बंटवारे में मुकेश अंबानी के हाथ से निकल गया था टेलीकॉम कारोबार, फिर कैसे हुई जियो की शुरुआत; आज बन गया रिकॉर्ड
RIL Jio Listing: जियो ने बुधवार 28 अक्टूबर को अपनी सफलता का एक और नया अध्याय लिखा है. जियो प्लेटफॉर्म्स ने शेयर बाजार में एंट्री की है. 2005 में पारिवारिक बंटवारे के बाद मुकेश अंबानी को रिलायंस का टेलीकॉम कारोबार छोड़ना पड़ा था. फिर 2016 में रिलायंस जियो की शुरुआत ने भारतीय टेलीकॉम बाजार की तस्वीर बदल दी.
Highlights
- पारिवारिक बंटवारे के बाद मुकेश अंबानी को रिलायंस का टेलीकॉम कारोबार छोड़ना पड़ा था.
- जून 2010 में रिलायंस इंडस्ट्रीज ने इन्फोटेल ब्रॉडबैंड सर्विसेज में 95% हिस्सेदारी हासिल की.
- जियो ने मुफ्त कॉलिंग और सस्ते डेटा के जरिए इस बिजनेस मॉडल को चुनौती दी.
RIL Jio Listing: साल 2010 का था. रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने टेलीकॉम सेक्टर के दिग्गज महेंद्र नाहटा से ‘इन्फोटेल ब्रॉडबैंड’ का अधिग्रहण किया था. इस कंपनी के पास पूरे भारत के 22 जोनों में ब्रॉडबैंड स्पेक्ट्रम था. यह अधिग्रहण एक ऐसी नींव बनने वाला था, जहां से अंबानी अपना अगला टेलीकॉम दांव खेलने वाले थे. यह दांव 2002 में बहुत ही कम कीमतों पर मोबाइल सर्विस शुरू करने से भी कहीं अधिक बड़ा और क्रांतिकारी होने वाला था.
मुकेश अंबानी ने रणनीति को तैयार करने के लिए अपने करीबी सहयोगी मनोज मोदी के साथ मिलकर मंथन किया. उन्हें अपना विजन समझाया. मनोज मोदी को दो मुख्य बातों पर ध्यान देना था. पहली, अत्याधुनिक तकनीक हासिल करना और दूसरी, रिलायंस इन्फोकॉम के उन पुराने अनुभवी साथियों को फिर से एक साथ लाना, जिन्होंने उस समय मोबाइल सर्विस को इतना सस्ता बना दिया था कि वह पोस्टकार्ड भेजने से भी सस्ता हो गया था.
6 साल बाद जियो का धमाका
इसके बाद अगले छह वर्षों में जो कुछ हुआ, वह उस चीज की शुरुआती जद्दोजहद थी, जिसे अंबानी दुनिया का सबसे बड़ा स्टार्टअप कहते रहे हैं. इसी प्रक्रिया से रिलायंस जियो का जन्म हुआ, जो टेलीकॉम इंडस्ट्री में अंबानी की दूसरी पारी है. साल 2016 में जियो को लॉन्च किया गया और फिर इसने तेजी से पूरे बाजार में अपने पैर पसार दिए.
मुकेश अंबानी टेलीकॉम में वापसी की कहानी
भारतीय टेलीकॉम सेक्टर में रिलायंस जियो की कहानी सिर्फ एक नई कंपनी के लॉन्च की कहानी नहीं रही है. यह एक ऐसे कारोबारी की वापसी की कहानी भी है, जिसने पारिवारिक बंटवारे में अपना बनाया हुआ टेलीकॉम कारोबार खो दिया, लेकिन बाद में उसी क्षेत्र में नई तकनीक और अलग बिजनेस मॉडल के साथ दोबारा कदम रखा.
