धीमी पड़ रही है चीन की अर्थव्यवस्था? नए ऑर्डर घटे, फैक्ट्रियों की रफ्तार थमी; PMI आंकड़े चौंकाने वाले
चीन की अर्थव्यवस्था को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं. मई 2026 में मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) घटकर 50 पर पहुंच गया, जिससे फैक्ट्री गतिविधियों में सुस्ती के संकेत मिले हैं. नए ऑर्डर में गिरावट, कमजोर घरेलू मांग और प्रॉपर्टी संकट अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा रहे हैं. हालांकि निर्यात, हाई-एंड मैन्युफैक्चरिंग और मजबूत ऊर्जा सुरक्षा अभी भी चीन को सहारा दे रहे हैं.
China Economy: दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं. ताजा सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मई 2026 में चीन की फैक्ट्री गतिविधियां लगभग ठहर-सी गई हैं. मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) घटकर 50 पर पहुंच गया है, जो अप्रैल में 50.3 था. यह आंकड़ा भले ही विस्तार के दायरे में बना हुआ है, लेकिन इसकी सुस्ती इस बात का संकेत दे रही है कि चीनी अर्थव्यवस्था पर दबाव लगातार बढ़ रहा है. फैक्ट्री गतिविधियों की रफ्तार कम होना, नए ऑर्डर में गिरावट और घरेलू मांग की कमजोरी ऐसे संकेत हैं, जो चीन की आर्थिक सेहत को लेकर चिंता बढ़ा सकते हैं. हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि चीन की अर्थव्यवस्था डूब रही है, लेकिन आर्थिक इंजन की रफ्तार निश्चित रूप से धीमी पड़ती दिखाई दे रही है.
नए ऑर्डर में गिरावट ने बढ़ाई चिंता
मई में नए ऑर्डर का सब-इंडेक्स 50.6 से घटकर 49.9 पर आ गया. यह स्तर सिमटने का संकेत माना जाता है. वहीं, उत्पादन इंडेक्स भी 51.5 से घटकर 51.2 पर पहुंच गया. कच्चे माल के भंडार से जुड़ा इंडेक्स भी कमजोर हुआ है. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि चीन के उद्योगों को नए ऑर्डर मिलने की गति धीमी हुई है. यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर रोजगार, निवेश और औद्योगिक उत्पादन पर भी पड़ सकता है.
प्रॉपर्टी संकट अभी भी सबसे बड़ी चुनौती
चीन की अर्थव्यवस्था पिछले कई वर्षों से रियल एस्टेट संकट से जूझ रही है. कई बड़े डेवलपर्स के वित्तीय संकट में फंसने के बाद उपभोक्ताओं का भरोसा कमजोर हुआ है. इसका सीधा असर घरेलू मांग और निवेश पर पड़ा है. विश्लेषकों का कहना है कि चीन की सबसे बड़ी समस्या अब बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है. लोग खर्च कम कर रहे हैं, घरों की बिक्री कमजोर बनी हुई है और निजी निवेश में भी अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा है.
ईरान युद्ध का असर सीमित, लेकिन खतरा बरकरार
ईरान युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल देखने को मिला है. हालांकि, चीन पर इसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम पड़ा है. इसकी वजह चीन के बड़े तेल भंडार और ऊर्जा आपूर्ति के विविध स्रोत हैं. फिर भी, यदि वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता लंबे समय तक बनी रहती है, तो चीन की उत्पादन लागत बढ़ सकती है, जिससे औद्योगिक गतिविधियों पर अतिरिक्त दबाव आ सकता है.
निर्यात बना अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा सहारा
घरेलू मांग की कमजोरी के बीच चीन की अर्थव्यवस्था को सबसे बड़ा सहारा निर्यात से मिल रहा है. यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशिया में चीनी उत्पादों की मांग मजबूत बनी हुई है. ऑटोमोबाइल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और हाई-टेक्नोलॉजी उत्पादों का निर्यात लगातार बढ़ रहा है.
अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों में भी कुछ सुधार के संकेत मिले हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति की हालिया बैठक के बाद दोनों देशों ने व्यापार और निवेश के लिए अलग-अलग बोर्ड बनाने पर सहमति जताई है. इससे निर्यात को और समर्थन मिल सकता है.
क्या सचमुच संकट में है चीन
मॉर्गन स्टेनली और एचएसबीसी जैसे वैश्विक वित्तीय संस्थानों का मानना है कि चीन की अर्थव्यवस्था फिलहाल संकट में नहीं है, लेकिन वह कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रही है. घरेलू मांग कमजोर है, प्रॉपर्टी सेक्टर दबाव में है और फैक्ट्री गतिविधियां सुस्त पड़ रही हैं.
दूसरी ओर, निर्यात, हाई-एंड मैन्युफैक्चरिंग और मजबूत ऊर्जा सुरक्षा अभी भी अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहे हैं. यही वजह है कि चीन ने 2026 के लिए 4.5 से 5 फीसदी आर्थिक वृद्धि का लक्ष्य रखा है, जो पिछले कई दशकों के मुकाबले सबसे कम लक्ष्यों में से एक है. ऐसे में आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि चीन की अर्थव्यवस्था सिर्फ धीमी हुई है या वास्तव में किसी बड़े संकट की ओर बढ़ रही है.
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