ट्रंप टैरिफ गैरकानूनी करार, भारत को बड़ी राहत? GTRI बोला- 55% निर्यात पर खत्म हो सकता है 18% शुल्क
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप के वैश्विक टैरिफ को अवैध घोषित किए जाने के बाद भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की दिशा बदल सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर रिसिप्रोकल टैरिफ हटते हैं तो भारत के अमेरिका को होने वाले 55 फीसदी निर्यात पर लगने वाला 18 फीसदी शुल्क समाप्त हो सकता है, जिससे भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत मिलेगी.
Trump Tariff Supreme Court and India-US Trade Deal: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से लगाए गए वैश्विक टैरिफ को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवैध ठहराए जाने के बाद भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर बड़ा असर पड़ सकता है. दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने कहा है कि इस फैसले के बाद भारत को अमेरिका के साथ चल रही ट्रेड डील की शर्तों की दोबारा समीक्षा करनी चाहिए. रिपोर्ट के मुताबिक, अगर तथाकथित “रिसिप्रोकल टैरिफ” हटते हैं, तो भारत के अमेरिका को होने वाले करीब 55 फीसदी निर्यात पर लगने वाला 18 फीसदी शुल्क समाप्त हो सकता है और ये सामान केवल वैश्विक व्यापार नियमों के तहत लागू सामान्य ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ (MFN) टैरिफ के दायरे में आ जाएंगे.
भारतीय निर्यात पर क्या होगा असर?
GTRI के अनुसार, भारत के निर्यात का बड़ा हिस्सा सीधे राहत की स्थिति में आ सकता है, लेकिन सभी प्रोडक्ट्स पर असर समान नहीं होगा. कुछ सेक्टर ऐसे हैं जिन पर अमेरिकी कानून के तहत पहले से लागू विशेष शुल्क जारी रहेंगे. उदाहरण के तौर पर-
- स्टील और एल्युमिनियम पर सेक्शन 232 के तहत 50 फीसदी टैरिफ लागू रहेगा
- कुछ ऑटो कंपोनेंट्स पर 25 फीसदी शुल्क जारी रहेगा
- स्मार्टफोन, पेट्रोलियम प्रोडक्ट और दवाइयों जैसे सामान जो भारत के निर्यात मूल्य का लगभग 40 फीसदी हिस्सा हैं वह पहले से ही अमेरिकी टैरिफ से मुक्त हैं
इसका मतलब है कि फैसले का सबसे बड़ा फायदा उन उत्पादों को होगा जो अभी तक 18 फीसदी अतिरिक्त शुल्क झेल रहे थे.
कोर्ट ने क्यों रद्द किया टैरिफ?
20 फरवरी 2026 को दिए गए फैसले में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रंप प्रशासन ने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) का इस्तेमाल गलत तरीके से किया. यह कानून मूल रूप से राष्ट्रीय आपात स्थितियों के लिए बनाया गया था, न कि व्यापक व्यापार नीति लागू करने के लिए. मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स ने स्पष्ट किया कि इस कानून के तहत राष्ट्रपति को एकतरफा आयात शुल्क लगाने का अधिकार नहीं मिलता और प्रशासन ऐसा कोई अन्य वैधानिक आधार भी नहीं दिखा पाया.
भारत-अमेरिका अंतरिम समझौते पर भी पड़ सकता है असर
फैसला ऐसे समय आया है जब दोनों देश एक अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. 7 फरवरी को जारी संयुक्त बयान में समझौते की रूपरेखा सामने आई थी. शुरुआती कदम के तौर पर अमेरिका ने भारत पर लगाया गया 25 फीसदी दंडात्मक टैरिफ हटाया था, जिसे भारत की ओर से रूसी तेल खरीद कम करने की प्रतिबद्धता से जोड़ा गया था. बाद में इसे घटाकर 18 फीसदी करने की योजना बनी.
अब भारत की ओर से मुख्य वार्ताकार दर्पण जैन के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल वाशिंगटन जाकर समझौते के कानूनी मसौदे को अंतिम रूप देने वाला है. दोनों देश मार्च तक इस समझौते पर हस्ताक्षर करना चाहते हैं, लेकिन कोर्ट के फैसले के बाद इसकी शर्तों में बदलाव संभव माना जा रहा है. मालूम हो कि अमेरिकी कोर्ट के फैसले के बाद भारत की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है.
अन्य देशों के साथ हुए समझौतों पर भी सवाल
GTRI का मानना है कि यह निर्णय केवल भारत ही नहीं, बल्कि उन सभी देशों के लिए अहम है जिनके साथ अमेरिका ने हाल में व्यापार समझौते किए हैं- जैसे ब्रिटेन, जापान, यूरोपीय यूनियन, मलेशिया, इंडोनेशिया और वियतनाम. रिपोर्ट के अनुसार, जब आधार ही अवैध घोषित हो गया, तो ये समझौते बगैर किसी मतलब के हो सकते हैं और साझेदार देश इन्हें छोड़ने या फिर से बातचीत करने पर विचार कर सकते हैं.
क्या ट्रंप फिर से टैरिफ लगा सकते हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी प्रशासन सेक्शन 301 या सेक्शन 232 जैसे दूसरे प्रावधानों के तहत दोबारा टैरिफ लगाने की कोशिश कर सकता है. हालांकि इसके लिए विस्तृत जांच, सार्वजनिक प्रक्रिया और कानूनी औचित्य की आवश्यकता होगी, जिससे प्रक्रिया लंबी और विवादास्पद हो सकती है. साथ ही, ऐसे उपाय वैश्विक रूप से लागू नहीं किए जा सकते. GTRI के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अमेरिकी व्यापार नीति में राष्ट्रपति की शक्तियों पर अंकुश लगाएगा और कांग्रेस की भूमिका को फिर से मजबूत करेगा. इससे भविष्य में किसी भी प्रशासन द्वारा आपातकालीन आर्थिक शक्तियों का इस्तेमाल कर व्यापक टैरिफ लगाने की संभावना काफी सीमित हो जाएगी.
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