कभी इराक कभी ईरान, खाड़ी युद्ध से भारतीयों पर कितना रिस्क, 1990 से कैसे अलग है 2026 के हालात-ए-जंग

इस बार 35 साल पुराने जैसे हालात नहीं दिखते हैं. बीते 35 साल में भारत का खाड़ी देशों के साथ रिश्ता बदल चुका है. भारत बदल चुका है. खाड़ी देशों में भारतीयों की पहचान बदल चुकी है. खाड़ी देश अब केवल भारतीयों के काम करने के ठिकाने नहीं है. बल्कि वह लाखों लोगों के घर बन चुके हैं. जहां भारतीय प्रवासी, यूएई, सउदी अरब, कुवैत, कतर, बहरीन जैसे देशों की इकोनॉमी के मजबूत स्तंभ बन गए हैं.

35 साल में भारतीय प्रवासियों ने झेले 2 खाड़ी युद्ध Image Credit: AI/Chatgpt

Two Gulf War And How India Impacted: आपको एयर लिफ्ट फिल्म तो याद होगी, जिसमें अक्षय कुमार कुवैत में फंसे भारतीयों को अपने वतन पहुंचाने के लिए जद्दोजहद करते हैं. फिल्म दुनिया के सबसे बड़े इवैकुएशन (सुरक्षित वतन वापसी) की कहानी को ताजा करती है. असल में 1990 में भी आज की तरह खाड़ी युद्ध चल रहा था. उस वक्त भी अमेरिका एक पात्र था. लेकिन दुश्मन ईरान की जगह ईराक था. उस दौरान भारत ने दुनिया का सबसे बड़ा इवैकुएशन ऑपरेशन चलाया था. जिसमें 59 दिन में 488 एयर इंडिया की फ्लाइट्स ने 1.70 लाख से ज्यादा लोगों को युद्ध के क्षेत्र से सकुशल निकाला था.

35 साल में ऐसे बदली दुनिया

लेकिन इस बार 35 साल पुराने जैसे हालात नहीं दिखते हैं. बीते 35 साल में भारत का खाड़ी देशों के साथ रिश्ता बदल चुका है. भारत बदल चुका है. खाड़ी देशों में भारतीयों की पहचान बदल चुकी है. खाड़ी देश अब केवल भारतीयों के काम करने के ठिकाने नहीं है. बल्कि वह लाखों लोगों के घर बन चुके हैं. जहां भारतीय प्रवासी, यूएई, सउदी अरब, कुवैत, कतर, बहरीन जैसे देशों की इकोनॉमी के मजबूत स्तंभ बन गए हैं.

यह बदलाव कैसे आया और क्यों इस बार की चिंता मास इवैकुशन की नहीं बल्कि भारतीयों के वहां सकुशल रहने की है. और कैसे भारतीय डिप्लोमेसी इस नई भूमिका को निभाने की कोशिश में है. इसे उस 35 साल पुरानी कहानी को फिर से जीवंत करके ही समझा जा सकता है.

1990 के दशक में आर्थिक संकट से जूझ रहा था भारत

असल में 1990 का खाड़ी युद्ध और आज का दौर दो अलग-अलग समय की कहानियां हैं, 1990 का दौर ऐसा था जब भारत घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चुनौतियों से जूझ रहा था. भारतीय इकोनॉमी बुरे दौर से गुजर रही थी. देश का विदेशी मुद्रा भंडार ऐतिहासिक निचले स्तर पर था. और भारत की दुनिया के दिग्गज संगठनों से भी बाहर था.

1990-91 के खाड़ी युद्ध के दौरान कच्चे तेल की कीमत 17 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 36 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी. देश में महंगाई बढ़ रही थी. वह 13.7 फीसदी पर पहुंच चुकी थी. भारत का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर केवल 1.1 अरब डॉलर रह गया था. जो मुश्किल से तीन सप्ताह के आयात को ही कवर कर पाने में सक्षम था. यही नहीं जुलाई 1991 में भारत सरकार को इकोनॉमी को संभालने के लिए रुपये का लगभग 18 प्रतिशत अवमूल्यन करना पड़ा था. धीरे-धीरे एक गंभीर भुगतान संतुलन (Balance of Payments) का संकट खड़ा हो चुका था. और उससे भी परेशान करने वाली बात यह थी कि भारत कच्चे तेल की आपात स्थिति में कोई स्ट्रैटेजिक रिजर्व भी नहीं रखता था. यानी आज की तरह आपात स्थिति में 60-65 दिन का रिजर्व भारतीय जमीन पर मौजूद नहीं था.

वहीं भारत कच्चे तेल के लिए खाड़ी देशों से आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर था. भारत करीब 70 फीसदी कच्चे तेल खाड़ी देशों से मंगा रहा था. अभी यह स्थिति थोड़ी बेहतर हैं यह हिस्सेदारी 50 फीसदी के करीब पहुंच गई है. उस वक्त भारतीय इकोनॉमी करीब 0.32 लाख करोड़ की थी. जबकि आज हम दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है .उस वक्त भारत से जाने वाले प्रवासी ज्यादातर श्रमिक वर्ग के हुआ करते थे. जिसमें केरल से सबसे ज्यादा प्रवासी जाते थे.

