Silver crash warning: चांदी में बना खतरनाक ट्रेंड! 800% बढ़ी, अब क्रैश का बन रहा पैटर्न, बता रहा 50 साल पुराना चार्ट

चांदी की कीमतें एक बार फिर ऐसे मोड़ पर हैं, जहां इतिहास चेतावनी देता नजर आता है. पिछले 50 सालों के चार्ट बताते हैं कि हर बड़ी तेजी के बाद इसमें तेज गिरावट भी आई है. मौजूदा 800 फीसदी उछाल के बीच सवाल यह है कि क्या चांदी फिर उसी खतरनाक पैटर्न में प्रवेश कर चुकी है?

Silver price crash warning Image Credit: Money9 Live

Silver price crash warning: जब अर्थव्यवस्था स्थिर होती है, भरोसा मजबूत होता है और भविष्य साफ दिखता है, तब चांदी अक्सर शांत रहती है. लेकिन जैसे ही पैसों की कीमत, सिस्टम की ताकत और आने वाले कल को लेकर सवाल खड़े होते हैं, चांदी अचानक चर्चा में आ जाती है और रफ्तार पकड़ने लगती है. इतिहास गवाह है कि जब-जब निवेशकों का भरोसा डगमगाया, चांदी ने तेज चाल दिखाई, और यही वजह है कि आज एक बार फिर जब बेलगाम चांदी भागती हुई नजर आ रही है तो इस पर सबकी नजरें टिकी हैं.

1970 का दशक- महंगाई, तेल संकट और भरोसे की कमी

1975 में चांदी की कीमत करीब 3.8 डॉलर प्रति औंस थी. उस दौर में अमेरिका कई झटकों से गुजर रहा था. वियतनाम युद्ध का असर, ब्रेटन वुड्स सिस्टम का खत्म होना और तेल संकट ने अर्थव्यवस्था को हिला दिया था. खाने-पीने से लेकर पेट्रोल और घर तक सब कुछ महंगा हो रहा था, लेकिन आम लोगों की आमदनी उसी रफ्तार से नहीं बढ़ रही थी.

डॉलर, जो पहले सोने से जुड़ा था, अब खुलकर बाजार के भरोसे छोड़ दिया गया. कागजी पैसे पर भरोसा कमजोर पड़ने लगा. ऐसे में लोग ऐसी संपत्तियों की तलाश में थे, जिनपर उन्हें भरोसा हो. सोने के मुकाबले सस्ती होने की वजह से चांदी आम निवेशकों को ज्यादा आकर्षक लगी.

हंट ब्रदर्स और चांदी की ऐतिहासिक रैली

इसी दौर में हंट ब्रदर्स नाम के तेल कारोबारी सामने आए, जिन्होंने बड़े पैमाने पर चांदी खरीदनी शुरू की. इससे बाजार में बेचैनी और बढ़ गई. 1979 तक चांदी की कीमत करीब 48 डॉलर प्रति औंस पहुंच गई. यह लगभग 1,188 प्रतिशत की जबरदस्त तेजी थी.

लेकिन यह तेजी हमेशा के लिए नहीं थी. जब महंगाई काबू से बाहर होने लगी, तो अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरें तेजी से बढ़ाईं. डॉलर मजबूत हुआ, अर्थव्यवस्था धीमी पड़ी और चांदी की कीमतें टूट गईं. 1980 के बाद करीब 89 प्रतिशत की भारी गिरावट आई.

2001-2011: डॉट-कॉम से वैश्विक संकट तक

2000 के शुरुआती सालों में डॉट-कॉम बबल फूट चुका था. ब्याज दरें कम थीं, कर्ज आसानी से मिल रहा था और रियल एस्टेट बाजार तेज था. चांदी लगभग भुला दी गई थी और 4 डॉलर के आसपास घूम रही थी.

फिर 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट आया. बड़े बैंक डूब गए, सरकारों को बचाव पैकेज देने पड़े और केंद्रीय बैंकों ने बाजार में भारी मात्रा में पैसा डाला. निवेशकों का भरोसा सिर्फ शेयर बाजार पर नहीं, बल्कि पूरे वित्तीय सिस्टम पर डगमगा गया.

इस डर के माहौल में चांदी ने फिर से अपनी जगह बनाई. 2001 से 2011 के बीच इसकी कीमत करीब 50 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई, यानी फिर लगभग 1,100 प्रतिशत की तेजी. निवेशकों को लगा कि चांदी उन्हें महंगाई और आर्थिक अस्थिरता से बचा सकती है.

जब हालात धीरे-धीरे सुधरे, अर्थव्यवस्था संभली और नीतियां सख्त हुईं, तो चांदी की चमक फिर फीकी पड़ने लगी. 2011 के बाद इसमें करीब 72 प्रतिशत की गिरावट आई. यह गिरावट 1980 जितनी गहरी नहीं थी, लेकिन कई निवेशकों के लिए फिर से सबक बन गई.

2020 के बाद महामारी और नया दौर

2020 में आई महामारी ने पूरी दुनिया को अचानक थाम कर रख दिया. सरकारों ने बड़े पैमाने पर राहत पैकेज दिए, ब्याज दरें लगभग शून्य हो गईं और बाजार में पैसों की बाढ़ आ गई. शुरुआती घबराहट में चांदी करीब 11.7 डॉलर तक गिर गई.

चांदी इतिहास दोहराएगा?

अनिश्चितता, बढ़ता कर्ज, महंगाई की आशंका और मुद्राओं की कीमत को लेकर सवाल इन सबने चांदी को फिर से आवाज दी. निचले स्तर से अब तक इसमें करीब 800 प्रतिशत की तेजी देखी जा चुकी है. चांदी की मौजूदा कीमत 108 डॉलर प्रति औंस है. चांदी फिर से जब तेज रफ्तार पर है तो यह डर बाजार में पैदा होने लगा है कि क्या इतिहास दोहराया जाएगा?

टेक्निकल चार्ट बताता है कि 1100 फीसदी ग्रोथ के आसपास पहुंचते ही चांदी की कीमतों पर ‘मेगा क्रैश’ का बादल छाने लगता है. ऐसे में अब मार्केट एक्सपर्ट का मानना है कि अगर चांदी 11 गुना तक बढ़ी, और कीमत 125-130 डॉलर के दायरे में गयी तो बाजार पर डर छाने लगेगा. हालांकि बाजार एक्पर्ट का ये भी कहना है कि इतनी ऊंचाई को छूना आसान रास्ता नहीं है.