‘Mother of all deals’ से मिलेगा चीन की BRI का तोड़, भारत–EU मिलकर बनाएंगे कॉरिडोर; ड्रैगन को लगेगी मिर्ची
भारत और EU के बीच होने वाली FTA वैश्विक जियो इकॉनॉमिक समीकरणों को बदलने वाली मानी जा रही है. इस समझौते के साथ भारत–EU इकॉनॉमिक कॉरिडोर को आगे बढ़ाने की तैयारी है, जो चीन की बीआरआई रणनीति को सीधी चुनौती दे सकता है. यह कॉरिडोर एशिया और यूरोप के बीच नया, सुरक्षित और भरोसेमंद ट्रेड रूट तैयार करेगा. इससे ग्लोबल सप्लाई चेन में चीन की पकड़ कमजोर होने की संभावना है.
India EU FTA: दुनिया की जियो-इकॉनॉमिक तस्वीर बदलने वाली है, क्योंकि भारत और EU के बीच FTA को लेकर 27 जनवरी को बड़ी घोषणा होने वाली है. भारत और EU के बीच होने वाली “‘मदर ऑफ ऑल डील्स” को सिर्फ एक ट्रेड एग्रीमेंट नहीं, बल्कि अमेरिकी टैरिफ के जवाब में एक बड़ा रणनीतिक कदम माना जा रहा है. इसी बीच अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने EU पर आरोप लगाते हुए कहा था कि वे एक बड़ा व्यापार समझौता करना चाहते थे, इसलिए भारत पर कोई टैरिफ नहीं लगाया गया.
यह डील कई मायनों में खास मानी जा रही है, क्योंकि यह अमेरिका के साथ-साथ चीन के इकोनॉमिक कॉरिडोर को भी सीधी चुनौती देने वाला मास्टरस्ट्रोक है. FTA के अलावा भारत–यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर को लेकर भी बातचीत आगे बढ़ने की उम्मीद है, जो ग्लोबल सप्लाई चेन में चीन की पकड़ को कमजोर कर सकता है.
क्या है भारत–EU इकोनॉमिक कॉरिडोर
इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर की घोषणा 2023 में जी20 के दौरान हुई थी. भारत और EU मिलकर जिस इकोनॉमिक कॉरिडोर पर काम कर रहे हैं, उसका मकसद एशिया और यूरोप के बीच एक भरोसेमंद, सुरक्षित और तेज ट्रेड रूट तैयार करना है. यह कॉरिडोर सिर्फ माल ढुलाई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग, डिजिटल कनेक्टिविटी और ग्रीन एनर्जी जैसे सेक्टर्स को भी शामिल किया जाएगा.
माना जा रहा है कि यह कॉरिडोर चीन के इकोनॉमिक कॉरिडोर का एक मजबूत विकल्प बन सकता है. हाल के दिनों में मिडिल ईस्ट की घटनाओं के चलते इस कॉरिडोर की रफ्तार प्रभावित हुई थी, लेकिन अब इसमें तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है.
चीन के इकोनॉमिक कॉरिडोर को क्यों लगेगा झटका
चीन का मौजूदा इकोनॉमिक कॉरिडोर, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव, बीते एक दशक में एशिया, अफ्रीका और यूरोप के कई देशों तक फैल चुका है. चीन इसमें भारी निवेश कर चुका है और कई विकासशील देशों के पोर्ट्स, रेलवे और लॉजिस्टिक्स अब सीधे तौर पर चीन-केंद्रित सप्लाई चेन से जुड़े हुए हैं. इसी वजह से चीन को ग्लोबल ट्रेड फ्लो और स्ट्रैटेजिक रूट्स पर मजबूत नियंत्रण मिला है, जो उसे जियो-इकॉनॉमिक बढ़त देता रहा है.
भारत–EU इकोनॉमिक कॉरिडोर इस एकछत्र पकड़ को सीधे चुनौती देता है. EU का ग्लोबल ट्रेड में बड़ा हिस्सा है, जबकि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है. इस नए कॉरिडोर के जरिए यूरोपीय कंपनियों को चीन पर निर्भर हुए बिना एशिया तक सीधी और सुरक्षित पहुंच मिलेगी. इससे “चाइना प्लस वन” रणनीति को भी नया बल मिलने की संभावना है.
भारत को क्या होंगे फायदे
भारत–EU इकोनॉमिक कॉरिडोर से भारत को मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट के मोर्चे पर बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है. यूरोपीय बाजारों तक तेज और मजबूत कनेक्टिविटी मिलने से भारतीय प्रोडक्ट्स ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनेंगे, जिससे एक्सपोर्ट ग्रोथ को नई रफ्तार मिलेगी. इसके साथ ही यूरोपीय कंपनियों का भारत में निवेश बढ़ सकता है, जिससे फॉरेन डायरेक्ट इनवेस्टमेंट और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के नए अवसर खुलेंगे.
खासतौर पर एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, ग्रीन एनर्जी और सेमीकंडक्टर जैसे सेक्टर्स को सीधा लाभ मिल सकता है. इस कॉरिडोर के जरिए भारत की जियो-इकॉनॉमिक पोजीशन मजबूत होगी और देश ग्लोबल सप्लाई चेन का अहम केंद्र बनकर उभरेगा.
किन सेक्टर्स को मिलेगा सबसे ज्यादा फायदा
भारत–EU इकोनॉमिक कॉरिडोर से कई अहम सेक्टर्स को सीधा और लॉन्ग-टर्म फायदा मिलने की संभावना है. ऑटोमोबाइल और ईवी सेक्टर में यूरोपीय टेक्नोलॉजी और भारतीय मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का मिलना भारत को ग्लोबल सप्लाई हब बना सकता है. टेक्सटाइल और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को नए बाजार, बेहतर लॉजिस्टिक्स और तेज डिलीवरी का लाभ मिलेगा, जिससे एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी संभव है.
वहीं सेमीकंडक्टर, ग्रीन एनर्जी और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे कैपिटल-इंटेंसिव सेक्टर्स में विदेशी निवेश और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के नए अवसर खुलेंगे. कुल मिलाकर, यह कॉरिडोर भारत के इंडस्ट्रियल बेस को मजबूत करने और हाई-वैल्यू सेक्टर्स में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दिलाने वाला साबित हो सकता है.
यह भी पढ़ें: 26 जनवरी से 20 कोच के साथ दौड़ेगी अहमदाबाद-मुंबई वंदे भारत, यात्रियों को मिलेगी वेटिंग से राहत