₹1.48 लाख करोड़ के ऑयल बांड को PM मोदी ने बताया कांग्रेस का पाप, धोने के लिए चुकाए ₹3 लाख करोड़; जानें पूरा मामला
PM मोदी ने TV9 के WITT Summit 2026 में यूपीए दौर के ऑयल बॉन्ड को “कांग्रेस का पाप” बताते हुए कहा कि 1.48 लाख करोड़ के इस फैसले का बोझ आज 3 लाख करोड़ से ज्यादा हो गया था. जानिए कैसे उस समय सस्ते पेट्रोल-डीजल की कीमत अब तक चुकानी पड़ी थी.
WITT Summit PM Modi Oil Bonds and UPA: पेट्रोल-डीजल की कीमतों और सरकारी नीतियों को लेकर एक बार फिर देश में बहस तेज हो गई है. TV9 नेटवर्क के ‘What India Thinks Today Summit 2026’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने UPA सरकार के दौर में जारी ऑयल बॉन्ड्स को लेकर तीखा हमला बोला. उन्होंने 1.48 लाख करोड़ रुपये के इन बॉन्ड्स को “कांग्रेस का पाप” बताते हुए कहा कि इसे चुकाने में मौजूदा सरकार को 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करने पड़े. प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद एक पुराना लेकिन बेहद अहम आर्थिक मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है कि क्या उस समय सस्ता पेट्रोल-डीजल देने की कीमत आज देश चुका रहा है? आइए पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं.
कांग्रेस सरकार ने क्यों जारी किए थे ऑयल बॉन्ड?
2005 से 2010 के बीच, जब यूपीए सरकार सत्ता में थी, उस समय वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई थीं. ऐसी स्थिति में अगर सरकार सीधे पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाती, तो महंगाई बेकाबू हो सकती थी और आम जनता पर भारी बोझ पड़ता. इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार ने एक वैकल्पिक रास्ता चुना जिसका नाम ऑयल बॉन्ड है. सरकार ने तेल मैनेजमेंट कंपनियों (OMCs) को सब्सिडी का पैसा सीधे नकद देने के बजाय बॉन्ड जारी किए.
यानी सरकार ने कंपनियों से कहा- “अभी पैसा नहीं देंगे, लेकिन बाद में ब्याज के साथ चुका देंगे.” इस कदम से उस समय पेट्रोल-डीजल के दाम नियंत्रित रहे और आम लोगों को राहत मिली, लेकिन वास्तविक लागत को भविष्य के लिए टाल दिया गया.
कैसे पड़ा सरकार के खजाने पर बोझ?
इन ऑयल बॉन्ड्स की कुल वैल्यू करीब 1.3 से 1.48 लाख करोड़ रुपये थी. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. टीवी9 WITT समिट में पीएम मोदी ने कुल बॉन्ड वैल्यू का आंकड़ा भी पेश किया. पीएम मोदी ने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 1.48 लाख करोड़ के ऑयल बांड जारी करने पर खुद कहा था कि हम आने वाली पीढ़ी पर कर्ज का बोझ डाल रहे हैं. ये बॉन्ड लंबी अवधि के थे. इसी के साथ इन पर नियमित ब्याज भी देना पड़ता था जिसकी वजह से इनकी मैच्योरिटी 2020 के बाद शुरू हुई. जैसे-जैसे समय बीता, ब्याज जुड़ता गया और कुल देनदारी बढ़ती चली गई.
प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार, इन बॉन्ड्स के मूलधन और ब्याज को मिलाकर 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान करना पड़ा. इससे इतर, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी कुछ समय पहले कहा था कि इन बॉन्ड्स ने सरकार की वित्तीय क्षमता को सीमित किया और तेल कंपनियों की स्वतंत्रता पर असर डाला.
उस वक्त पेट्रोल-डीजल की कीमतें क्या थीं?
ऑयल बॉन्ड्स की सबसे बड़ी खासियत या कहें रणनीति यह थी कि उस समय पेट्रोल-डीजल की कीमतों को कृत्रिम रूप से कम रखा गया. 2005 से 2010 के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर चुकी थी. 2008 के गर्मियों तक इसकी क्रूड ऑयल की कीमतें 140 डॉलर प्रति डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए थे. क्लीयरटैक्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, औसर स्तर पर पेट्रोल की कीमतें में 2025 में 38 रुपये प्रति लीटर थी वहीं, 2010 तक वह बढ़कर 52 लीटर प्रति लीटर पर पहुंच गई थी.
अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ रही थीं लेकिन आम उपभोक्ता को पूरी लागत नहीं चुकानी पड़ी. सरकार ने अंतर को बॉन्ड्स के जरिए एडजस्ट किया. इसका नतीजा ये हुआ कि उस समय जनता को राहत मिली, महंगाई पर नियंत्रण रहा. लेकिन असली आर्थिक बोझ भविष्य की सरकारों और टैक्सपेयर्स पर चला गया जिसकी बात पीएम मोदी ने टीवी9 समिट में की.
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