जियो की शुरुआत को समझने के लिए 2016 की उसकी लॉन्चिंग से भी पीछे जाना होगा. कहानी शुरू होती है धीरूभाई अंबानी के उस सपने से, जिसमें मोबाइल फोन और कॉम्युनिकेशन सर्विसेज को आम भारतीयों तक कम कीमत पर पहुंचाना था. फिर आया 2005 का पारिवारिक बंटवारा, जिसने मुकेश और अनिल अंबानी के कारोबारी रास्ते अलग कर दिए.
साल 2005 में पारिवारिक बंटवारे के बाद मुकेश अंबानी को रिलायंस का टेलीकॉम कारोबार छोड़ना पड़ा था. करीब पांच साल बाद उन्होंने एक नए रास्ते से इस सेक्टर में वापसी की थी और 2016 में रिलायंस जियो की शुरुआत ने भारतीय टेलीकॉम बाजार की तस्वीर बदल दी.
जब मुकेश अंबानी ने टेलीकॉम की दुनिया में कदम रखा
रिलायंस की टेलीकॉम कहानी की शुरुआत 2002 में हुई. धीरूभाई अंबानी के निधन के बाद मुकेश अंबानी की अगुवाई में रिलायंस इन्फोकॉम ने मोबाइल टेलीकॉम कारोबार को आगे बढ़ाया. कंपनी ने सीडीएमए (CDMA) तकनीक के जरिए कम लागत पर वायरलेस संचार सेवाएं उपलब्ध कराने की कोशिश की.
उस समय मोबाइल फोन इस्तेमाल करना आज की तुलना में काफी महंगा था. रिलायंस ने कम कीमत वाले हैंडसेट, आकर्षक टैरिफ और बड़े पैमाने पर नेटवर्क विस्तार के जरिए बाजार में अपनी जगह बनाई. कंपनी का लक्ष्य मोबाइल कॉम्युनिकेशन को सीमित आय वर्ग के लोगों तक भी पहुंचाना था.
दिसंबर 2003 में रिलायंस इन्फोकॉम की सेवाओं की शुरुआत के साथ कंपनी ने आक्रामक विस्तार किया. यह कारोबार मुकेश अंबानी के लिए सिर्फ एक नया बिजनेस भर नहीं था, बल्कि भारतीय टेलीकॉम बाजार में बड़े पैमाने पर बदलाव लाने की महत्वाकांक्षा का भी हिस्सा था.
बंटवारे में अनिल अंबानी के पास गया टेलीकॉम कारोबार
मुकेश अंबानी की टेलीकॉम यात्रा में सबसे बड़ा मोड़ जून 2005 में आया. धीरूभाई अंबानी के निधन के बाद दोनों भाइयों के बीच कारोबारी साम्राज्य के नियंत्रण को लेकर विवाद बढ़ा. आखिरकार उनकी मां कोकिलाबेन अंबानी की मध्यस्थता में परिवार के कारोबार का बंटवारा हुआ.
इस समझौते के तहत मुकेश अंबानी के पास रिलायंस इंडस्ट्रीज का मुख्य कारोबार आया, जिसमें तेल, रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल्स जैसे सेक्टर्स शामिल थे. वहीं, टेलीकॉम, पावर, फाइनेंशियल सर्विसेज और मनोरंजन से जुड़े कारोबार अनिल अंबानी के हिस्से में गए. रिलायंस इन्फोकॉम बाद में रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCom) के नाम से जानी गई.
यह बंटवारा मुकेश अंबानी के लिए इसलिए भी अहम था, क्योंकि रिलायंस इन्फोकॉम की शुरुआत और विस्तार में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी. लेकिन अब उन्हें टेलीकॉम कारोबार से अलग होना पड़ा.
नॉन-कम्पीट समझौते ने भी रोका रास्ता
बंटवारे के बाद दोनों भाइयों के बीच हुए समझौते में नॉन-कम्पीट शर्त भी शामिल थी. इसका मतलब था कि दोनों भाई अपने-अपने कारोबारी समूहों के बंटवारे के बाद कुछ तय क्षेत्रों में एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी कारोबार में प्रवेश नहीं करेंगे. इसी शर्त के कारण मुकेश अंबानी के लिए टेलीकॉम सेक्टर में दोबारा उतरने का रास्ता सीमित हो गया था.
