त्योहारी सीजन से पहले महंगी हो गईं दालें, चने और अरहर की कीमतों में जोरदार उछाल, जानें- क्या है वजह
भारत में सबसे ज्यादा खाई जाने वाली दाल, चने की कीमत में महीने-दर-महीने 11% (दिल्ली के बाहर) की बढ़ोतरी हुई है, जबकि हफ्ते-दर-हफ्ते इसमें 5.5% की बढ़ोतरी हुई है. कहा जा रहा है कि पिछले एक महीने में अल-नीनो का असर और साफ हो गया है.
Highlights
- अरहर जैसी मुख्य दालों की कीमतों में 10 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई.
- पिछले एक महीने में मुख्य दालों की थोक कीमतों में भारी उछाल आया है.
- पिछले एक महीने में अल-नीनो का असर और साफ हो गया है.
सरकार ने खाने के तेल और चीनी की कीमतें कम करने के लिए कदम उठाए हैं, लेकिन दालों की कीमतों में बढ़ोतरी जारी है. पिछले महीने चना, मूंग, मटर और अरहर जैसी मुख्य दालों की कीमतों में 10 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है, जबकि पिछले एक हफ्ते में इनमें 3-5 फीसदी की तेज बढ़ोतरी देखी गई है.
कीमतों में क्यों हुई बढ़ोतरी?
ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि कीमतों में यह बढ़ोतरी मॉनसून की वजह से फसल में कमी और त्योहारों के समय मांग बढ़ने के कारण हुई है. इंडस्ट्री बॉडी ‘इंडियन पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन’ (IPGA) के डेटा के विश्लेषण से पता चला है कि पिछले एक महीने में मुख्य दालों की थोक कीमतों में भारी उछाल आया है.
कितनी महंगी हईं चने और अरहर की दालें?
भारत में सबसे ज्यादा खाई जाने वाली दाल, चने की कीमत में महीने-दर-महीने 11% (दिल्ली के बाहर) की बढ़ोतरी हुई है, जबकि हफ्ते-दर-हफ्ते इसमें 5.5% की बढ़ोतरी हुई है.
दूसरी सबसे ज्यादा खाई जाने वाली दाल, अरहर की कीमत पिछले एक महीने में 6.5% और पिछले एक हफ्ते में 2.4% बढ़ी है. मूंग की कीमत में पिछले एक महीने में 10.6% और पिछले एक हफ्ते में 4.3% की बढ़ोतरी हुई है, जबकि मटर की कीमत एक महीने में 6% और पिछले एक हफ्ते में 3% बढ़ी है.
पिछले साल के मुकाबले चने की कीमतों में 23%, उड़द में 24% और मटर में 47% की बढ़ोतरी हुई है. पिछले एक साल के दौरान मसूर और मूंग की कीमतों में क्रमशः 2% और 4% की मामूली बढ़ोतरी हुई है.
अल-नीनो का असर
इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि पिछले एक महीने में अल-नीनो का असर और साफ हो गया है, क्योंकि कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने अपने बड़े इलाकों में सूखे की घोषणा की है.
कृषि सचिव अतिश चंद्र ने सोमवार को कहा कि अल नीनो मौसम पैटर्न के कारण बारिश पर निर्भर इलाकों के लिए आने वाला रबी (सर्दियों की) फसल का मौसम चुनौतीपूर्ण हो सकता है और अनाज का उत्पादन प्रभावित हो सकता है.
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां अब हकीकत बन गई हैं.
दालों का आयात करता है भारत
चंद्र ने बताया कि जहां भारत ने अनाज के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है, वहीं वह अभी भी दालों, तिलहन और फलों जैसे बागवानी उत्पादों का आयात करता है.
रबी की फसलें आम तौर पर कुल मिलाकर लगभग 638 लाख हेक्टेयर में बोई जाती हैं. इनमें से 300 लाख हेक्टेयर से अधिक में गेहूं, 140 लाख हेक्टेयर में दालें, 87 लाख हेक्टेयर में तिलहन और 55 लाख हेक्टेयर में मोटे अनाज की बुवाई होती है.
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