखा जाएगा बाहर?

भारत ने बातचीत के हर स्तर पर अमेरिका को साफ किया है कि कुछ ऐसे संवेदनशील मुद्दे ऐसे हैं, जिन्हें इस व्यापार पैकेज में शामिल नहीं किया जा सकता है. इसके लिए भारत ने अपनी वजहें भी बताई हैं. भारत के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ढांचे को देखते हुए भारत के लिए इन क्षेत्रों को अमेरिका जैसी ताकत के लिए खोलना डिसरप्टिव हो सकता है. लिहाजा, भारत इन क्षेत्रों को समझौते से बाहर रखना चाहता है.

1. कृषि : अमेरिका कृषि बाजार में अधिक पैठ चाहता है, लेकिन भारत WTO पॉलिसियों, MSP और घरेलू किसानों की सुरक्षा के चलते इस क्षेत्र में ढील देने के लिए तैयार नहीं है.
2. टैरिफ कटौती : अमेरिका कई सामानों पर कम टैरिफ चाहता है, जबकि भारत टैरिफ रियायतों को लेकर सतर्क है. इसलिए टैरिफ नेगोशिएशन फिलहाल इस समझौते के दायरे से बाहर रह सकती है.
3. IPR और पेटेंट नियम: अमेरिका का कड़ा IPR रुख भारत के फार्मा सेक्टर के अनुकूल नहीं है. ऐसे में इस हिस्से को फिलहाल समझौत से अलग रखा जा सकता है.

राजनीतिक हालात का दबाव

दोनों देशों की सरकार पर इस बात का दबाव है कि वे जल्द समझौता करें. एक तरफ जहां बिजनेस और कॉर्पोरेट्स लॉबी दोनों सरकारों पर दबाव बना रही है कि समझौता जल्द किया जाए. वहीं, राजनीतिक हालात भी यह दबाव बढ़ा रहे हैं कि जल्द कोई सौदा हो, ताकि दोनों देशों के बीच सहजता आए. टोटलाइजेशन समझौता इसकी शुरुआत का सबसे मजबूत आधार बनकर उभर रहा है. सेवाओं, डिजिटल ट्रेड और सप्लाई चेन सहयोग जैसे क्षेत्रों में तेजी से प्रगति की उम्मीद है, जबकि कृषि, टैरिफ और IPR जैसे विवादित सेक्टर फिलहाल बाहर रहेंगे. यह मॉडल दोनों देशों को राजनीतिक और आर्थिक रूप से लाभ देने वाला संतुलित व्यापार ढांचा प्रदान कर सकता है.

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