इस तरह मुकेश अंबानी को उस कारोबार से बाहर होना पड़ा, जिसे उन्होंने भारतीय बाजार में कम कीमत पर मोबाइल सेवाएं पहुंचाने के उद्देश्य से तैयार किया था. लेकिन टेलीकॉम से उनका रिश्ता खत्म नहीं हुआ.
जियो की नींव रखने वाला बड़ा कदम
करीब पांच साल बाद परिस्थितियां बदलीं. मई 2010 में सुप्रीम कोर्ट के गैस आपूर्ति विवाद पर फैसले के बाद दोनों भाइयों के बीच कारोबारी संबंधों में एक नया मोड़ आया. उसी वर्ष पुरानी नॉन-कम्पीट शर्त हटाने पर सहमति बनी, जिससे दोनों समूहों के लिए एक-दूसरे के कारोबारी क्षेत्रों में प्रवेश का रास्ता खुला.
23 मई 2010 को दोनों समूहों ने पुराने नॉन-कम्पीट समझौतों को रद्द कर दिया और नया समझौता किया, जिसमें मुख्य प्रतिबंध गैस आधारित बिजली उत्पादन तक सीमित रह गया.
मुकेश अंबानी ने किया मौके का इस्तेमाल
मुकेश अंबानी ने इसी मौके का इस्तेमाल टेलीकॉम में वापसी के लिए किया. जून 2010 में रिलायंस इंडस्ट्रीज ने इन्फोटेल ब्रॉडबैंड सर्विसेज में 95% हिस्सेदारी हासिल की. इन्फोटेल ने 2010 की ब्रॉडबैंड स्पेक्ट्रम नीलामी में देश के सभी 22 टेलीकॉम सर्किलों में ब्रॉडबैंड वायरलेस एक्सेस स्पेक्ट्रम हासिल किया था. यही अधिग्रहण आगे चलकर जियो की नींव बना.
यहां मुकेश अंबानी ने पुराने कारोबार को वापस लेने के बजाय नए सिरे से टेलीकॉम नेटवर्क खड़ा करने का रास्ता चुना. उनका फोकस सिर्फ मोबाइल कॉलिंग नहीं, बल्कि हाई-स्पीड इंटरनेट और डेटा सेवाओं पर था.
इन्फोटेल ब्रॉडबैंड का अधिग्रहण करने के बाद रिलायंस ने अपने टेलीकॉम कारोबार को नए स्वरूप में विकसित करना शुरू किया. जनवरी 2013 में इन्फोटेल का नाम बदलकर रिलायंस जियो इन्फोकॉम लिमिटेड कर दिया गया.
मार्केट की डिमांड को समझा
इस बार कंपनी की रणनीति पुराने सीडीएमए मॉडल को दोहराने की नहीं थी. इंडिया टुडे के अनुसार, अंबानी जानते थे कि जो पीढ़ी 24×7 सोशल मीडिया और जानकारी तक पहुंचने की आदी हो चुकी है, उसके लिए एक सस्ती और मजबूत सर्विस को नजरअंदाज करना नामुमकिन होगा. लेकिन, पिछली गलतियों से सबक लेते हुए, वे उन गलतियों को नहीं दोहराना चाहते थे जिनकी वजह से ‘इन्फो कॉम’ (Infocomm) को भारी असफलता झेलनी पड़ी थी.
टेक्नोलॉजी में किया भारी निवेश
इसलिए, उन्होंने भविष्य की तकनीक लॉन्ग-टर्म इवोल्यूशन (LTE) में भारी निवेश किया. उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि बैक-अप इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह से तैयार हो. साथ ही, उन्होंने ताइवान की फॉक्सकॉन (Foxconn) जैसी कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के साथ मिलकर ऐसे डिवाइस तैयार करवाए, जो सस्ते, हल्के और इस्तेमाल करने में आसान हों.
