भारत बना रक्षा बाजार का नया सुपरस्टार! सस्ती मिसाइलों पर दुनिया की नजर
भारत की आकाश, पिनाका, ब्रह्मोस और अन्य मिसाइल प्रणालियां कम कीमत, दमदार प्रदर्शन और बढ़ती वैश्विक विश्वसनीयता के दम पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी से जगह बना रही हैं. रक्षा निर्यात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है और कई देशों से नए ऑर्डर मिल रहे हैं.
Highlights
- पश्चिमी हथियारों से पचास प्रतिशत तक सस्ती
- ब्रह्मोस, आकाश की वैश्विक मांग लगातार बढ़ी
- रक्षा निर्यात ने बनाया नया रिकॉर्ड स्तर
भारत की मिसाइल और रॉकेट सिस्टम अब दुनिया के रक्षा बाजार में तेजी से अपनी पहचान बना रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह है कम कीमत, युद्ध में साबित हो चुकी क्षमता और पहले के मुकाबले ज्यादा आसान रक्षा निर्यात नीति. यही कारण है कि अब भारत के आकाश, पिनाका, ब्रह्मोस और नागास्त्र जैसे हथियार एशिया, अफ्रीका और मध्य-पूर्व के कई देशों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं.
कम कीमत, दमदार प्रदर्शन
आज के समय में रक्षा उपकरण खरीदते वक्त सिर्फ ताकत ही नहीं, बल्कि कीमत भी बड़ा मुद्दा होती है. भारत के कई मिसाइल और रॉकेट सिस्टम पश्चिमी देशों के समान हथियारों के मुकाबले 20% से 50% तक सस्ते हैं. यही वजह है कि कम बजट वाले देश भी इन्हें खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं. Kotak Institutional Equities की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की कम मैन्युफैक्चरिंग लागत और सरकारी समर्थन ने भारतीय रक्षा उत्पादों को वैश्विक बाजार में ज्यादा प्रतिस्पर्धी बना दिया है.
आकाश मिसाइल बनी मजबूत विकल्प
भारत की आकाश एयर डिफेंस मिसाइल की कीमत करीब 5 लाख डॉलर प्रति मिसाइल बताई जाती है, जबकि अमेरिका की NASAMS मिसाइल की कीमत 8 से 10 लाख डॉलर प्रति मिसाइल है. कम कीमत के बावजूद आकाश आधुनिक हवाई सुरक्षा देने में सक्षम है, इसलिए कई देशों की नजर इस पर है.
‘प्रोजेक्ट कुशा’ भी होगा सस्ता
भारत लंबी दूरी की एयर डिफेंस प्रणाली प्रोजेक्ट कुशा पर भी काम कर रहा है. इसे रूस के S-400 का कम लागत वाला विकल्प माना जा रहा है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुशा की पांच स्क्वाड्रन पर करीब 21,700 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं, जबकि भारत ने 2018 में रूस से पांच S-400 स्क्वाड्रन खरीदने के लिए करीब 45,000 करोड़ रुपये खर्च किए थे.
ब्रह्मोस की ताकत कीमत से ज्यादा अहम
हालांकि ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल पश्चिमी देशों की कुछ मिसाइलों से सस्ती नहीं है, लेकिन इसकी रफ्तार, सटीक निशाना और मारक क्षमता इसे बेहद खास बनाती है. इसकी कीमत करीब 30 से 50 लाख डॉलर प्रति मिसाइल है, जबकि अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल की कीमत लगभग 15 से 20 लाख डॉलर बताई जाती है. इसके बावजूद कई देश इसकी क्षमता के कारण इसे खरीदना चाहते हैं.
पिनाका और नागास्त्र भी बने पसंद
भारत का पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट सिस्टम अमेरिकी HIMARS के मुकाबले काफी सस्ता है. वहीं नागास्त्र-1 लोइटरिंग म्यूनिशन ने ऑपरेशन सिंदूर (मई 2025) के दौरान अपनी क्षमता साबित की, जिससे इसकी वैश्विक मांग भी बढ़ी है. इसी तरह नाग और हेलीना एंटी-टैंक मिसाइलें भी अमेरिकी Hellfire मिसाइल के मुकाबले करीब आधी कीमत पर उपलब्ध हैं.
ड्रोन और रडार में भी बढ़ रही पकड़
भारत सिर्फ मिसाइल ही नहीं, बल्कि ड्रोन और रडार सिस्टम के क्षेत्र में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है. DRDO और BEL का Archer SRUAV तुर्किये के Bayraktar TB2 का किफायती विकल्प माना जा रहा है. वहीं BEL का स्वाति वेपन लोकेटिंग रडार अमेरिकी Firefinder सिस्टम के मुकाबले 40% से 60% तक सस्ता है. आर्मेनिया इस रडार के चार यूनिट खरीद चुका है और आगे भी खरीदारी की संभावना है.
दुनिया भर में बढ़ रही भारतीय हथियारों की मांग
भारत की सबसे बड़ी सफलता ब्रह्मोस मिसाइल रही है. फिलीपींस इसके लिए करीब 375 मिलियन डॉलर का सौदा कर चुका है. वियतनाम भी अनुबंध पर हस्ताक्षर कर चुका है, जबकि इंडोनेशिया खरीद प्रक्रिया में आगे बढ़ रहा है. इसके अलावा यूएई, मिस्र, बेलारूस, मलेशिया, थाईलैंड और ब्राजील जैसे कई देशों ने भी रुचि दिखाई है. आकाश मिसाइल और पिनाका रॉकेट सिस्टम के लिए भी आर्मेनिया समेत कई देशों ने ऑर्डर दिए हैं या रुचि जताई है.
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा रक्षा निर्यात
भारत का रक्षा निर्यात लगातार नई ऊंचाइयों पर पहुंच रहा है. वित्त वर्ष 2025-26 में देश का रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. सरकार का अनुमान है कि FY29 तक यह 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. अमेरिका भारत का सबसे बड़ा रक्षा निर्यात बाजार बना हुआ है, जहां भारतीय कंपनियां Boeing और Lockheed Martin जैसी कंपनियों की सप्लाई चेन के लिए हाई-वैल्यू पार्ट्स और सिस्टम उपलब्ध करा रही हैं.
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