युद्ध से तबाह सऊदी-कतर-खाड़ी देशों का तेल इंफ्रा, $60 बिलियन की चोट, दुनिया में सप्लाई संकट का खतरा
खाड़ी देशों में ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को करीब 58 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है. यह आंकड़ा पहले के अनुमान से दोगुना है. असली नुकसान इससे भी ज्यादा हो सकता है क्योंकि अभी पूरी जानकारी सामने नहीं आई है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के मुताबिक, 80 से ज्यादा तेल और गैस सुविधाएं इस संघर्ष में प्रभावित हुई हैं.

Oil Infrastructure Damage: वेस्ट एशिया में चल रहे तनाव और युद्ध का असर अब साफ तौर पर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दिखने लगा है. तेल और गैस जैसे जरूरी संसाधनों के बड़े केंद्र इस क्षेत्र में स्थित हैं, और हालिया हमलों ने इनकी सप्लाई को गंभीर खतरे में डाल दिया है. अब सामने आई रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस युद्ध में ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान हुआ है, जिसकी मरम्मत पर अरबों डॉलर खर्च होने वाले हैं.
यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं है, बल्कि इससे दुनिया भर में तेल और गैस की सप्लाई भी प्रभावित होगी. इससे आने वाले समय में कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है. ऐसे में यह संकट सिर्फ वेस्ट एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.
$60 बिलियन तक पहुंचा नुकसान
CNBC की एक रिपोर्ट के अनुसार, खाड़ी देशों में ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को करीब 58 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है. यह आंकड़ा पहले के अनुमान से दोगुना है. असली नुकसान इससे भी ज्यादा हो सकता है क्योंकि अभी पूरी जानकारी सामने नहीं आई है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के मुताबिक, 80 से ज्यादा तेल और गैस सुविधाएं इस संघर्ष में प्रभावित हुई हैं. इनमें से कई प्लांट इतने ज्यादा खराब हो चुके हैं कि उन्हें ठीक करने में कई साल लग सकते हैं.
सबसे ज्यादा नुकसान किसे हुआ
ईरान को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है, जहां मरम्मत की लागत करीब 19 अरब डॉलर आंकी गई है. इसके अलावा कतर के बड़े गैस प्रोजेक्ट को भी नुकसान पहुंचा है, जिससे वहां प्रोडक्शन प्रभावित हुआ है और रेवेन्यू में भी गिरावट आई है. मरम्मत के लिए जरूरी उपकरण और स्किल लेबर की कमी है. इससे वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ेगा. पहले से ही कई बड़े प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, जिससे संसाधनों की कमी और बढ़ सकती है.
तेल और गैस सप्लाई पर असर
जब तक ये प्लांट पूरी तरह से चालू नहीं होते, तब तक तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित रहेगी. इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर पड़ सकता है. फिलहाल बाजार में इस जोखिम को पूरी तरह से नहीं माना गया है. यह सिर्फ एक क्षेत्रीय समस्या नहीं है. इसका असर पूरी दुनिया के ऊर्जा सेक्टर पर पड़ेगा. अगर जल्द शांति समझौता नहीं हुआ, तो मरम्मत में और ज्यादा समय लग सकता है और सप्लाई संकट लंबे समय तक बना रह सकता है.
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