कौन थे इजरायली हमले में मारे गए अली लारिजानी, जिन्हें कहा जाता था खामनेई का राइट हैंड

पश्चिम एशिया तनाव के बीच Ali Larijani की इजरायली हमले में मौत हो गई है. ईरान ने भी उनकी मौत की पुष्टि की है. लारिजानी देश की सुरक्षा रणनीति और युद्ध फैसलों में अहम भूमिका निभा रहे थे. वे पूर्व परमाणु वार्ताकार और लंबे समय तक संसद स्पीकर भी रहे.

Ali Larijani की इजरायली हमले में मौत हो गई है. Image Credit: money9live

Ali Larijani: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान को बड़ा झटका लगा है. Ali Larijani की मौत की पुष्टि हो गई है. ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख रहे लारिजानी को इजरायल ने हवाई हमले में मार गिराने का दावा किया है. ईरान ने भी बाद में इस खबर को सही बताया है. इस हमले में उनके बेटे की भी मौत हुई है. लारिजानी को ईरान की युद्ध रणनीति का अहम चेहरा माना जाता था. उनकी मौत से क्षेत्र में तनाव और बढ़ने की आशंका है.

अली लारिजानी कौन थे

Ali Larijani ईरान के एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से आते थे. उनके कई भाई भी देश के बड़े पदों पर रह चुके हैं. उन्हें एक मजबूत नेता माना जाता था. उन्होंने ईरान की धार्मिक व्यवस्था को हमेशा समर्थन दिया. 1979 की क्रांति के बाद उनका परिवार सत्ता में प्रभावशाली रहा. उन्हें ईरान की राजनीति का अहम चेहरा माना जाता था.

सैन्य और राजनीतिक करियर

लारिजानी ने 1980 के दशक में ईरान इराक युद्ध के दौरान रिवोल्यूशनरी गार्ड में सेवा दी थी. बाद में वे देश के सरकारी ब्रॉडकास्ट प्रमुख भी बने. उन्होंने कई बार राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का नेतृत्व किया. वे 12 साल तक संसद के स्पीकर भी रहे. इसके अलावा उन्होंने मंत्री स्तर के पद भी संभाले. उनके पास सैन्य और राजनीतिक दोनों अनुभव थे.

न्यूक्लियर नेगोशिएशन में निभाई अहम भूमिका

लारिजानी 2005 से 2007 तक ईरान के चीफ न्यूक्लियर नेगोशिएशन रहे. उन्होंने यूरेनियम इनरिचमेंट के ईरान के अधिकार का समर्थन किया. उस समय ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा था. उन्होंने अमेरिका के साथ हुए समझौते को बेहतर समझ की शुरुआत बताया था. उनका मानना था कि बातचीत से तनाव कम हो सकता है. इस भूमिका ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई.

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उनकी मौत का क्या असर होगा

लारिजानी की मौत ईरान के लिए बड़ा झटका है. वे देश की सुरक्षा रणनीति में अहम भूमिका निभा रहे थे. उनकी गैर मौजूदगी से नेतृत्व में खालीपन आ सकता है. इससे कड़े रुख वाले नेताओं का प्रभाव बढ़ सकता है. पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ने की संभावना है. साथ ही किसी समझौते की उम्मीद भी कमजोर पड़ सकती है.