US-ईरान तनाव का भारत पर असर! महंगाई बढ़ने का खतरा, Nifty 20,000 के नीचे जाने की चेतावनी: रिपोर्ट
बर्नस्टीन की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका-ईरान तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत की अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव बना सकती हैं, जिससे महंगाई, रुपये और ग्रोथ पर असर पड़ने की आशंका है. इसी के साथ अगर ये तनाव जारी रहता है तो भारतीय शेयर बाजार पर भी बड़ा डेंट दिख सकता है. पढ़ें रिपोर्ट.
Bernstein Report on India Economy: वैश्विक स्तर पर बढ़ते जियो पॉलिटिकल टेंशन, खासकर अमेरिका और ईरान के बीच टकराव और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल, भारत की अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं. ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन की एक हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो भारत की मैक्रोइकॉनॉमिक्स स्थिरता पर गंभीर असर पड़ सकता है.
कैसी परिस्थितियों का सामना कर सकता है देश?
रिपोर्ट के मुताबिक, ऊंचे स्तर पर टिके कच्चे तेल के दाम और बाहरी फंडिंग की सख्त होती परिस्थितियां भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर कर सकती हैं. बर्नस्टीन ने संकेत दिया है कि अगर यह दबाव जारी रहता है, तो देश को वैसी ही परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है जैसी वैश्विक वित्तीय संकट (GFC) के बाद देखने को मिली थीं. उस समय भारत की आर्थिक वृद्धि दर करीब 10 फीसदी से गिरकर 5 फीसदी पर आ गई थी, महंगाई दो अंकों में पहुंच गई थी और रुपया करीब 30 फीसदी तक कमजोर हुआ था.
कच्चे तेल की बढ़ती कीमत सबसे चिंताजनक
कच्चे तेल की कीमतें इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा जोखिम बनकर उभरी हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि तेल की महंगाई, खुदरा महंगाई (इन्फ्लेशन) को फिर से आरबीआई के निर्धारित दायरे से ऊपर धकेल सकती है. इससे न सिर्फ आम लोगों पर असर पड़ेगा, बल्कि आर्थिक विकास और बाहरी संतुलन पर भी दबाव बढ़ेगा.
निफ्टी 20,000 से नीचे!
अगर स्थिति और बिगड़ती है और यह तनाव 2026 तक जारी रहता है, तो इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे हालात में महंगाई दो अंकों तक पहुंच सकती है, जीडीपी ग्रोथ घटकर 2-3 फीसदी के दायरे में सिमट सकती है, रुपया 110 के पार जा सकता है और शेयर बाजार का प्रमुख सूचकांक निफ्टी 20,000 से नीचे जा सकता है. हालांकि, अगर हालात इतने गंभीर नहीं भी होते, तब भी चुनौतियां कम नहीं होंगी.
बर्नस्टीन का मानना है कि इस गर्मी में महंगाई के 6 फीसदी से ऊपर जाने की पूरी संभावना है. ऐसे में रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कटौती की योजना टल सकती है और कम से कम दो तिमाहियों तक मौद्रिक नरमी में देरी हो सकती है. इसका सीधा असर आर्थिक वृद्धि दर पर पड़ेगा, जो धीरे-धीरे कम हो सकती है.
रुपये पर भी बढ़ सकता है दबाव
विदेशी व्यापार के मोर्चे पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है. ऊंचे कच्चे तेल के दाम आमतौर पर व्यापार घाटे को बढ़ाते हैं, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है. इससे चालू खाते का घाटा भी बढ़ सकता है, जो अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है. रुपये पर भी दबाव बढ़ता दिख रहा है. रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर मौजूदा हालात बने रहते हैं, तो डॉलर के मुकाबले रुपया 97-98 के स्तर को पार कर सकता है.
इससे आयात महंगे होंगे और महंगाई पर अतिरिक्त दबाव बनेगा. हालांकि निकट भविष्य में तनाव कम होने की संभावना से इनकार नहीं किया गया है, लेकिन बर्नस्टीन का मानना है कि आर्थिक ढांचे पर इसका असर शुरू हो चुका है. रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतें इस साल पुराने निचले स्तर पर लौटने की संभावना कम है, जिससे दबाव बना रह सकता है.
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