बुआ ने खोल दी हल्‍दीराम की किस्‍मत, 85000 करोड़ की लगी लॉटरी! 88 साल पुराना खुला राज

देश के जाने-माने स्‍नैक्‍स ब्रांड हल्‍दीराम की दुनियाभर में पॉपुलैरिटी है. इसकी कामयाबी का श्रेय हल्‍दीराम यानी गंगा बिशन अग्रवाल को जाता है, लेकिन क्‍या आपको पता है हकीकत में इस साम्राज्‍य को खड़ा करने के पीछे एक महिला का हाथ था, तो कौन है वो महिला जिसकी बदौलत हल्‍दीराम बीकानेर की गलियों से निकल कर दुनियाभर में मशहूर हो गया, आइए जानते हैं.

हल्‍दीराम की कामयाबी के पीछे इस महिला का था हाथ, जानें अनसुनी कहानी Image Credit: money9

Haldiram’s untold story: हल्दीराम आज हर घर में जाना-पहचाना नाम है. दिल्ली से दुबई तक इसकी चटपटी भुजिया का राज है. यही वजह है कि बीकानेर की गलियों में जीरो से शुरू हुआ ये बिजनेस देखते ही देखते 10 अरब डॉलर की वैल्यूएशन का बन गया है. आज हल्‍दीराम का दुनियाभर में डंका बज रहा है, लेकिन क्‍या आपको पता है इस स्‍नैक्‍स साम्राज्‍य की नींव रखने के पीछे एक महिला का हाथ था, जिनका नाम बिखी बाई था. तो कौन है ये महिला और कैसे हल्‍दीराम ने बुलंदियों का सफर किया तय, जानें अनसुनी कहानी.

हल्‍दीराम की बुआ निकली असली भुजिया क्‍वीन

बीकानेर की तंग गलियों में जहां खाना सिर्फ भोजन नहीं बल्कि परंपरा मानी जाती थी, वहीं से हल्‍दीराम की नींव पड़ी थी. दरअसल हल्‍दीराम यानी गंगा बिशन अग्रवाल की बुआ बिखी बाई को भुजिया बनाने का शौक था. लेखिका पवित्रा कुमार ने अपनी किताब भुजिया बैरन्स में उनके इस अनसुने किस्‍से का जिक्र किया है. उन्‍होंने बताया कि कैसे बिखी बाई अपने परिवार के बच्चों के लिए भुजिया बनाती थीं. उनके लिए भुजिया कोई व्यापार नहीं, बल्कि घर का साधारण नमकीन था. वह बस घर पर इसे बनाती थीं और हल्दीराम व उसके भाइयों को खिलाती थीं. बिखी बुआ की ये मसालेदार नमकीन बच्चों को बेहद पसंद थी.

बच्चों की पसंद से हुई बिजनेस की शुरुआत

बिखी बाई की भुजिया बच्चों में इतनी लोकप्रिय हुई कि हल्दीराम के दादा भिखाराम और उनकी पत्नी ने इसे बाद में बनाना सीखा. भुजिया बैरन्स किताब के मुताबिक, “बिखी बुआ ने अनजाने में एक ऐसी चिंगारी जलाई, जिसने अग्रवाल परिवार की किस्मत बदल दी. हल्‍दीराम की सफलता के पीछे असलियत में इस महिला का हाथ था. उनकी इस अनोखी भुजिया ने परिवार को मुश्किल वक्त में संभाला और आज के स्नैक साम्राज्य की नींव रखी.

नहीं मिला कभी श्रेय

पवित्रा कुमार ने अपनी किताब में लिखा कि मारवाड़ी संस्कृति में पहले महिलाओं को पारिवारिक व्यवसाय में शायद ही कोई पहचान मिलती थी. बिखी बाई की कहानी इसी का उदाहरण है. वह परिवार की देखभाल और पोषण के लिए थीं, उन्‍हें बिजनेस में डायरेक्‍ट नहीं जोड़ा गया, इसी कारण लोग हल्‍दीराम की कामयाबी में उनका नाम नहीं लेते हैं.

अखबार के कोन से 10 अरब डॉलर तक

हल्‍दीराम के दादा भिखाराम ने साल 1908 से 1918 के बीच भुजिया की संभावना देखी और अखबार के छोटे कोन में भुजिया बेचने लगें. हल्दीराम ने 12 साल की उम्र में अपनी बुआ से भुजिया बनाना सीखा. हल्दीराम ने इसमें नयापन जोड़ा और बेसन की जगह मोठ दाल से कुरकुरी भुजिया बनाई, जो हिट हो गई. 1937 में उन्‍होंने बीकानेर में पहली दुकान खोली, जो आज वैश्विक ब्रांड बन चुकी है.

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निवेशकों की हल्‍दीराम पर नजर

देसी नमकीन एंड स्‍वीट्स ब्रांड हल्दीराम की पहुंच अब वैश्विक स्तर तक हो गई है. यही वजह है तमाम दिग्‍गज निवेशक इसकी हिस्‍सेदारी खरीदना चाहते हैं. हाल ही में सिंगापुर की सरकारी निवेश फर्म टेमासेक ने हल्‍दीराम में 10% हिस्सेदारी 1 अरब डॉलर में खरीदी है, जिससे कंपनी की वैल्यू 10 अरब डॉलर हो गई है. बता दें FY24 में हल्दीराम की सालाना आय 12,500 करोड़ रुपये से ज्यादा रही. अब परिवार 2025 में IPO की योजना बना रहा है. आज यह ब्रांड भारत के 6.2 अरब डॉलर के स्नैक बाजार में 13% हिस्सेदारी रखता है और 80 से ज्यादा देशों में मौजूद है.

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