शादी में लाखों मिले या तलाक में एलिमनी? एक्सपर्ट से समझें कैसे दोनों आपकी टैक्स गेम को बदल देते हैं

शादी, तलाक और परिवार से जुड़ी आर्थिक जिम्मेदारियां सिर्फ भावनाओं तक सीमित नहीं होतीं, इनका सीधा असर आपकी टैक्स गणना पर भी पड़ता है. कई बार लोग अनजाने में ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिनकी कीमत उन्हें भारी टैक्स, ब्याज और पेनल्टी के रूप में चुकानी पड़ती है. पूरी जानकारी आगे.

अलिमनी पर टैक्स Image Credit: Money9 Live

“शादी वह प्रक्रिया है जिसमें कोई किराना व्यापारी वैसा ठेका ले लेता है जो पहले फूलवाले के पास था.” – फ्रांसिस रोडमैन

दुनिया भर में इनकम टैक्स कानून शादी और तलाक के प्रभाव को मान्यता देते हैं, और भारतीय टैक्स कानून भी इससे अलग नहीं हैं. दोनों स्थितियों का असर आपकी टैक्स देनदारी पर पड़ता है. आइए समझते हैं कि भारतीय टैक्स कानून आपकी टैक्स देनदारी को कैसे प्रभावित करते हैं.

शादी के समय मिले उपहारों पर टैक्स

सबसे पहले शादी की बात करते हैं. भारतीय टैक्स कानूनों के अनुसार, यदि किसी वित्त वर्ष में आपको सभी स्रोतों से मिले उपहारों का कुल मूल्य 50,000 रुपये से अधिक नहीं है, तो वह आपकी आय नहीं माना जाती. लेकिन जैसे ही यह कुल मूल्य इस सीमा को पार करता है, पूरी राशि को आपकी आय माना जाता है और उस पर टैक्स लगता है.

लेकिन इस नियम में कुछ अपवाद हैं. उनमें से एक अपवाद है- शादी के समय दूल्हा और दुल्हन को मिले उपहार. यानी अपनी खुद की शादी में मिले उपहार, चाहे उनकी कुल राशि कितनी भी क्यों न हो, आपकी कर योग्य आय नहीं मानी जाती.

चूंकि यह छूट सिर्फ दूल्हा और दुल्हन को मिले उपहारों पर लागू होती है, इसलिए यदि उनके किसी रिश्तेदार को शादी में कोई उपहार मिलता है, तो वह पूरी तरह टैक्स योग्य होगा, बशर्ते कि सालभर में मिले कुल उपहारों का मूल्य 50,000 रुपये से ज्यादा हो जाए.

एक सावधानी की बात- अगर आप शादी के अवसर का इस्तेमाल काले धन को सफेद करने के लिए करना चाहते हैं, तो जान लें कि अगर आप दावा करते हैं कि शादी में बहुत अधिक उपहार मिले, तो टैक्स अधिकारी आपसे शादी के विभिन्न कार्यक्रमों में हुए खर्च के विवरण और खर्च के स्रोत पूछ सकते हैं. वे समारोह के स्तर का आकलन करने के लिए फोटो और वीडियो भी मांग सकते हैं. आपके खातों में दर्ज शादी का खर्च आपके द्वारा बताए गए उपहारों की राशि के अनुरूप होना चाहिए.

इसके अलावा, यदि आप दावा करते हैं कि आपने बहुत बड़ी राशि उपहार में पाई है, तो आपको उपहार देने वाले व्यक्ति की पहचान और उसकी वित्तीय क्षमता भी साबित करनी पड़ सकती है. यदि आप उपहारों की वैधता साबित नहीं कर सके, तो यह राशि 60% की दर से टैक्स हो सकती है. ब्याज और पेनल्टी अलग से जुड़ेंगे.

पति या पत्नी को दिए गए उपहारों पर आय की क्लबिंग

शादी के उपहारों की तरह, कुछ निर्दिष्ट रिश्तेदारों- जैसे कि जीवनसाथी से मिले उपहार भी टैक्स से मुक्त होते हैं. लेकिन इससे आप टैक्स बचत नहीं कर सकते, क्योंकि पत्नी/पति को दिए गए उपहार से होने वाली कोई भी आय आपके ही हाथों में क्लब होकर टैक्स योग्य हो जाएगी.

