MTF को लेकर SEBI का बड़ा प्रस्ताव, NCD के जरिये फंड जुटा सकेंगे ब्रोकर, लेकिन मार्जिन में राहत नहीं
SEBI के प्रस्तावों से ब्रोकर्स की फंड जुटाने की क्षमता बढ़ सकती है और MTF कारोबार का साइज भी बड़ा हो सकता है. हालांकि सेबी ने रिस्क को देखते हुए कैश फंडेड MTF पर 50 प्रतिशत मार्जिन की शर्त बरकरार रखने का फैसला किया है. इससे साफ है कि SEBI विकास और रिस्क मैनेजमेंट के बीच संतुलन बनाए रखना चाहता है.
Sebi New Rule For MTF : भारतीय शेयर बाजार रेगुलेटल SEBI ने मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी (MTF) से जुड़े नियमों में कई महत्वपूर्ण बदलावों का प्रस्ताव रखा है. इन प्रस्तावों का मकसद ब्रोकर्स के लिए फंड जुटाने के नए रास्ते खोलना, रिस्क मैनेजमेंट को मजबूत करना और निवेशकों की सुरक्षा बढ़ाना है.
NCD के जरिये MTF फंडिंग की अनुमति
फिलहाल ब्रोकर MTF के लिए मुख्य रूप से अपनी पूंजी और बैंकों से लिए गए कर्ज का उपयोग करते हैं. अब SEBI ने प्रस्ताव दिया है कि ब्रोकर लिस्टेड नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर (NCD) और अन्य स्वीकृत डेट इंस्ट्रूमेंट्स के जरिये भी फंड जुटाकर MTF फाइनेंसिंग कर सकेंगे. SEBI का मानना है कि इससे ब्रोकर्स के लिए फंडिंग के विकल्प बढ़ेंगे, लिक्विडिटी बेहतर होगी और बैंक कर्ज पर निर्भरता कम होगी.
MTF एक्सपोजर बढ़ाने का प्रस्ताव
अभी किसी ब्रोकर का MTF कारोबार मुख्य रूप से उसकी नेटवर्थ के आधार पर तय होता है. नए प्रस्ताव के तहत NCD समेत योग्य बाहरी उधार को भी MTF एक्सपोजर की गणना में शामिल किया जाएगा. इससे ब्रोकर अधिक फंडिंग क्षमता हासिल कर सकेंगे और अपने ग्राहकों को ज्यादा MTF सुविधा दे पाएंगे.
कैश फंडेड MTF पर मार्जिन में कोई राहत नहीं
ब्रोकिंग इंडस्ट्री ने SEBI से मांग की थी कि कैश फंडेड MTF में शुरुआती मार्जिन 50 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत किया जाए. लेकिन SEBI ने इस मांग को खारिज कर दिया है. सेबी का कहना है कि ऐसे मामलों में “रॉन्ग-वे रिस्क” मौजूद रहता है. यदि जिस शेयर को फाइनेंस किया गया है उसका भाव गिरता है, तो उसी समय गिरवी रखी गई सिक्योरिटी की वैल्यू भी घट जाती है. इससे ब्रोकर का जोखिम बढ़ जाता है. इसी वजह से SEBI ने कैश फंडेड MTF के लिए न्यूनतम 50 प्रतिशत शुरुआती मार्जिन बनाए रखने का प्रस्ताव दिया है.
EPI से मिली रकम भी बनेगी कोलेटरल
SEBI ने प्रस्ताव दिया है कि अर्ली पे-इन (EPI) मैकेनिज्म से मिलने वाली रकम को भी MTF के लिए स्वीकार्य कोलेटरल माना जाए. इससे सेटलमेंट से जुड़ी ऑपरेशनल संबंधी दिक्कतें कम हो सकती हैं और ब्रोकर्स को अतिरिक्त सुविधा मिलेगी.
MTF देने वाले ब्रोकर्स के लिए नेटवर्थ की शर्त सख्त
SEBI ने MTF सुविधा देने वाले ब्रोकर्स की न्यूनतम नेटवर्थ सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है. वर्तमान में यह सीमा 3 करोड़ रुपये है, जिसे बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये किया जा सकता है. सेबी का मानना है कि मजबूत पूंजी वाले ब्रोकर ही मार्जिन फाइनेंसिंग का कारोबार करें, जिससे निवेशकों की सुरक्षा बेहतर हो सके.
ऑटो-प्लेज सिस्टम को मिलेगा बढ़ावा
SEBI ने प्लेज की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए भी बदलाव सुझाए हैं. यदि ग्राहक पहले से निर्धारित नियमों के तहत सहमति दे चुका है, तो ब्रोकर को हर बार अलग से अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी और वह ऑटो-प्लेज मैकेनिज्म के तहत प्लेज शेयरों को इनवोक कर सकेगा.
पूरे इंडस्ट्री में एक जैसा MTF एग्रीमेंट
SEBI ने MTF एग्रीमेंट को मानकीकृत करने का भी प्रस्ताव रखा है. इसके तहत सभी ब्रोकर्स के लिए ग्राहकों के अधिकार और जिम्मेदारियों से जुड़े नियम एक समान होंगे. इससे अनुबंधों में असमानता कम होगी और निवेशकों की सुरक्षा बढ़ेगी.
अयोग्य हुई सिक्योरिटी के लिए 30 दिन का समय
यदि कोई शेयर या ETF MTF अथवा कोलेटरल के लिए पात्रता खो देता है, जैसे:
- ग्रुप-I से बाहर हो जाए
- ट्रेड-फॉर-ट्रेड सेगमेंट में चला जाए
- सामान्य ट्रेडिंग से निलंबित हो जाए
तो ब्रोकर को स्थिति संतुलित करने के लिए 30 दिन का समय मिलेगा.
सिंगल क्लाइंट लिमिट में राहत
यदि किसी ग्राहक का MTF एक्सपोजर 10 प्रतिशत की सीमा से ऊपर सिर्फ इसलिए चला जाता है क्योंकि ब्रोकर का कुल MTF बुक घट गया है, तो इसे नियम उल्लंघन नहीं माना जाएगा. हालांकि ऐसे मामलों में ग्राहक को 30 दिनों के भीतर एक्सपोजर कम करना होगा और तब तक उसे अतिरिक्त MTF नहीं दिया जाएगा.
कोलेटरल के रूप में नई सिक्योरिटीज पर अलग चर्चा
SEBI ने इस पर अभी कोई फैसला नहीं लिया है कि MTF के लिए कौन-कौन सी नई सिक्योरिटीज को पात्र बनाया जाए. सेबी जल्द ही इस विषय पर अलग कंसल्टेशन पेपर जारी करेगा. बाजार में चर्चा है कि भविष्य में निम्नलिखित निवेश साधनों को MTF कोलेटरल के रूप में शामिल किया जा सकता है:
- सरकारी बॉन्ड (G-Secs)
- म्यूचुअल फंड यूनिट्स
- सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB)
- कमोडिटी ETF
- डेट ETF
- REITs
- InvITs
SEBI के प्रस्तावों से ब्रोकर्स की फंड जुटाने की क्षमता बढ़ सकती है और MTF कारोबार का साइज भी बड़ा हो सकता है. हालांकि सेबी ने रिस्क को देखते हुए कैश फंडेड MTF पर 50 प्रतिशत मार्जिन की शर्त बरकरार रखने का फैसला किया है. इससे साफ है कि SEBI विकास और रिस्क मैनेजमेंट के बीच संतुलन बनाए रखना चाहता है.
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