पैरामीटर1990 का दौर2026 का दौर
आर्थिक स्थितिआर्थिक संकट, 0.32 लाख करोड़ डॉलर की इकोनॉमीचौथी अर्थव्यवस्था, 4 लाख करोड़ डॉलर की इकोनॉमी
विदेशी मुद्रा भंडारकरीब 1.1 अरब डॉलरकरीब 700 अरब डॉलर
खाड़ी देशों में भारतीय8-10 लाखकरीब 90 लाख
स्टैटेजिक तेल रिजर्व060-65 दिन
वैश्विक प्रभावसीमित कूटनीतिक प्रभाववैश्विक मंचों पर सक्रिय भूमिका

भारत की खाड़ी देशों में आर्थिक ताकत

आज भारत की पहचान बदल चुकी है. भारत के पास करीब 700 अरब डॉलर फॉरेक्स रिजर्व है. वह करीब 4 लाख करोड़ की इकोनॉमी है. वह G-20 , BRICS से लेकर दुनिया के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संगठनों का सदस्य है. खाड़ी देशों के साथ अब केवल प्रवासी श्रमिकों और तेल का रिश्ता नहीं है. वहां भारतीय समुदाय के लिए मंदिर बन रहे हैं. BAPS (स्वामी नारायण संस्था) का विस्तार इसका जीता जागता उदाहरण है. खाड़ी देशों के साथ भारत के आर्थिक संबंध नई ऊंचाइयों पर है. जहां पर GCC से एफटीए की बात हो रही है. वहीं वह यूएई के साथ 100 अरब डॉलर का व्यापार कर रहा है. UAE भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है.

कंपनी का नामसेक्टरप्रमुख प्रोजेक्ट्स / योगदान
Larsen & Toubro (L&T)निर्माण और इंजीनियरिंगहाई‑राइज बिल्डिंग्स, औद्योगिक कॉम्प्लेक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स
Essarऔद्योगिक निर्माण, ऊर्जातेल रिफाइनरी, पावर प्रोजेक्ट्स
Punj Lloydइंजीनियरिंग, कंस्ट्रक्शनपाइपलाइन, ऑयल और गैस प्रोजेक्ट्स
Engineers India Ltd (EIL)औद्योगिक कंसल्टेंसीरासायनिक और पेट्रोकेमिकल प्रोजेक्ट्स
TCS, Infosys, WiproIT सेवाएँ, सॉफ़्टवेयर विकासबैंकिंग, वित्त, सरकारी परियोजनाओं के लिए IT समाधान
Bharti AirtelदूरसंचारUAE और अन्य खाड़ी देशों में मोबाइल और नेटवर्क सेवाएं
Daburहेल्थकेयर और FMCGआयुर्वेदिक उत्पाद, स्वास्थ्य एवं सौंदर्य सेवाएं
Taj Hotelsहोटल इंडस्ट्रीहोटल और रिसॉर्ट

नोट- खाड़ी देशों में प्रमुख भारतीय कंपनियां

इसी तरह खाड़ी देशों में भारतीयों की पहचान भी बदल चुकी है. वह अब कंस्ट्रक्शन वर्कर, प्लंबर, बढ़ई, मजदूरी जैसे केवल काम नहीं करते. वहां पर इंजीनियर, डॉक्टर, नर्स से लेकर हर तरह के प्रोफेशनल वहां मौजूद हैं. इसी का असर पिछले 10–15 वर्षों में एक बड़े बदलाव के रूप में दिखा .अब खाड़ी देशों में जाने वाले श्रमिकों में यूपी और बिहार जैसे उत्तर भारतीय राज्यों का हिस्सा तेजी से बढ़ा है. Emigration Clearance डेटा के अनुसार सबसे ज्यादा लोग उत्तर प्रदेश से विदेश काम करने गए, जबकि बिहार दूसरे स्थान पर रहा.

इसी तरह साल 2019 के दौरान खाड़ी देशों में लगभग 400 भारतीय कंपनियां काम कर रही थीं, जो 2023–24 तक बढ़कर 3,000 हो चुकी हैं. ये कंपनियां मैन्युफैक्चरिंग, IT, फार्मास्यूटिकल्स, फाइनेंशियल सर्विसेज, हॉस्पिटैलिटी, शिक्षा आदि में शामिल हैं.

GCC देशभारत से निर्यात (USD Billion)भारत का आयात (USD Billion)कुल व्यापार (USD Billion)
UAE36.6363.40100.06
Saudi Arabia11.7530.1241.88
Qatar1.6812.4614.14
Oman4.006.5410.54
Kuwait1.938.2810.21
Bahrain0.800.841.63
कुल GCC~56.87~121.68~178.56

भारत अब केवल रक्षक नहीं

साफ है 2026 का भारत बदल चुका है. आज वैश्विक मंचों पर उसकी आवाज पहले से कहीं अधिक मजबूत है. फिर भी एक सच आज भी वैसा ही है, खाड़ी क्षेत्र भारत के लिए आज भी बेहद अहम हैं. खाड़ी देशों में यदि भविष्य में कभी बड़ा संघर्ष होता है, तो भारत के सामने अपने नागरिकों की सुरक्षा की चुनौती पहले से कहीं बड़ी होगी. साथ ही भारत को केवल अपने नागरिकों की सुरक्षा ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ेगी.

भारतीय प्रवासी कितना भेजते हैं पैसा

देशप्रतिशत हिस्सेदारीअनुमानित राशि (अरब डॉलर में)
अमेरिका27.7%32.88
यूएई19.2%22.79
सऊदी अरब6.7%7.95
कतर4.1%4.87
कुवैत3.9%4.63
ओमान2.9%3.44