आपकी जमीन से निकला तेल या गैस, तो कितना पैसा देगी सरकार? जानें मालिकाना हक पर क्या कहता है कानून
अगर किसी व्यक्ति की जमीन के नीचे तेल या प्राकृतिक गैस मिलती है, तो उस पर सीधा मालिकाना हक सरकार का होता है. हालांकि जमीन मालिक को सरकार की तरफ से मुआवजा जरूर दिया जाता है. यह मुआवजा राज्य और इलाके के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव की वजह से दुनिया के कई देशों में कच्चे तेल और एलपीजी को लेकर चिंता बढ़ गई है. भारत में भी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चर्चा तेज हो गई है. ऐसे में कई लोगों के मन में एक सवाल आता है कि अगर किसी की निजी जमीन के नीचे तेल या प्राकृतिक गैस का भंडार मिल जाए, तो उस जमीन के मालिक को क्या फायदा होगा. क्या उसे तेल की कमाई में हिस्सा मिलता है या सरकार जमीन ले लेती है.
दरअसल भारत में प्राकृतिक संसाधनों को लेकर साफ कानूनी व्यवस्था है. अगर किसी जमीन के नीचे तेल या गैस का भंडार मिलता है, तो उसका मालिक जमीन का व्यक्ति नहीं बल्कि सरकार मानी जाती है. हालांकि जमीन मालिक को मुआवजा जरूर दिया जाता है.
क्या कहता है कानून ?
भारतीय कानून के अनुसार किसी भी जमीन के नीचे मौजूद तेल और प्राकृतिक गैस जैसे संसाधन सरकार के अधिकार में होते हैं. इसका मतलब यह है कि जमीन चाहे किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति क्यों न हो, लेकिन उसके नीचे मौजूद तेल या गैस पर व्यक्तिगत दावा नहीं किया जा सकता है. सरकार जरूरत पड़ने पर उस जमीन का अधिग्रहण कर सकती है और वहां तेल या गैस की खोज और उत्पादन का काम शुरू कर सकती है.
तेल और गैस के भंडार को कंट्रोल करने वाले कानून
भारत में तेल और गैस की खोज और उत्पादन को कंट्रोल करने के लिए कई कानून बनाए गए हैं. द ऑयलफील्ड्स (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट, 1948. यह कानून केंद्र सरकार को तेल और गैस के क्षेत्रों के नियमन और विकास का अधिकार देता है. पेट्रोलियम और नेचुरल गैस रूल्स, 1959. इन नियमों में तेल और गैस की खोज, ड्रिलिंग और खनन के लिए लाइसेंस देने की पूरी प्रक्रिया तय की गई है.
इसके अलावा भारतीय संविधान का अनुच्छेद 297 के अनुसार भारत की समुद्री सीमा, महाद्वीपीय तट और विशेष आर्थिक क्षेत्र में मौजूद सभी तेल और गैस संसाधन केंद्र सरकार के अधिकार में आते हैं.
जमीन मालिक को कितना मिलता है मुआवजा?
अगर किसी निजी जमीन पर तेल या गैस का भंडार मिलता है, तो ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ONGC) जमीन अधिग्रहण के लिए Land Acquisition Act, 1894 का पालन करती है और मुआवजा संबंधित राज्य के राजस्व प्राधिकरण के निर्देशों के अनुसार दिया जाता है. हालांकि, ONGC कई मामलों में जमीन को स्थायी रूप से अधिग्रहित करने के बजाय अस्थायी आधार पर लेती है. यह जमीन किसानों और ONGC की इन-हाउस नेगोशिएटिंग कमेटी के बीच आपसी सहमति से वार्षिक किराए या 33 साल की लीज पर ली जाती है.
इसके अलावा, कुछ मामलों में जमीन का अधिग्रहण डिप्टी कलेक्टर/स्पेशल लैंड एक्विजिशन ऑफिसर (SPLAO)/जिला राजस्व प्राधिकरण के माध्यम से LAQ Act, 1894 के तहत किया जाता है. इसके अलावा, कुछ मामलों में जमीन का अधिग्रहण डिप्टी कलेक्टर/स्पेशल लैंड एक्विजिशन ऑफिसर (SPLAO)/जिला राजस्व प्राधिकरण के माध्यम से LAQ Act, 1894 के तहत किया जाता है.
उदाहरण के तौर पर ऐसे समझें, अगर असम में शहरी क्षेत्र के 10 किलोमीटर के दायरे में जमीन के लिए सालाना 12 लाख रुपये प्रति बीघा तक मुआवजा तय किया गया है. वहीं ग्रामीण क्षेत्र में यह राशि करीब 10 लाख रुपये प्रति बीघा सालाना हो सकती है.
उदाहरण से समझें- अगर असम में जमीन किसी शहर से 10 किलोमीटर के दायरे में आती है तो जमीन मालिक को प्रति बीघा 12 लाख रुपये मुआवजा मिलेगा. वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित जमीन के लिए प्रति बीघा 10 लाख रुपये का पेमेंट किया जाएगा.
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