अब सिर्फ देसी सोलर सेल से बनेंगे प्रोजेक्ट, 1 जून से लागू होगा नया नियम; क्या आपके लिए बढ़ जाएगी लागत?

1 जून से भारत में नए रूफटॉप और ओपन-एक्सेस सोलर प्रोजेक्ट्स में केवल घरेलू स्तर पर बने सोलर सेल का इस्तेमाल अनिवार्य होगा. सरकार का मकसद आयात पर निर्भरता घटाना और स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है. हालांकि, उद्योग के एक बड़े वर्ग को आशंका है कि इससे छोटे सोलर मॉड्यूल निर्माताओं पर दबाव बढ़ सकता है.

सोलर के नए नियम Image Credit: Money9 Live

अगर आप अपने घर की छत पर सोलर पैनल लगवाने की सोच रहे हैं, या आपका कोई कमर्शियल प्रोजेक्ट है, तो यह खबर सीधे आपकी जेब से जुड़ी है. केंद्र सरकार के एक नए आदेश के मुताबिक, 1 जून 2026 से देश में लगने वाले सौर ऊर्जा प्रोजेक्ट्स में केवल भारत में बने (लोकल) सोलर सेल्स का ही इस्तेमाल किया जा सकेगा. सरकार का यह कदम आयात पर निर्भरता कम करने के लिए है, लेकिन इसके टाइमिंग को लेकर उद्योग जगत में बड़ी चिंताएं हैं. आम जनता के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अब घर में सोलर लगवाना महंगा हो जाएगा? आइए आसान भाषा में समझते हैं.

आम जनता पर क्या होगा सीधा असर?

इस नए नियम का सीधा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो ‘पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना’ जैसी स्कीम के तहत अपने घरों में रूफटॉप सोलर पैनल लगवाने जा रहे हैं.

  • लागत में भारी बढ़ोतरी: इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान सोलर एसोसिएशन ने कहा है कि देसी सेल्स से बने सोलर मॉड्यूल (पैनल) विदेशी या आयातित सेल्स वाले पैनल के मुकाबले 80% से लेकर 120% तक महंगे पड़ रहे हैं.
  • बढ़ेगा शुरुआती खर्च: जब कंपनियों को महंगे देसी सेल खरीदने पड़ेंगे, तो वे इसका बोझ आम उपभोक्ताओं पर डालेंगी. यानी अब घर की छत पर सोलर पैनल लगवाने का शुरुआती खर्च काफी बढ़ सकता है.
  • सप्लाई में देरी की आशंका: भारत में सोलर पैनल बनाने की क्षमता तो करीब 200 गीगावॉट (GW) सालाना है, लेकिन इसके मुख्य हिस्से ‘सेल’ को बनाने की क्षमता सिर्फ 30 गीगावॉट ही है. इस भारी अंतर के कारण बाजार में पैनल की कमी हो सकती है, जिससे आपके घर में सोलर इंस्टॉल होने में लंबा वक्त लग सकता है.

क्यों आ रहा है कीमतों में इतना उछाल?

इस पूरी व्यवस्था को समझने के लिए इसके गणित को देखना जरूरी है, जो बिजनेस के नजरिए से काफी पेचीदा है:

  • सीमित घरेलू सप्लाई: रिपोर्ट के माने तो देश में सेल बनाने वाली कंपनियां बहुत कम हैं. सीमित सप्लाई और कम प्रतिस्पर्धा के कारण भारतीय सेल निर्माता 20 से 30% तक का भारी मुनाफा (मार्जिन) वसूल रहे हैं.
  • छोटे निर्माताओं पर संकट: देश के 125 से ज्यादा छोटे पैनल निर्माता खुद सेल नहीं बनाते. उन्हें बड़े प्रतिस्पर्धियों से महंगे सेल खरीदने होंगे, जिससे छोटे ब्रांड्स के पैनल और महंगे हो जाएंगे.

क्या कोई राहत की उम्मीद है?

हालांकि सरकार ने साफ कर दिया है कि इस नियम में कोई ‘थोक राहत’ नहीं मिलेगी, लेकिन कुछ मामलों में ढील दी गई है:

  • केस-बाय-केस राहत: जिन प्रोजेक्ट्स का काम काफी आगे बढ़ चुका है या मॉड्यूल लग चुके हैं, उन्हें सरकार जांच के बाद थोड़ी राहत दे सकती है.
  • बड़ी परियोजनाओं को छूट: 31 अगस्त 2025 से पहले बोली (Bid) जीत चुके बड़े यूटिलिटी प्रोजेक्ट्स को इस नियम से बाहर रखा गया है, जिससे घरेलू बाजार पर तुरंत पूरा दबाव नहीं आएगा.

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लंबी अवधि का फायदा

भले ही शुरुआत में आम जनता और छोटे कारोबारियों को झटका लगे, लेकिन इंडस्ट्री का एक बड़ा वर्ग इसे सही मान रहा है. प्रीमियर एनर्जीज और इक्रा (ICRA) जैसी संस्थाओं का मानना है कि इस कड़े नियम से देश में निवेश बढ़ेगा. अनुमान है कि दिसंबर 2027 तक भारत की सेल बनाने की क्षमता बढ़कर 100 गीगावॉट पहुंच जाएगी. जब देश में ही पर्याप्त उत्पादन होने लगेगा, तो आने वाले सालों में कीमतें दोबारा आम जनता के नियंत्रण में आ सकती हैं.