डिपॉजिट की धीमी रफ्तार, क्रेडिट की तेज उड़ान: जाने बैंकों का CD Ratio क्यों टेंशन की बात
देश में बैंकों का CD Ratio लगातार 80 फीसदी के पार बना हुआ है, क्योंकि डिपॉजिट की बढ़ोतरी सिर्फ 9.7 फीसदी रही जबकि क्रेडिट 11.3 फीसदी तक पहुंच गया. रेपो रेट घटने से डिपॉजिट ब्याज कम हुआ और लोग शेयर बाजार व दूसरे निवेश ऑप्शनों की ओर मुड़े. टैक्स राहत, डिपॉजिट बीमा बढ़ाने और ब्याज दरें सुधारने से स्थिति बेहतर हो सकती है.
अश्विनी राणा | देश के बैंकिंग सिस्टम में इन दिनों क्रेडिट और डिपॉजिट का संतुलन गड़बड़ाया हुआ नजर आ रहा है. आरबीआई के ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि बैंकों का क्रेडिट और डिपॉजिट का अनुपात यानी CD Ratio अक्टूबर के दोनों पखवाड़ों के आखिरी में 80 फीसदी से ऊपर रहा है. सितंबर के पहले पखवाड़े में भी यह अनुपात 80 फीसदी के पार था, हालांकि दूसरे पखवाड़े में इसमें हल्की गिरावट आई थी.
आमतौर पर 75 से 80 फीसदी के बीच का CD Ratio सुरक्षित माना जाता है, लेकिन इससे ऊपर जाने का मतलब है कि बैंकों के पास लोन देने के मुकाबले जमा कम आ रही है, जिससे सिस्टम पर दबाव बढ़ता है.
डिपॉजिट की धीमी बढ़त और बढ़ती क्रेडिट मांग
CD Ratio बढ़ने का सबसे बड़ा कारण है ,डिपॉजिट ग्रोथ का धीमा होना और क्रेडिट ग्रोथ का तेज बने रहना. आरबीआई के आंकड़ों में भी यही दिखाई देता है. अक्टूबर में बैंकिंग सेक्टर में डिपॉजिट की बढ़ोतरी सिर्फ 9.7 फीसदी रही, जबकि मांग 10.3 फीसदी तक पहुंच गई. इसी अवधि में क्रेडिट ग्रोथ 11 फीसदी के ऊपर रही. इसका मतलब है कि बैंक जिस रफ्तार से कर्ज दे रहे हैं, उसी रफ्तार से उनके पास जमा नहीं आ रही, और यही अंतर CD Ratio को ऊपर धकेल रहा है.
लोग बैंक डिपॉजिट से क्यों दूर जा रहे हैं?
डिपॉजिट की धीमी बढ़त के पीछे कई कारण हैं. इनमें रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट में कमी के बाद बैंकों ने डिपॉजिट पर मिलने वाली ब्याज दरें घटा दीं. इससे ग्राहकों का रुझान पारंपरिक डिपॉजिट से हटकर शेयर मार्केट, म्यूचुअल फंड, रियल एस्टेट जैसे विकल्पों की ओर बढ़ गया. इसके साथ ही स्मॉल फाइनेंस बैंक ज्यादा ब्याज दे रहे हैं और NBFC लोन आसानी से जारी कर रही हैं, जिससे बैंकिंग सिस्टम पर दबाव और बढ़ा है.
इसके अलावा कम अवधि के टैक्स-सेविंग बॉन्ड्स ने भी निवेशकों को आकर्षित किया है, इसी वजह से कई बैंकों में डिपॉजिट की स्थिति में करीब 5 लाख करोड़ का असर देखने को मिला है, जबकि सरकार की ओर से डिपॉजिट पर जो बीमा सुरक्षा मिलती है, उसकी सीमा सिर्फ 5 लाख रुपये है.
कैसे सुधरेगा CD Ratio?
CD Ratio को संतुलित रखना हर बैंक के लिए जरूरी है, क्योंकि यही बताता है कि बैंक के पास लोन देने के लिए पर्याप्त जमा है या नहीं. मौजूदा स्थिति में बैंकों के लिए सबसे व्यावहारिक विकल्प डिपॉजिट ब्याज दरों को बढ़ाना हो सकता है. यदि बैंक आकर्षक ब्याज देंगे, तो ग्राहकों का रुझान फिर से बैंक जमाओं की तरफ बढ़ेगा.
आरबीआई की 14 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार उस समय देश का कुल डिपॉजिट 5.34 लाख रुपये करोड़ रहा था, जबकि मार्च 21 के पखवाड़े में यह 5.32 लाख करोड़ रुपये था. इस अवधि में बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने 1.17 लाख करोड़ रुपये CD से जुटाए थे. ये आंकड़े बताते हैं कि बैंकों को लगातार अतिरिक्त फंडिंग की जरूरत पड़ रही है.
क्या सरकार के बदलाव से आसान होगा बैंकों का काम?
सरकार चाहे तो कुछ बड़े बदलाव करके इस तनाव को काफी हद तक कम कर सकती है. डिपॉजिट पर मिलने वाले ब्याज को मार्जिनल टैक्स बेनिफिट गेन की तरह टैक्स छूट मिले, तो लोग फिर से बैंक डिपॉजिट की ओर आकर्षित होंगे. साथ ही बचत खातों पर मिलने वाले ब्याज को भी टैक्स के दायरे से बाहर कर दिया जाए, तो बैंकिंग प्रणाली में जमा धन बढ़ सकता है. वह यह भी कहते हैं कि बैंक डिपॉजिट पर मिलने वाली सुरक्षा बीमा की सीमा, जो अभी 5 लाख रुपये है, उसे बढ़ाया जाना चाहिए ताकि ग्राहकों का भरोसा और मजबूत हो. अगर इसे बढ़ाना फिलहाल संभव नहीं है, तो कम से कम सरकार को इस सीमा को संशोधित कर इसे अधिक प्रभावी बनाना चाहिए.
RBI की अगली बैठक और बजट से बढ़ी उम्मीदें
ऐसे में अब सबकी नजर अगले महीने होने वाली रिजर्व बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी मीटिंग पर है. उम्मीद जताई जा रही है कि रेपो रेट में फिर से कमी की जा सकती है. इसके अलावा वित्त मंत्री अगले वर्ष के बजट की तैयारी में जुटी हैं. अगर सरकार इस बजट में ऊपर बताए गए बदलाव शामिल करती है, तो इससे न सिर्फ ग्राहकों को राहत मिलेगी बल्कि बैंकों को भी महंगी लागत वाले डिपॉजिट जुटाने के दबाव से छुटकारा मिलेगा.
लेखक अश्विनी राणा वॉयस ऑफ बैंकिंग के फाउंडर हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं.
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