चीन पर निर्भरता घटाने की तैयारी, आंध्र प्रदेश खोलेगा रेयर अर्थ और टाइटेनियम खनन के लिए अपना समुद्री तट
चीन पर निर्भरता कम करने के लिए आंध्र प्रदेश अपने समुद्री तट पर रेयर अर्थ और टाइटेनियम युक्त बीच सैंड माइनिंग शुरू करने की तैयारी में है. राज्य सरकार खनन से लेकर प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग तक पूरी वैल्यू चेन विकसित करना चाहती है, जिससे भारत की क्रिटिकल मिनरल सुरक्षा मजबूत होगी. चीन पर निर्भरता कम करने के लिए आंध्र प्रदेश अपने समुद्री तट पर रेयर अर्थ और टाइटेनियम युक्त बीच सैंड माइनिंग शुरू करने की तैयारी में है. राज्य सरकार खनन से लेकर प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग तक पूरी वैल्यू चेन विकसित करना चाहती है, जिससे भारत की क्रिटिकल मिनरल सुरक्षा मजबूत होगी.
चीन पर बढ़ती निर्भरता और वैश्विक सप्लाई चेन के जोखिमों के बीच आंध्र प्रदेश अब एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाने की तैयारी में है. राज्य सरकार अपने खनिज-संपन्न समुद्री तट को रेयर अर्थ और टाइटेनियम युक्त बीच सैंड माइनिंग के लिए खोलने जा रही है. इसका मकसद सिर्फ खनन नहीं, बल्कि भारत के लिए क्रिटिकल मिनरल्स की पूरी घरेलू वैल्यू चेन तैयार करना है, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो और भविष्य की तकनीकों के लिए मजबूत आधार बने.
आंध्र प्रदेश बन सकता है क्रिटिकल मिनरल हब
राज्य की सरकारी खनन कंपनी आंध्र प्रदेश मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (APMDC) ने तटीय जिलों में कई ऐसे इलाकों की पहचान की है, जहां भारी मात्रा में हेवी मिनरल-बेयरिंग बीच सैंड मौजूद है. एक प्रेजेंटेशन के मुताबिक, आंध्र प्रदेश के पास भारत के कुल बीच सैंड मिनरल संसाधनों का करीब 25 प्रतिशत हिस्सा है, जो देश में दूसरा सबसे बड़ा भंडार है.
इन इलाकों में इल्मेनाइट, रूटाइल, जिरकॉन और मोनाजाइट जैसे अहम खनिज पाए जाते हैं. खास तौर पर मोनाजाइट, रेयर अर्थ एलिमेंट्स का प्रमुख स्रोत है, जिसका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहनों, विंड टर्बाइन, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उपकरणों में होता है.
रेयर अर्थ और टाइटेनियम क्यों हैं अहम?
बीच सैंड मिनरल्स कई उद्योगों की रीढ़ माने जाते हैं.
- इल्मेनाइट और रूटाइल से टाइटेनियम डाइऑक्साइड पिगमेंट और टाइटेनियम मेटल बनता है
- टाइटेनियम का इस्तेमाल पेंट, एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र में होता है
- मोनाजाइट से मिलने वाले रेयर अर्थ ऑक्साइड्स इलेक्ट्रिक वाहन और रिन्यूएबल एनर्जी के लिए जरूरी मैग्नेट बनाने में काम आते हैं
फिलहाल भारत अपनी 75 प्रतिशत से ज्यादा टाइटेनियम डाइऑक्साइड जरूरतें आयात करता है, जिनमें बड़ी हिस्सेदारी चीन की है.
चीन वैश्विक स्तर पर 50 प्रतिशत से ज्यादा टाइटेनियम मिनरल उत्पादन और 90 प्रतिशत से अधिक रेयर अर्थ प्रोसेसिंग पर नियंत्रण रखता है. यही वजह है कि भारत जैसे देश सप्लाई बाधित होने के जोखिम से जूझ रहे हैं. भारत में रेयर अर्थ मैग्नेट की मांग हर साल 15 प्रतिशत से ज्यादा की दर से बढ़ने का अनुमान है और 2030 तक कुल मांग दोगुनी हो सकती है.
कहां-कहां होंगे प्रोजेक्ट
APMDC को श्रीकाकुलम, विजयनगरम, विशाखापत्तनम, काकीनाडा और कृष्णा जैसे तटीय जिलों में 10 बड़े बीच सैंड डिपॉजिट्स के लिए मंजूरी मिल चुकी है. ये हजारों हेक्टेयर में फैले हैं और इनमें करोड़ों टन हेवी मिनरल रिजर्व मौजूद हैं. कई अन्य ब्लॉक्स अभी मंजूरी और विकास के अलग-अलग चरणों में हैं.
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राज्य सरकार इन खनिजों को सिर्फ कच्चे माल के रूप में नहीं, बल्कि खनन से लेकर रिफाइनिंग और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग तक की पूरी वैल्यू चेन के आधार के रूप में देख रही है. आंध्र प्रदेश के पास छह सक्रिय बंदरगाह हैं, जिनकी कुल कार्गो क्षमता 330 मिलियन टन से ज्यादा है. इससे प्रोसेसिंग यूनिट्स को कच्चे माल के पास ही स्थापित करना आसान होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह योजना बड़े पैमाने पर लागू होती है, तो आंध्र प्रदेश रेयर अर्थ और टाइटेनियम आधारित उद्योगों का घरेलू और वैश्विक केंद्र बन सकता है और भारत की क्रिटिकल मिनरल सुरक्षा को नई मजबूती मिलेगी.
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