जब नहीं था LPG सिलेंडर तो काम देता था ये छुटकू स्टोव, याद है वो पंप और पिन? Gen-Z क्या आप जानते हैं जलाने का तरीका

समय के साथ तकनीक बदलती गई और LPG सिलेंडर ने लगभग हर घर में जगह बना ली. लेकिन 80 और 90 के दशक की पीढ़ी के लिए केरोसिन का वह छोटा सा स्टोव सिर्फ एक उपकरण नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा था. पुराने लोगों को तो इसका इस्तेमाल अच्छी तरह याद है, लेकिन आज की Gen-Z को शायद ही पता हो कि यह स्टोव कैसे जलता था.

केरोसिन स्टोव Image Credit:

आज के समय में रसोई गैस यानी LPG लगभग हर घर की जरूरत बन चुकी है. घर की रसोई हो, होटल हो या कोई छोटा कारोबार, हर जगह गैस सिलेंडर पर ही खाना बनता है. लेकिन इन दिनों पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते युद्ध का असर सिर्फ उन देशों तक सीमित नहीं है. इस जंग की हलचल का असर भारत समेत एशिया के कई देशों की ऊर्जा सप्लाई पर भी दिखने लगा है. जिसका नतीजा ये हो रहा है कि कच्चे तेल और LPG जैसे ईंधन की सप्लाई चेन में रुकावट की चर्चा हो रही है.

ऐसे माहौल में कई लोगों को 90 के दशक का वह छोटा सा केरोसिन वाला स्टोव याद आने लगा है, जिसे लोग आम भाषा में छुटकू स्टोव कहते थे. उस स्टोव में एक छोटा सा पंप और अलग से पतली सी पिन की जरूरत होती थी. पुराने लोगों को तो इसका इस्तेमाल अच्छी तरह याद है, लेकिन आज की Gen-Z को शायद ही पता हो कि यह स्टोव कैसे जलता था और उसमें उस छोटी पिन का क्या काम होता था. आइए जानते हैं.

कैसा होता था यह पुराना केरोसिन स्टोव?

90 के दशक और उससे पहले के समय में घरों में अक्सर पीतल या लोहे का बना केरोसिन स्टोव इस्तेमाल होता था. इसे कई लोग प्राइमस स्टोव भी कहते थे. कुछ स्टोव के बर्नर के बगल में या नीचे वाले हिस्से में एक टैंक जैसा हिस्सा होता था, जिसमें केरोसिन यानी मिट्टी का तेल भरा जाता था. ऊपर बर्नर लगा होता था, जहां से आग निकलती थी. इसके साथ एक छोटा सा पंप भी लगा रहता था, जिससे टैंक के अंदर दबाव बनाया जाता था.

उस दौर में जब LPG सिलेंडर हर घर तक नहीं पहुंचा था, तब यही स्टोव रसोई का सबसे बड़ा सहारा हुआ करता था. घरों से लेकर चाय की दुकानों तक हर जगह यही स्टोव जलता दिखाई देता था.

इस स्टोव को जलाने का तरीका क्या था?

इस स्टोव को जलाना गैस चूल्हे जितना आसान नहीं था. इसके लिए थोड़ा तरीका अपनाना पड़ता था. सबसे पहले स्टोव के टैंक में केरोसिन भरा जाता था. इसके बाद बर्नर के नीचे एक छोटी सी कप जैसी जगह होती थी, जिसे स्पिरिट कप कहा जाता था. इसमें थोड़ा सा अल्कोहल या स्पिरिट डाला जाता था और उसे जलाया जाता था. यह प्रक्रिया बहुत जरूरी होती थी, क्योंकि इससे बर्नर की ट्यूब गर्म हो जाती थी. जब यह ट्यूब गर्म हो जाती थी, तब स्टोव सही तरीके से काम करने लगता था.

जब स्पिरिट लगभग जलने लगती थी, तब स्टोव के पंप को 10 से 20 बार दबाया जाता था. इससे टैंक के अंदर दबाव बनता था और केरोसिन बर्नर तक पहुंचकर गैस की तरह जलने लगता था. अगर सब कुछ सही तरीके से किया गया हो तो स्टोव में नीली और स्थिर लौ निकलती थी, जो खाना बनाने के लिए जरूरी होती थी.

स्टोव में लगी उस पतली पिन का क्या काम था

अब बात करते हैं उस छोटी सी चीज की, जिसे लोग आम भाषा में पिन कहते थे. असल में इसका नाम प्राइमस पिन (Primus Pin) होता था. स्टोव इस्तेमाल करते समय अक्सर बर्नर के छोटे छेद में राख या गंदगी जमा हो जाती थी. इससे आग कमजोर पड़ जाती थी या कभी-कभी स्टोव ठीक से जलता ही नहीं था.

ऐसे में इस पतली पिन को बर्नर के छोटे छेद में डालकर साफ किया जाता था. इससे जमी हुई गंदगी हट जाती थी और स्टोव फिर से तेज लौ पर जलने लगता था. कई बार यह पिन उस समय भी काम आती थी, जब तेल बर्नर तक ठीक से नहीं पहुंच रहा होता था. पिन से हल्का सा रास्ता साफ कर देने पर तेल आसानी से ऊपर आ जाता था और स्टोव फिर सामान्य तरीके से जलने लगता था.

उस दौर में हर घर की पहचान था यह स्टोव

आज के समय में गैस चूल्हा जलाना बस एक नॉब घुमाने जितना आसान है. लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब घरों में खाना बनाने के लिए इसी केरोसिन स्टोव पर भरोसा किया जाता था.सुबह चाय बनानी हो, दाल चढ़ानी हो या दुकान पर ग्राहकों के लिए चाय तैयार करनी हो, हर जगह यही स्टोव दिखाई देता था. उस दौर के लोगों को आज भी याद है कि स्टोव जलाने से पहले पंप करना, स्पिरिट जलाना और जरूरत पड़ने पर पिन से बर्नर साफ करना रोजमर्रा की बात हुआ करती थी.

आज की Gen-Z के लिए यह शायद सिर्फ एक पुरानी चीज हो, लेकिन उस दौर के लोगों के लिए यही छुटकू स्टोव और उसकी छोटी सी पिन रसोई का असली हीरो हुआ करते थे.

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