यह नियम उन उपहारों पर भी लागू होता है जो दुल्हन को उसके ससुराल वालों (ससुर या सास) से मिलते हैं. यदि वह उपहार दी गई राशि किसी संपत्ति में बदली जाती है, तो भी क्लबिंग जारी रहती है. एक राहत यह है कि क्लबिंग केवल मूल उपहार राशि से उत्पन्न आय पर लागू होती है. उस आय से किए गए निवेशों से जो नई आय बनेगी, उस पर क्लबिंग लागू नहीं होगी.

क्लबिंग उतने समय तक लागू रहती है जब तक विवाह वैध है. तलाक या किसी एक जीवनसाथी की मृत्यु के बाद क्लबिंग समाप्त हो जाती है.

नाबालिग बच्चों की आय की क्लबिंग

वर्तमान टैक्स कानूनों के अनुसार, आपके नाबालिग बच्चे की आय उस माता-पिता की आय में जोड़ी जाती है जिसकी आय ज्यादा है. एक बार किसी विशेष माता-पिता के साथ आय क्लब हो गई, तो आगे भी उसी के साथ क्लब होती रहेगी, भले ही बाद में दूसरे माता-पिता की आय अधिक हो जाए. हालांकि, आकलन अधिकारी परिस्थितियों के आधार पर क्लबिंग को बदलने का निर्देश दे सकते हैं.

आप प्रत्येक बच्चे के लिए 1,500 रुपये सालाना तक की छूट ले सकते हैं. इस सीमा से ऊपर की आय ही क्लब होगी.

यह ध्यान रखें कि बच्चे की सारी आय क्लब नहीं होती. सिर्फ पैसिव आय- जैसे ब्याज, किराया, डिविडेंड, कैपिटल गेन आदि क्लब होती है. यदि बच्चा अपने कौशल, प्रतिभा या व्यक्तिगत मेहनत से कमाता है, तो उस आय पर क्लबिंग नहीं होती. इसलिए चाइल्ड आर्टिस्ट या बाल श्रमिक की कमाई क्लब नहीं की जाती. यदि कोई नाबालिग बच्चा किसी विशेष शारीरिक अक्षमता से ग्रस्त है, तो उसकी आय पर क्लबिंग लागू नहीं होगी.

माता-पिता के अलग होने की स्थिति में, नाबालिग बच्चे की आय उसी माता-पिता के साथ क्लब होगी जो उस वर्ष बच्चे की देखभाल कर रहा है. यदि न्यायालय की कस्टडी बदलती है, तो क्लबिंग भी माता-पिता के अनुसार बदलती जाएगी.

एलिमनी पर टैक्स

तलाक के मामलों में अदालतें आम तौर पर एकमुश्त एलिमनी और समय-समय पर दी जाने वाली किस्तों में एलिमनी दोनों तय करती हैं. भारतीय टैक्स कानूनों में एलिमनी के बारे में कोई विशेष प्रावधान नहीं है, इसलिए करयोग्यता का निर्धारण सामान्य टैक्स नियमों और न्यायालय के फैसलों के आधार पर किया जाता है.

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एकमुश्त एलिमनी को आय नहीं माना जाता क्योंकि यह एक कैपिटल रिसीट होती है, इसे विवाह संबंध खत्म करने के बदले में मिली राशि समझा जाता है. लेकिन समय-समय पर मिलने वाली एलिमनी को टैक्स-फ्री नहीं माना जा सकता और यह आय के रूप में टैक्स योग्य हो सकती है.

दिलचस्प बात यह है कि भारतीय टैक्स कानून एलिमनी देने वाले व्यक्ति को, चाहे वह एकमुश्त हो या किस्तों में कोई टैक्स लाभ नहीं देते.

लेखक एक टैक्स और इंवेस्टमेंट एक्सपर्ट हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं. आप उन्हें jainbalwant@gmail.com पर या ट्विटर हैंडल @jainbalwant पर संपर्क कर सकते हैं.