Israel-Iran तनाव का असर: खाद्य तेल और फर्टिलाइजर इंपोर्ट पर मंडराया खतरा, निर्यात पर भी बढ़ेगा दबाव
अमेरिका-ईरान के बढ़ते तनाव का असर भारत के कृषि और खाद्य सेक्टर पर दिखने लगा है. शिपिंग लागत में बढ़ोतरी, संभावित कंटेनर संकट और रेड सी मार्ग में जोखिम के कारण खाद्य तेल व उर्वरक कच्चे माल के आयात पर दबाव बन सकता है. साथ ही, मिडिल ईस्ट और यूरोप को होने वाले कृषि निर्यात पर भी असर पड़ने की आशंका जताई गई है.
Edible Oil and Fertilizers Import: मिडिल ईस्ट में बढ़ते अमेरिका-ईरान तनाव का असर अब भारत के कृषि और खाद्य क्षेत्र पर पड़ता दिखाई दे रहा है. उद्योग संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर लड़ाई लंबी खिंचती है, तो भारत के खाद्य तेल आयात, फर्टिलाइजर कच्चे माल की सप्लाई और कृषि निर्यात पर गंभीर असर पड़ सकता है.
शिपिंग महंगी, कंटेनर संकट की आशंका
मिडिल ईस्ट से गुजरने वाले समुद्री मार्गों पर रिस्क बढ़ने के कारण अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों ने इमरजेंसी कॉन्फ्लिक्ट सरचार्ज लगाना शुरू कर दिया है. फ्रांस की कंटेनर शिपिंग कंपनी CMA CGM ने प्रति कंटेनर 2,000 से 4,000 डॉलर तक अतिरिक्त शुल्क वसूलना शुरू किया है. इससे आयातकों की लागत बढ़ रही है और आने वाले दिनों में कीमतों पर दबाव दिख सकता है. इंडस्ट्री से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि अगर हालात और बिगड़ते हैं, तो बीमा प्रीमियम और फ्रेट चार्ज में और उछाल आ सकता है, जिससे सप्लाई चेन पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.
एडिबल तेल आयात पर खतरा
भारत हर साल करीब 1.6 करोड़ टन एडिबल तेल आयात करता है. इसमें लगभग 20 फीसदी हिस्सा सूरजमुखी तेल का होता है, जो मुख्य रूप से रूस, यूक्रेन और अर्जेंटीना से आता है. अगर जहाजों को रेड सी मार्ग से बचते हुए लंबा रास्ता अपनाना पड़ा, तो डिलीवरी में देरी और लागत में बढ़ोतरी तय मानी जा रही है. फिलहाल सप्लाई सामान्य है, लेकिन इंडस्ट्री का मानना है कि संघर्ष लंबा चला तो बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है. भारतीय वेजिटेबल ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (IVPA) ने आगाह किया है कि जियो पॉलिटिकल टेंशन का सीधा असर कच्चे तेल और खाद्य तेल बाजारों पर पड़ता है. डॉलर-रुपया विनिमय दर में उतार-चढ़ाव भी आयात लागत को प्रभावित कर सकता है.
फर्टिलाइजर रॉ मटेरियल की सप्लाई पर दबाव
खरीफ सीजन (जून से शुरू) से पहले फर्टिलाइजर्स की उपलब्धता बेहद अहम होती है. ऐसे में सल्फर और सल्फ्यूरिक एसिड जैसे कच्चे माल की आपूर्ति पर खतरा चिंता बढ़ा रहा है. ये दोनों तत्व DAP और SSP जैसे प्रमुख उर्वरकों के प्रोडक्शन में जरूरी हैं. भारत के कुल सल्फर आयात का करीब 76 फीसदी हिस्सा कतर, यूएई और ओमान से आता है. अगर इन क्षेत्रों के बंदरगाहों पर संचालन प्रभावित हुआ, तो आयात बाधित हो सकता है. उद्योग संगठनों का कहना है कि बंदरगाहों पर भीड़ और कंटेनर की कमी से लॉजिस्टिक संकट गहरा सकता है.
निर्यात पर भी असर की आशंका
सिर्फ आयात ही नहीं, भारत का निर्यात भी जोखिम में है. देश अपने तेल खली (ऑयलमील) निर्यात का 20% मध्य-पूर्व और 15 फीसदी यूरोप को भेजता है. अगर समुद्री मार्ग बाधित हुए, तो कृषि, बागवानी और फ्लोरीकल्चर प्रोडक्ट की शिपमेंट पर भी असर हो सकता है. फ्रेट चार्ज और कच्चे तेल की कीमतों में पहले ही बढ़ोतरी दर्ज की जा चुकी है. इससे निर्यातकों की मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है.
कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से दोहरा असर
US-Iran तनाव का सीधा असर वैश्विक कच्चे तेल बाजार पर पड़ता है. तेल महंगा होने से-
- शिपिंग लागत बढ़ती है
- उत्पादन लागत में इजाफा होता है
- बायोफ्यूल बाजार में उतार-चढ़ाव आता है
- खाद्य तेल की कीमतों पर दबाव बनता है
- इसका असर अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है.
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