भारत बना सकता है 15 करोड़ बैरल तेल का भंडार, चीन मॉडल अपनाने पर सरकार कर रही विचार
ईरान युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ते खतरे के बीच भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए चीन की तर्ज पर बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है. सरकार रिफाइनर्स के लिए 30 दिनों के कच्चे तेल का अतिरिक्त भंडार अनिवार्य करने पर विचार कर रही है, जिससे कंपनियों पर करीब 60,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है.
ईरान युद्ध के चलते खड़ी हुई वैश्विक दिक्कतों और होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के कगार पर पहुंचने से भारत सरकार की नींद उड़ गई है. खाड़ी देशों से नजदीकी के भरोसे निश्चिंत रहने वाला भारत अब अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है. ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार चीन की तर्ज पर एक ऐसी नीति लाने पर विचार कर रही है, जिसके तहत घरेलू रिफाइनिंग कंपनियों के लिए कच्चे तेल का एक बहुत बड़ा स्टॉक रखना अनिवार्य हो जाएगा.
वर्तमान व्यवस्था और नया प्रस्ताव
अभी भारतीय रिफाइनर्स अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए करीब 15 दिनों का क्रूड ऑयल स्टॉक रखते हैं. लेकिन नया प्रस्ताव इस मौजूदा स्टॉक के अतिरिक्त होगा. इसके तहत रिफाइनर्स को अपनी इन्वेंट्री दोगुनी करके करीब 30 दिनों की राष्ट्रीय मांग के बराबर करनी होगी. भारत की प्रतिदिन की 50 लाख बैरल की खपत को देखते हुए, कंपनियों को कुल मिलाकर 15 करोड़ बैरल कच्चे तेल का स्टॉक बनाए रखना होगा. हालांकि, यह योजना अभी शुरुआती दौर में है और इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है.
रिफाइनिंग कंपनियों पर पड़ेगा भारी बोझ
इस योजना को लागू करना इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि तेल कंपनियां इसका कड़ा विरोध कर सकती हैं.
- कच्चे तेल की खरीद: मौजूदा कीमतों और विनिमय दरों के हिसाब से स्टॉक को दोगुना करने के लिए कंपनियों को सिर्फ तेल खरीदने पर ही करीब 60,000 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे.
- स्टोरेज का ढांचा: 15 करोड़ बैरल तेल रखने के लिए नए स्टोरेज टैंक बनाने होंगे. इसमें कई हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त निवेश लगेगा और इस बुनियादी ढांचे को तैयार होने में सालों का वक्त लग सकता है.
कंपनियों की मांग- मिले छूट और ट्रेडिंग की आजादी
रिपोर्ट के मुताबिक, जानकारों का कहना है कि अगर यह नीति लागू होती है, तो रिफाइनर्स सरकार से कुछ ढील मांग सकते हैं. कंपनियों की चाहत होगी कि उन्हें स्टोरेज टैंक बनाने की जगह चुनने और उस तेल को बेचने या ट्रेड करने की आजादी मिले. विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार को सिंगापुर की तरह बंदरगाहों के पास स्टोरेज बनाने को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर इस स्टॉक को अंतरराष्ट्रीय बाजार में आसानी से ट्रेड किया जा सके. बड़े स्टॉक की वजह से ही चीन को हाल ही में कीमतें बढ़ने पर अपने तेल आयात में भारी कटौती करने की सहूलियत मिली थी.
रणनीतिक भंडार के मामले में भारत काफी पीछे
अमेरिका की एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) के आंकड़ों के मुताबिक, रणनीतिक तेल भंडार के मामले में भारत दुनिया के बाकी बड़े देशों से बेहद पीछे है. साल 2025 के अंत तक के आंकड़े बताते हैं कि:
- चीन: 1,397 मिलियन बैरल
- अमेरिका: 413 million barrels
- जापान: 263 million barrels
- दक्षिण कोरिया: 79 million barrels
- भारत: महज 21 मिलियन बैरल
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चीन के पास इस समय 1,397 मिलियन बैरल का विशाल स्टॉक है. इस भंडार का फायदा चीन यह उठाता है कि जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अचानक बहुत बढ़ती हैं, तो चीन बाहर से तेल खरीदना बंद या बेहद कम कर देता है और अपने इस रिजर्व स्टॉक का इस्तेमाल करने लगता है. भारत भी कंपनियों के जरिए अपने स्टॉक को 15 करोड़ बैरल तक पहुंचाकर यही ताकत हासिल करना चाहता है, ताकि भविष्य में युद्ध या संकट के समय उसे महंगे दामों पर तेल न खरीदना पड़े. भविष्य के किसी भी बड़े संकट से बचने के लिए भारत को अपने कदम भी तेजी से आगे बढ़ाने होंगे.
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