SEBI ने इंट्राडे बॉरोइंग के नियमों में किया बदलाव, म्यूचुअल फंड्स को मिली बड़ी छूट
यह कदम म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री की उन चिंताओं के बाद उठाया गया है जो उन्होंने इस साल की शुरुआत में जारी नियमों को लेकर जताई थी. उनका कहना था कि मौजूदा पाबंदियों से फंड का सही तरीके से मैनेजमेंट करने में रुकावट आ सकती है.
मार्केट रेगुलेटर ‘सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया’ (SEBI) ने म्यूचुअल फंड की इंट्राडे उधारी (दिन के दौरान ली जाने वाली उधारी) से जुड़े नियमों में बदलाव को मंजूरी दे दी है. इससे एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) को निवेशकों के रिडेम्पशन (पैसे निकालने) के अलावा, कामकाज से जुड़ी कई अन्य जरूरतों के लिए शॉर्ट-टर्म बैंक उधारी का इस्तेमाल करने में ज्यादा आसानी होगी.
यह कदम म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री की उन चिंताओं के बाद उठाया गया है जो उन्होंने इस साल की शुरुआत में जारी नियमों को लेकर जताई थी. उनका कहना था कि मौजूदा पाबंदियों से फंड का सही तरीके से मैनेजमेंट करने में रुकावट आ सकती है.
क्या है मौजूदा नियम?
अभी, म्यूचुअल फंड को मुख्य रूप से रिडेम्पशन पेमेंट, ब्याज के पेमेंट और इनकम डिस्ट्रीब्यूशन-कम-कैपिटल विड्रॉल (IDCW) की जरूरतों को पूरा करने के लिए इंट्राडे उधार लेने की इजाजत है. ऐसे उधार की सीमा उसी दिन मिलने वाली गारंटीड रकम से तय होती है.
नए नियमों से क्या बदलेगा?
नए नियमों के तहत, SEBI ने इंट्राडे उधार के इस्तेमाल का दायरा बढ़ा दिया है. अब फंड हाउस इनका इस्तेमाल कैश मैनेजमेंट के कामों के लिए कर सकते हैं, जैसे कि सिक्योरिटीज़ के ट्रेड का सेटलमेंट, विदेशी मुद्रा के लेन-देन, डेरिवेटिव पोजीशन से जुड़ी मार्क-टू-मार्केट देनदारियां और पहले से लिए गए उधार को चुकाना.
रेगुलेटर ने पाया कि इंट्राडे उधार को सिर्फ रिडेम्पशन से जुड़े पेमेंट तक सीमित रखने से ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी कम हो सकती है और स्कीम के रिटर्न पर असर पड़ सकता है.
पाबंदियों में ढील
SEBI ने उधार ली जा सकने वाली रकम पर लगी पाबंदियों में भी ढील दी है. इसके तहत AMC को ऐसे संभावित इनफ्लो (आने वाली रकम) को भी ध्यान में रखने की इजाजत दी गई है जिनकी औपचारिक रूप से गारंटी नहीं है. इनमें सेकेंडरी मार्केट में बिक्री से मिलने वाली रकम, मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम और सेटलमेंट से जुड़े दूसरे कैश फ्लो शामिल हैं. इससे फंड हाउस गारंटीड रिसीवेबल्स (गारंटीड मिलने वाली रकम) के लेवल से अधिक उधार ले सकेंगे.
AMC को क्या करना होगा?
हालांकि, AMC को यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी सभी उधारी ट्रेडिंग का दिन खत्म होने से पहले चुका दी जाए. अगर उसी दिन के बाद भी कोई रकम बकाया रहती है, तो उसे सामान्य उधारी माना जाएगा और उस पर म्यूचुअल फंड नियमों के तहत तय उधारी की सीमाएं लागू होंगी.
इस कदम का मकसद क्या है?
SEBI के मुताबिक, इस कदम का मकसद रोजाना के सेटलमेंट साइकल के दौरान पेमेंट की जिम्मेदारियों और आने वाले कैश फ्लो के बीच समय के अंतर (टाइमिंग मिसमैच) को दूर करना है. इंडस्ट्री बॉडी AMFI ने बताया था कि फंड हाउस अक्सर ऐसी स्थितियों का सामना करते हैं जहां सिक्योरिटीज, फॉरेक्स सेटलमेंट या डेरिवेटिव से जुड़ी पेमेंट की जिम्मेदारियां दिन की शुरुआत में ही पूरी करनी होती हैं, जबकि उनसे मिलने वाली रकम बाद में क्रेडिट होती है.
नुकसान का बोझ कौन उठाएगा?
रेगुलेटर ने कहा कि इंट्राडे बॉरोइंग (दिन के दौरान उधार लेने) की लागत और उम्मीद के मुताबिक फंड मिलने में देरी से होने वाले किसी भी नुकसान का बोझ म्यूचुअल फंड निवेशकों के बजाय AMC उठाएगी. इससे यह सुनिश्चित होगा कि यूनिटहोल्डर्स पर इन ऑपरेशनल लागतों का असर न पड़े.
SEBI का मानना है कि इन बदलावों से लिक्विडिटी मैनेजमेंट बेहतर होगा, कैश की अस्थायी कमी के समय एसेट को मजबूरी में बेचने की जरूरत कम होगी और इन्वेस्टमेंट व सेटलमेंट की गतिविधियों को आसानी से पूरा करने में मदद मिलेगी.
ऑपरेशनल काम-काज में आसानी
उम्मीद है कि रेगुलेटर के इस फैसले से म्यूचुअल फंड्स को ऑपरेशनल काम-काज में अधिक आसानी होगी और साथ ही निवेशकों के हितों की सुरक्षा भी होगी, क्योंकि उधार लेने की लागत या कैश आने में देरी से होने वाले नुकसान का बोझ फंड हाउस ही उठाएंगे.
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