भारत में इनकम टैक्स का सबसे सख्त दौर, जब देना पड़ता था कमाई का 97.5%, जानें सरकार को क्यों लेना पड़ा यह फैसला?
साल 2025 के बजट में सरकार ने मिडिल क्लास को सबसे बड़ा तोहफा दिया था, जहां नई टैक्स व्यवस्था में 12 लाख रुपये तक की सालाना कमाई पर बिल्कुल कोई इनकम टैक्स नहीं लगता. सैलरीड लोगों के लिए स्टैंडर्ड डिडक्शन के साथ यह सीमा 12.75 लाख तक पहुंच जाती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि कभी भारत में इनकम टैक्स इतना ऊंचा था कि कमाई का ज्यादातर हिस्सा सरकार ले जाती थी? 100 रुपये की कमाई पर केवल 2.5 रुपये ही बचते थे.
Budget 2026: साल 2025 के बजट में सरकार ने मिडिल क्लास को सबसे बड़ा तोहफा दिया था. अब 12 लाख रुपये तक की कमाई पर कोई टैक्स नहीं लगता है. 2026 में पेश होने वाले बजट से इस वर्ग को कोई खास उम्मीद नहीं है क्योंकि पिछले बजट में सरकार ने काफी छूट दे दी थी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में कभी इनकम टैक्स की दर इतनी ऊंची हो गई थी कि कमाई का लगभग पूरा हिस्सा सरकार के पास चला जाता था?
इंदिरा गांधी के दौर में 1970 के दशक में सबसे ज्यादा इनकम टैक्स रेट 97.5 फीसदी तक पहुंच गया था. यानी अमीर लोग अपनी ज्यादा कमाई से सिर्फ 2.5 फीसदी ही रख पाते थे. यह टैक्स गरीबी हटाओ और बराबरी लाने के नाम पर लगाया गया था, लेकिन इसका नतीजा उल्टा निकला. आज 2025-26 के बजट में हालात पूरी तरह बदल चुके हैं, जहां नई टैक्स व्यवस्था में 12 लाख रुपये तक की कमाई पर बिल्कुल टैक्स नहीं लगता. यह बदलाव पुराने दौर की तुलना में राहत जैसा लगता है.
इंदिरा गांधी के समय सबसे ज्यादा टैक्स कब लगा?
1970 में इंदिरा गांधी ने जब बजट पेश किया, तब टॉप इनकम टैक्स दर 93.5 फीसदी तक पहुंच गई. फिर 1973-74 में सरचार्ज बढ़ाकर कुल मिलाकर 97.5 फीसदी हो गई. यह दर 2 लाख रुपये से ज्यादा कमाई पर लगती थी. सोचिए, 100 रुपये कमाने पर सिर्फ 2.5 रुपये ही आपके पास बचते थे. हालांकि तत्कालीन सरकार का कहना था कि यह समाजवादी नीतियों का हिस्सा है, ताकि अमीरों से ज्यादा टैक्स लेकर गरीबों के लिए काम किया जा सके.
इस ऊंचे टैक्स का क्या असर पड़ा?
इस नीति को शुरू करने के इरादे जो कुछ भी हों, लेकिन नतीजे बुरे आए. अमीर लोग टैक्स बचाने के तरीके ढूंढने लगे. बहुत से लोग काला धन बनाते थे या कमाई छुपाते थे. नतीजा? सरकार को टैक्स कम मिला, टैक्स देने वाले लोग घटे और अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा. टैक्स चोरी बहुत बढ़ गई और देश में काला बाजार फला-फूला.
कब और क्यों बदली यह नीति?
1970 के दशक के अंत तक सरकार को समझ आ गया कि इतना टैक्स का यह हाई रेट काम नहीं कर रहा. 1974 में ही दर घटाकर 77 फीसदी कर दी गई. 1980 के दशक में और कम हुई, जो घटकर 66 फीसदी तक आई गई. 1990 के बाद आर्थिक सुधारों से टैक्स सिस्टम सरल और कम दर वाला बन गया. आज टैक्स दरें ज्यादा नहीं हैं और लोग आसानी से टैक्स देते हैं. साथ ही 12 लाख रुपये पर कोई टैक्स नहीं देना पड़ रहा है.
1974-75 के बजट में वित्त मंत्री वाई. बी. चवन ने इनकम टैक्स की दरों में बड़ा बदलाव किया, जो उस समय की सबसे बड़ी राहत मानी जाती है. उन्होंने ज्यादा कमाई वाले लोगों पर बेसिक इनकम टैक्स की अधिकतम दर 70 फीसदी रखी (70,000 रुपये से ज्यादा की कमाई पर). साथ ही, सरचार्ज को सभी के लिए एक समान 10 फीसदी कर दिया. इस तरह कुल मिलाकर सबसे ऊंची टैक्स दर 77 फीसदी रह गई. 6,000 रुपये तक की कमाई पर बिल्कुल कोई इनकम टैक्स नहीं लगता था. यह कदम टैक्स चोरी रोकने और लोगों को ईमानदारी से टैक्स देने के लिए उठाया गया था, क्योंकि डायरेक्ट टैक्स कमेटी ने सिफारिश की थी कि इतना ज्यादा टैक्स चोरी को बढ़ावा देता है.
आज का बजट कितना अलग और राहत वाला है?
2025 के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने नई टैक्स व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया. अब 12 लाख रुपये तक की सालाना कमाई पर बिल्कुल टैक्स नहीं लगता. सैलरी वाले लोगों के लिए स्टैंडर्ड डिडक्शन के साथ यह सीमा 12.75 लाख तक हो सकती है. 12 से 24 लाख के बीच भी स्लैब सुधरे हैं और टैक्स कम है. यह बदलाव मिडिल क्लास के लिए बड़ी राहत है, जो 1970 के दौर की तुलना में सपने जैसा लगता है.