क्रूड में उबाल से केवल पेट्रोल-डीजल नहीं होंगे महंगे, इकोनॉमी का भी निकलेगा दम, जानें कैसे बिगड़ जाएगी आपकी डेली लाइफ

ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच जारी युद्ध से कच्चे तेल की कीमतें 115 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं. इससे भारत का आयात बिल, महंगाई और करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ने का खतरा है. रुपया कमजोर हो सकता है और GDP ग्रोथ पर भी दबाव पड़ सकता है. तेल महंगा होने से पेंट, टायर, एविएशन और ऑयल मार्केटिंग सेक्टर के मार्जिन प्रभावित हो सकते हैं. आइये विस्तार से समझते हैं.

तेल सप्लाई संकट Image Credit: ChatGPT

ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में 9 मार्च को ब्रेंट क्रूड करीब 24% उछलकर 114.93 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. प्रोडक्शन और शिपिंग में संभावित बाधा की आशंका से सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी है. एसबीआई रिसर्च ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, तेल सप्लाई मार्ग में बाधा और रेमिटेंस व व्यापार पर संभावित असर भारत के लिए चिंता का विषय बन सकते हैं. आइये जानते हैं कि इससे भारत की अर्थव्यवस्था पर किस तरह के आर्थिक प्रभाव पड़ सकते हैं?

भारत पर क्या पड़ेगा असर

  • भारत अपने कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 90% आयात करता है. इसमें से करीब 5.5 मिलियन बैरल तेल प्रतिदिन होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है. यदि इस मार्ग में कोई बाधा आती है तो भारत के लिए आपूर्ति संकट और आयात लागत में तेज बढ़ोतरी हो सकती है.
  • दुनिया के कुल कच्चे तेल का करीब 20% इसी संकरे समुद्री मार्ग से गुजरता है जिससे यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक बेहद महत्वपूर्ण ट्रांजिट पॉइंट बन जाता है.
  • ब्रेंट क्रूड की कीमत दिसंबर 2025 में करीब 58.92 डॉलर प्रति बैरल थी जो फरवरी के अंत तक 70.75 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई. जियो-पॉलिटिकल टेंशन बढ़ने से मार्च की शुरुआत में यह बढ़कर 115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं
  • कच्चे तेल की कीमत में हर 1 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत का आयात बिल लगभग 16,000 करोड़ रुपये बढ़ जाता है.
  • रिपोर्ट के अनुसार तेल की बढ़ती कीमतों का भारत की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर हो सकता है. एसबीआई रिसर्च का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) करीब 36 बेसिस पॉइंट तक बढ़ सकता है.
  • इसके अलावा तेल की कीमतों में तेजी से कॉस्ट-पुश महंगाई भी बढ़ सकती है जिससे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई में करीब 25-40 बेसिस पॉइंट तक की बढ़ोतरी हो सकती है. इससे RBI कर्ज महंगा कर सकता है और EMI बढ़ सकती है.
  • अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो आर्थिक वृद्धि भी प्रभावित हो सकती है. रिपोर्ट के अनुसार हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत की GDP ग्रोथ करीब 20-25 बेसिस पॉइंट तक कम हो सकती है.
  • सबसे खराब स्थिति में यदि कच्चा तेल 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाता है, तो वित्त वर्ष 2027 में भारत की GDP वृद्धि दर करीब 7% के अनुमान से घटकर लगभग 6% रह सकती है.
  • रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से भारत को मिलने वाले विदेशी रेमिटेंस पर भी असर पड़ सकता है. भारत को 2025 में लगभग 138 अरब डॉलर का व्यक्तिगत रेमिटेंस प्राप्त हुआ था, जो 2024 में 131.9 अरब डॉलर था.
  • पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बीच भारतीय रुपया भी कमजोर हुआ है. डॉलर के मुकाबले रुपया 92 के स्तर के नीचे फिसल गया है. सोमवार को शुरुआती कारोबार में रुपया 43 पैसे गिरकर 92.25 प्रति डॉलर पर पहुंच गया.
  • कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से रुपये पर निकट अवधि में और दबाव पड़ सकता है.
  • इन रेमिटेंस में से लगभग 18% हिस्सा GCC (गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल) देशों से आता है इसलिए वहां की आर्थिक स्थिति और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का भारत पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है.
  • इसके अलावा लंबा संघर्ष भारत और पश्चिम एशिया के बीच व्यापार को भी प्रभावित कर सकता है. GCC देशों का भारत के कुल निर्यात में 15% से अधिक और आयात में करीब 16% से ज्यादा योगदान है. वहीं अन्य पश्चिम एशियाई देशों का योगदान निर्यात में लगभग 2% और आयात में करीब 4% है.

इन सेक्टर को चुकानी पड़ सकती है कीमत

  • कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की लागत बढ़ जाती है, क्योंकि उन्हें महंगा कच्चा तेल खरीदना पड़ता है. इससे उनके मार्जिन और मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है. पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं.
  • पेंट उद्योग में कच्चा तेल अहम कच्चा माल होता है. तेल महंगा होने पर कच्चे माल की लागत बढ़ती है, जिससे पेंट के भी दाम बढ़ सकते हैं.
  • टायर उद्योग भी काफी हद तक पेट्रोकेमिकल आधारित कच्चे माल पर निर्भर करता है. कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से उत्पादन लागत बढ़ती है और मुनाफे पर असर पड़ सकता है. टायर के दाम भी बढ़ सकते हैं.
  • एविएशन सेक्टर में विमान ईंधन की कीमत कच्चे तेल से जुड़ी होती है. तेल महंगा होने पर एयरलाइंस की ऑपरेटिंग लागत बढ़ती है, जिससे उनकी कमाई पर दबाव आ सकता है. इससे हवाई यात्रा भी महंगी हो सकती है.
  • इसे लेकर इन सेक्टर की कंपनियों के शेयरों में गिरावट देखने को मिल सकती है.

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