सबसे अहम बात, उन्होंने एक ऐसा टैरिफ प्लान पेश किया जिसे ठुकराना मुश्किल था. इसमें वॉयस कॉल हमेशा के लिए मुफ्त थीं और डेटा भी काफी सस्ता था. मुफ्त चीजों की दीवानी और कीमत को लेकर बहुत संवेदनशील भारतीय बाजार में, यह प्लान एक बेहतरीन विकल्प साबित हुआ.
फ्री कॉलिंग और सस्ते डेटा से बदल गया बाजार
रिलायंस जियो ने दिसंबर 2015 में अपनी सेवाओं का शुरुआती प्रदर्शन किया और सितंबर 2016 में कमर्शियल सेवाएं लॉन्च कीं. कंपनी ने ग्राहकों को शुरुआती ऑफर में मुफ्त वॉयस कॉलिंग और बेहद कम कीमत पर डेटा उपलब्ध कराया. उस समय टेलीकॉम कंपनियों की कमाई का बड़ा हिस्सा वॉयस कॉल से आता था.
जियो ने मुफ्त कॉलिंग और सस्ते डेटा के जरिए इस बिजनेस मॉडल को चुनौती दी. इससे प्रतिस्पर्धी कंपनियों पर भी अपने टैरिफ और नेटवर्क रणनीति में बदलाव करने का दबाव पड़ा.
भारतीय बाजार में तेजी से बढ़ी डेटा की खपत
जियो के आने के बाद भारतीय बाजार में डेटा की खपत तेजी से बढ़ी. स्मार्टफोन, वीडियो स्ट्रीमिंग, डिजिटल पेमेंट, सोशल मीडिया और ऑनलाइन सेवाओं का इस्तेमाल व्यापक हुआ. जियो ने आगे चलकर अपनी सेवाओं को केवल मोबाइल कनेक्टिविटी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म और अन्य सेवाओं तक विस्तार किया.
टेलीकॉम से डिजिटल सर्विसेज तक
मुकेश अंबानी ने 2016 में जब रिलायंस जियो लॉन्च किया था, तब कंपनी का सबसे बड़ा दांव सस्ता इंटरनेट और मुफ्त वॉयस कॉलिंग था. आज जियो सिर्फ मोबाइल नेटवर्क कंपनी नहीं, बल्कि भारत के डिजिटल इकोसिस्टम की बड़ी कंपनियों में शामिल है. इसका कारोबार मोबाइल कनेक्टिविटी, 5G, घरों के ब्रॉडबैंड, क्लाउड और डिजिटल सेवाओं तक फैला हुआ है.
जियो की सफलता का पैमाना उसके ग्राहकों की संख्या, कमाई, नेटवर्क पर इस्तेमाल होने वाले डेटा और बाजार में उसकी स्थिति से समझा जा सकता है. रिलायंस इंडस्ट्रीज की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, 31 मार्च 2026 तक रिलायंस जियो इन्फोकॉम के ग्राहक 52.44 करोड़ थे. जून 2026 की तिमाही के अंत तक यह संख्या बढ़कर 53.33 करोड़ हो गई.
सफलता का नया अध्याय
जियो ने बुधवार 28 अक्टूबर को अपनी सफलता का एक और नया अध्याय लिखा है. जियो प्लेटफॉर्म्स ने शेयर बाजार में एंट्री की है. जियो का IPO 22.19 गुना सब्सक्राइब हुआ था. लिस्टिंग के समय कंपनी भारतीय शेयर बाजार की मार्केट कैप के लिहाज से दूसरी सबसे वैल्यूएबल लिस्टेड कंपनी बन गई. यह सिर्फ अपनी पैरेंट कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज से पीछे थी. इसने भारती एयरटेल को पीछे छोड़ दिया.
जियो ने भारत में इंटरनेट की पहुंच, डेटा की खपत और टेलीकॉम कारोबार के बिजनेस मॉडल को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है. अब अगली चुनौती इस पैमाने को लंबे समय तक टिकाऊ मुनाफे और नई डिजिटल सेवाओं को ग्रोथ में बदलने की होगी.
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