SEBI ने बदला म्यूचुअल फंड फ्रेमवर्क, 1 अप्रैल से लागू होंगे नए नियम; ट्रस्टी और इंडिपेंडेंट डायरेक्टर की मजबूत हुई भूमिका
SEBI ने म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री के लिए बड़ा रेगुलेटरी बदलाव करते हुए SEBI (Mutual Funds) Regulations, 2026 को नोटिफाई कर दिया है, जो 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे. नए नियमों का मकसद निवेशकों पर खर्च का बोझ कम करना, कॉस्ट ट्रांसपेरेंसी बढ़ाना और एसेट मैनेजमेंट कंपनी तथा ट्रस्टी की जवाबदेही तय करना है.
SEBI Mutual Fund Rules: बाजार नियामक सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया यानी SEBI ने म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री के लिए नियमों में बदलाव करते हुए SEBI (Mutual Funds) Regulations, 2026 को नोटिफाई कर दिया है. ये नए नियम 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे. SEBI का उद्देश्य निवेशकों पर पड़ने वाले खर्च के बोझ को कम करना, कॉस्ट ट्रांसपेरेंसी को मजबूत करना और एसेट मैनेजमेंट कंपनी तथा ट्रस्टी की जवाबदेही तय करना है. 17 दिसंबर को हुई बोर्ड मीटिंग में इन बदलावों को मंजूरी दी गई थी, जिसके बाद अब इन्हें औपचारिक रूप से लागू करने की नोटिफिकेशन जारी कर दी गई है.
ट्रस्टी और इंडिपेंडेंट डायरेक्टर की बढ़ी जिम्मेदारी
नए नियमों के तहत म्यूचुअल फंड के पुराने रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को पूरी तरह बदल दिया गया है. अब ट्रस्टी और इंडिपेंडेंट डायरेक्टर को इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट एग्रीमेंट, स्कीम के तहत दिए जाने वाले रेम्यूनरेशन, संबंधित पक्षों के साथ किए गए सर्विस कॉन्ट्रैक्ट और निवेशकों से वसूले जाने वाले शुल्क पर कड़ी निगरानी रखनी होगी. ट्रस्टी को किसी भी तरह की कमी की पहचान कर उसे लिखित रूप में एसेट मैनेजमेंट कंपनी को बताना अनिवार्य होगा और यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उस कमी को समय पर दूर किया जाए.
TER को लेकर सख्त प्रावधान
नए नियमों का सबसे अहम पहलू टोटल एक्सपेंस रेशियो यानी TER से जुड़ा है. SEBI ने स्पष्ट किया है कि अब केवल वही खर्च TER के तहत निवेशकों से वसूले जा सकेंगे, जिनकी अनुमति नियामक की ओर से दी गई है. इसमें बेस एक्सपेंस रेशियो, अनुमत ब्रोकरेज कॉस्ट, ट्रेड एक्जीक्यूशन से जुड़े ट्रांजैक्शन कॉस्ट, स्टैच्यूटरी लेवी और एग्जिट लोड शामिल हैं. इसके अलावा कोई भी खर्च निवेशकों पर नहीं डाला जा सकेगा. जो खर्च TER के दायरे में नहीं आएगा, उसे एसेट मैनेजमेंट कंपनी, ट्रस्टी या स्पॉन्सर को खुद वहन करना होगा.
गवर्नेंस और डिस्क्लोजर होंगे और मजबूत
नए नियमों में गवर्नेंस से जुड़े कई कड़े प्रावधान जोड़े गए हैं. ट्रस्टी और इंडिपेंडेंट डायरेक्टर को यह सुनिश्चित करना होगा कि रेम्यूनरेशन स्ट्रक्चर ऐसा न हो, जिससे हितों का टकराव पैदा हो या निवेशकों के हित प्रभावित हों. इसके साथ ही डिस्क्लोजर और रिपोर्टिंग को भी मजबूत किया गया है.
अब एनुअल रिपोर्ट में ट्रस्टी की ओर से स्कीम के परफॉर्मेंस पर विस्तृत टिप्पणी, प्रति यूनिट हिस्टोरिकल डेटा, खर्च और वैल्यूएशन से जुड़ी स्पष्ट जानकारी देना अनिवार्य होगा. एसेट मैनेजमेंट कंपनी को तय समयसीमा के भीतर यूनिटहोल्डर्स को स्कीम-वाइज डिजिटल एनुअल रिपोर्ट उपलब्ध करानी होगी.
निवेशकों के हित में बड़ा कदम
कुल मिलाकर, SEBI के ये नए म्यूचुअल फंड नियम निवेशकों के हितों को केंद्र में रखते हुए तैयार किए गए हैं. सीमित खर्च, बेहतर निगरानी और ज्यादा पारदर्शिता के जरिए SEBI ने यह साफ कर दिया है कि म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में अब निवेशकों पर अनावश्यक बोझ डालने की गुंजाइश नहीं होगी. इसके साथ ही जवाबदेही को भी सख्ती से लागू किया जाएगा.
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