स्पेस में भिड़ेंगे मुकेश अंबानी और एलन मस्क! Starlink को टक्कर देने के लिए रिलायंस बनाएगा अपना सैटेलाइट नेटवर्क

टेलीकॉम के बाद अब मुकेश अंबानी की नजर अंतरिक्ष पर है. रिलायंस इंडस्ट्रीज अरबों डॉलर के निवेश के साथ सैटेलाइट इंटरनेट कारोबार में उतरने की तैयारी कर रही है. Jio Platforms के जरिए कंपनी LEO सैटेलाइट नेटवर्क बनाने पर काम कर रही है, जिससे उसका सीधा मुकाबला एलन मस्क की Starlink और Amazon की Project Kuiper से हो सकता है.

मुकेश अंबानी सैटेलाइट प्रोजेक्ट Image Credit: Money9 Live

Mukesh Ambani satellite project: मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) अब अंतरिक्ष से इंटरनेट की जंग छेड़ने के लिए तैयार है. जियो के जरिए टेलीकॉम सेक्टर में क्रांति लाने के बाद, अब अंबानी की नजरें सैटेलाइट कम्युनिकेशन (Satcom) स्पेस पर हैं. खबर है कि रिलायंस इस क्षेत्र में अरबों डॉलर का निवेश करने की योजना बना रही है, जिससे उसका सीधा मुकाबला एलन मस्क की ‘स्टारलिंक’ और अमेजन के ‘कुइपर’ (Project Kuiper) से होगा.

जियो प्लेटफॉर्म्स संभालेगा कमान

ET की रिपोर्ट के मुताबिक, रिलायंस का यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट जियो प्लेटफॉर्म्स (JPL) के तहत संचालित किया जाएगा. रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट किया है कि कंपनी खास तौर पर लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) सेगमेंट में दुनिया के सबसे बड़े खिलाड़ियों में से एक बनना चाहती है. इस प्रोजेक्ट की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुकेश अंबानी खुद इसकी निगरानी कर रहे हैं. उनके साथ पीके भटनागर, मैथ्यू ओम्मेन और आयुष भटनागर जैसे दिग्गज अधिकारी इस रणनीति को जमीन पर उतारने में जुटे हैं.

मिशन मोड में ‘छह टीमें’ और ‘वॉर फुटिंग’ पर काम

प्रोजेक्ट को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए रिलायंस ने छह अलग-अलग टीमें बनाई हैं. ये टीमें सैटेलाइट डिजाइन, लॉन्चिंग, पेलोड और यूजर टर्मिनल्स जैसे तकनीकी पहलुओं पर काम कर रही हैं. पिछले कुछ महीनों से विदेशी सैटेलाइट टेक्नोलॉजी फर्मों के साथ लगातार बैठकें हो रही हैं. रिलायंस का लक्ष्य अगले 2 से 4 साल के भीतर अपने LEO सैटेलाइट्स को ऑर्बिट में स्थापित करना है.

विदेशी कंपनियों के दबदबे को चुनौती

भारत सरकार भी चाहती है कि सैटेलाइट कम्युनिकेशन के क्षेत्र में एक मजबूत भारतीय खिलाड़ी हो. फिलहाल चीन ने इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन (ITU) में 2 लाख सैटेलाइट्स के लिए आवेदन किया है. सुरक्षा के लिहाज से भारत के लिए अपना ‘कॉन्स्टेलेशन’ (सैटेलाइट नेटवर्क) होना बेहद जरूरी है. रिलायंस अब ऑर्बिट स्लॉट्स और रेडियो फ्रीक्वेंसी हासिल करने के लिए दूरसंचार विभाग (DoT) के साथ संपर्क में है.

अधिग्रहण या खुद का नेटवर्क? सभी विकल्पों पर विचार

जियो इस रेस में स्टारलिंक और अमेजन जैसी कंपनियों से पिछड़ना नहीं चाहती. इसलिए, कंपनी ‘इनऑर्गेनिक ग्रोथ’ के विकल्प भी तलाश रही है. इसका मतलब है कि रिलायंस किसी ऐसी मौजूदा सैटेलाइट कंपनी को खरीद सकती है जिसके पास पहले से ऑर्बिट स्लॉट और बुनियादी ढांचा तैयार हो.

बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा

सैटेलाइट इंटरनेट के मैदान में रिलायंस के सामने कई बड़े प्रतिद्वंद्वी हैं:

  • स्टारलिंक (एलन मस्क): वैश्विक स्तर पर सबसे आगे.
  • अमेजन लियो: तेजी से उभरता प्रतियोगी.
  • यूटेलसैट वनवेब: इसमें सुनील मित्तल के भारती ग्रुप की बड़ी हिस्सेदारी है.
  • अन्य: एएसटी स्पेसमोबाइल और सैटेलाइट जैसी कंपनियां.

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रिलायंस का पहले से ही मीडियम अर्थ ऑर्बिट (MEO) फर्म SES के साथ पार्टनरशिप है, लेकिन अब कंपनी की नजर पूरी तरह से LEO सेगमेंट पर है. यदि अंबानी की यह योजना सफल रहती है, तो भारत न केवल डिजिटल संप्रभुता हासिल करेगा, बल्कि डेटा प्राइवेसी और सुरक्षा के मामले में भी आत्मनिर्भर बनेगा. फिलहाल निवेश की सही राशि और लॉन्च की तारीखों पर अंतिम फैसला होना बाकी है.