ये देश नहीं यूज करते अमेरिकी डॉलर, ट्रंप की धमकी का नहीं पड़ता असर; ऐसे बिगाड़ते हैं खेल
दुनिया में आज भी अमेरिकी डॉलर सबसे ताकतवर मुद्रा है, लेकिन अब कई देश इसकी पकड़ को धीरे-धीरे कम करने में जुटे हैं. इसी प्रक्रिया को डी-डॉलराइजेशन कहा जाता है. EBC Financial Group की रिपोर्ट के मुताबिक जहां देश डॉलर पर निर्भरता कम करके दूसरी करेंसी का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं.
Countries do not use US Dollar:अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव के कारण अमेरिकी डॉलर की मांग में भारी उछाल आया है. युद्ध के चलते भारतीय रुपया प्रति डॉलर के मुकाबले 94 रुपये के करीब पहुंच गया है. दरअसल, अमेरिकी डॉलर (USD) अपनी हाई स्टेबिलिटी, व्यापक स्वीकार्यता और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती के कारण दुनिया की प्रमुख रिजर्व और ट्रेडिंग करेंसी है. अधिकांश इंटरनेशनल ट्रेड जैसे तेल और सोना डॉलर में होता है, जिससे यह सबसे सुरक्षित और लिक्विड मुद्रा बनती है और लगभग 85 फीसदी ग्लोबल ट्रेड में इसका इस्तेमाल होता है. . लेकिन इसके बावजूद दुनिया में कुछ देश ऐसे भी हैं, जो या तो डॉलर का इस्तेमाल नहीं करते या फिर धीरे-धीरे इससे दूरी बना रहे हैं.
क्या है डी-डॉलराइजेशन और क्यों हो रही है इसकी चर्चा ?
दुनिया में आज भी अमेरिकी डॉलर सबसे ताकतवर मुद्रा है, लेकिन अब कई देश इसकी पकड़ को धीरे-धीरे कम करने में जुटे हैं. इसी प्रक्रिया को डी-डॉलराइजेशन कहा जाता है. इसका मतलब यह नहीं है कि देश पूरी तरह डॉलर छोड़ रहे हैं, बल्कि वे अपने व्यापार, पेमेंट और विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर का हिस्सा घटा रहे हैं. EBC Financial Group की रिपोर्ट के मुताबिक 2025 तक यह ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है, जहां देश डॉलर पर निर्भरता कम करके दूसरी करेंसी का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं.
इन देशों पर अमेरिका की धमकी का नहीं पड़ता असर
रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ देश ऐसे हैं जो खुलकर अमेरिकी डॉलर से दूरी बना चुके हैं. नॉर्थ कोरिया, ईरान और क्यूबा जैसे देशों ने आधिकारिक तौर पर डॉलर के इस्तेमाल को खत्म कर दिया है. इन देशों पर पहले से ही अमेरिकी प्रतिबंध हैं, इसलिए इन्होंने अपनी आर्थिक व्यवस्था को डॉलर से अलग ढाल लिया है. हालांकि इन देशों में पूरी तरह डॉलर खत्म नहीं हुआ है, क्योंकि अनौपचारिक या ब्लैक मार्केट में इसका इस्तेमाल अभी भी होता है.
बड़े देश भी बदल रहे हैं अपना तरीका?
खास बात ये भी है कि अब सिर्फ छोटे या प्रतिबंधित देश ही नहीं, बल्कि बड़े देश भी धीरे-धीरे सिस्टम बदल रहे हैं. रूस ने डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करते हुए चीन के साथ युआन और रूबल में व्यापार बढ़ाया है. चीन लगातार अपने युआन को इंटरनेशनल लेवल पर मजबूत करने की कोशिश कर रहा है और कई देशों के साथ सीधे अपनी करेंसी में सौदे कर रहा है. भारत ने भी रूस और यूएई समेत कई देशों के साथ कुछ व्यापार रुपये में शुरू कर दिया है.
विदेशी मुद्रा भंडार में भी दिख रहा बड़ा बदलाव
अब बदलाव सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है. कई देशों के विदेशी मुद्रा भंडार में भी डॉलर का हिस्सा धीरे-धीरे कम हो रहा है. केंद्रीय बैंक अब अपने रिजर्व को अलग-अलग करेंसी में बांट रहे हैं, जिसमें यूरो, युआन और सोना शामिल है. IMF के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक रिजर्व में डॉलर की हिस्सेदारी पहले के मुकाबले कम हो चुकी है.
आखिर देश क्यों छोड़ रहे हैं डॉलर का सहारा
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह अमेरिका की सख्त नीतियां और आर्थिक प्रतिबंध हैं. रूस और ईरान जैसे देशों ने इसी वजह से डॉलर से दूरी बनाई. इसके अलावा देश अपने आर्थिक जोखिम को कम करना चाहते हैं. अगर पूरी निर्भरता एक ही करेंसी पर होगी, तो संकट के समय बड़ा नुकसान हो सकता है. साथ ही, नए पेमेंट सिस्टम और डिजिटल करेंसी भी इस बदलाव को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे डॉलर के बिना भी अंतरराष्ट्रीय लेन-देन संभव हो रहा है.
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