दुबई-सिंगापुर को जाता है भारतीय एविएशन का ₹2 लाख करोड़… क्या जेवर एयरपोर्ट रोक पाएगा भारत का ‘ट्रांजिट लीकेज’?
भारत का तेजी से बढ़ता एविएशन बाजार अब तक विदेशी हब्स की कमाई बढ़ा रहा था. दुबई और सिंगापुर के जरिए यात्रा करने वाले भारतीय यात्रियों से अरबों का ट्रांजिट और सर्विस रेवेन्यू बाहर जा रहा है. जेवर एयरपोर्ट इस लीकेज को रोकने की नई कोशिश बनकर सामने आया है.
भारत का एविएशन बाजार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इस ग्रोथ की असली कमाई देश के बाहर जा रही है. अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए भारतीय यात्री बड़े पैमाने पर दुबई, दोहा और सिंगापुर जैसे विदेशी हब्स का इस्तेमाल करते हैं, जिससे ट्रांजिट, रिटेल और कनेक्टिंग फ्लाइट्स की हाई-मार्जिन कमाई उन्हीं देशों को मिलती है. इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज उत्तर प्रदेश के जेवर में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का उद्घाटन किया, जहां उनके साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद रहे. यह एयरपोर्ट सिर्फ कनेक्टिविटी नहीं, बल्कि भारत के एविएशन सेक्टर में हो रहे ‘रेवेन्यू लीकेज’ को रोकने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.
विदेशी हब्स पर निर्भर भारत
एविएशन सेक्टर के आंकड़े इस ‘लीकेज’ को साफ दिखाते हैं. CAPA की रिपोर्ट के मुताबिक, FY20 में यूरोप और नॉर्थ अमेरिका जाने वाले करीब 69% भारतीय यात्री दुबई, अबू धाबी और दोहा जैसे विदेशी हब्स के जरिए गए. इसका मतलब है कि भारत का सबसे प्रीमियम इंटरनेशनल ट्रैफिक विदेशी एयरपोर्ट्स के लिए कमाई का जरिया बन रहा है.
इसके अलावा GrabOn के आंकड़े बताते हैं कि भारत के इंटरनेशनल ट्रैफिक में UAE की हिस्सेदारी 27% है. यह ट्रैफिक उस पूरी इकोनॉमी का संकेत है जो ट्रांजिट यात्रियों से बनती है, जिसमें शामिल है ड्यूटी-फ्री, लाउंज, रिटेल और कनेक्टिंग फ्लाइट्स की कमाई.
MRO से भी बाहर जा रहा पैसा
ट्रांजिट ही नहीं, एविएशन का एक और बड़ा पैसा भारत से बाहर जा रहा है- मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO).
भारत की एयरलाइंस ने पिछले दो साल में 1,359 नए विमान ऑर्डर किए हैं, लेकिन आज भी करीब 90 फीसदी विमान मेंटेनेंस विदेशों में होता है, खासकर सिंगापुर, दुबई और मलेशिया में. Upstox ने Grandview Research के हवाले से बताया है कि इस कमी के चलते हर साल लगभग $2.5 बिलियन (2 लाख करोड़ से ज्यादा) भारत से बाहर चले जाते हैं.
यानी तस्वीर साफ है-
- यात्री बाहर connect कर रहे हैं
- विमान बाहर सर्विस हो रहे हैं
दोनों मिलकर भारत के एविएशन सेक्टर में एक बड़ा आर्थिक गैप बना रहे हैं.
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जेवर एयरपोर्ट इस गैप को कैसे भरेगा?
सरकार ने नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट को सिर्फ एक और एयरपोर्ट नहीं, बल्कि मल्टी-मॉडल और ग्लोबल कनेक्टिविटी हब के रूप में डिजाइन किया है. इसके तहत जेवर एयरपोर्ट ट्रांजिट हब के तौर पर विकसित होगा ताकि भारतीय यात्री यहीं से कनेक्ट हों. दूसरा MRO जैसी सेवाओं के आने से विमान मेंटेनेंस का पैसा देश में रोका जा सकेगा.
यमुना एक्सप्रेसवे के पास स्थित यह एयरपोर्ट रोड, रेल और मेट्रो से जुड़ा एक इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट हब बनने की दिशा में है.
यह समझना जरूरी है कि जेवर एयरपोर्ट को ट्रांजिट हब के तौर पर डिजाइन जरूर किया गया है, लेकिन पहले फेज के उद्घाटन के साथ ये सभी सुविधाएं पूरी तरह शुरू नहीं हुई हैं. शुरुआत में सीमित घरेलू उड़ानें ही संचालित होंगी.
क्या है चुनौती?
इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करने के बाद सरकार के लिए असल चुनौती शुरु होगी.इसे एक सफल ट्रांजिट हब में बदलने के लिए जरूरी होगा कि एयरलाइंस यहां अपना मजबूत नेटवर्क विकसित करें, जिससे ज्यादा से ज्यादा कनेक्टिंग फ्लाइट्स संभव हो सकें. साथ ही अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी को तेजी से बढ़ाना होगा, ताकि यह एयरपोर्ट ग्लोबल रूट मैप पर अपनी जगह बना सके. इसके अलावा एयरलाइंस को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धी एयरपोर्ट चार्ज और पर्याप्त स्लॉट उपलब्ध कराना भी अहम होगा. दरअसल, एक ट्रांजिट हब की सफलता पूरी तरह उस एयरलाइन इकोसिस्टम पर निर्भर करती है, जो वहां विकसित होता है, सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर से यह लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता.
भारत के पास यात्री हैं, मांग है और अब इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार हो रहा है. ऐसे में सरकार का प्लान काम करता है तो न सिर्फ ट्रांजिट यात्रियों की कमाई भारत में रुकेगी, बल्कि 2 लाख करोड़ जैसे MRO लीकेज को भी कम किया जा सकता है.
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