ज्वाइंट ओनरशिप में घर खरीदने का है प्लान? फायदे के साथ छिपे हैं कुछ जोखिम भी; निवेश से पहले समझ लें पूरा गणित
ज्वाइंट ओनरशिप में प्रॉपर्टी खरीदना कई लोगों के लिए वित्तीय बोझ कम करने का प्रभावी तरीका बन रहा है. इससे खरीदारों को बड़ी प्रॉपर्टी खरीदने, होम लोन लेने, टैक्स लाभ हासिल करने और स्टांप ड्यूटी में छूट का फायदा मिल सकता है. हालांकि, इसके साथ सह-मालिकों की सहमति, कानूनी विवाद, EMI भुगतान की जिम्मेदारी और क्रेडिट स्कोर से जुड़े जोखिम भी होते हैं.
Joint Property Ownership: घर खरीदना ज्यादातर लोगों के जीवन का सबसे बड़ा वित्तीय फैसला माना जाता है. बढ़ती प्रॉपर्टी कीमतों और होम लोन की ऊंची लागत के बीच कई लोग अपने जीवनसाथी, परिवार के सदस्य या बिजनेस पार्टनर के साथ मिलकर प्रॉपर्टी खरीदना पसंद करते हैं. ज्वाइंट ओनरशिप न केवल वित्तीय बोझ को कम कर सकती है, बल्कि कई मामलों में टैक्स लाभ, स्टांप ड्यूटी में छूट और अधिक कीमत वाली प्रॉपर्टी खरीदने का अवसर भी प्रदान करती है. हालांकि, इसके साथ कुछ जोखिम और जिम्मेदारियां भी जुड़ी होती हैं, जिन्हें समझना जरूरी है.
क्या होती है ज्वाइंट ओनरशिप
जब किसी प्रॉपर्टी का मालिक एक से अधिक व्यक्ति होते हैं, तो उसे ज्वाइंट ओनरशिप कहा जाता है. इसमें सभी सह-मालिकों के अधिकार और जिम्मेदारियां निर्धारित होती हैं. भारत में पति-पत्नी, परिवार के सदस्य या बिजनेस पार्टनर अक्सर इस मॉडल के तहत प्रॉपर्टी खरीदते हैं.
कुछ मामलों में प्रत्येक व्यक्ति की हिस्सेदारी तय होती है, जबकि कुछ व्यवस्थाओं में सभी सह-मालिकों को बराबर अधिकार प्राप्त होते हैं. यदि किसी सह-मालिक की मृत्यु हो जाती है, तो उसकी हिस्सेदारी के हस्तांतरण से जुड़े नियम भी स्वामित्व के प्रकार पर निर्भर करते हैं.
ज्वाइंट ओनरशिप के बड़े फायदे
प्रॉपर्टी खरीदने में सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय व्यवस्था होती है. ज्वाइंट ओनरशिप इस बोझ को कई लोगों के बीच बांट देती है. इससे खरीदारों की खरीदने की क्षमता बढ़ जाती है और वे बेहतर लोकेशन या अधिक कीमत वाली प्रॉपर्टी खरीद सकते हैं. इसके अलावा, प्रॉपर्टी की मरम्मत, रखरखाव और अन्य खर्च भी सभी सह-मालिकों के बीच साझा हो जाते हैं. कई राज्यों में महिला सह-मालिक होने पर स्टांप ड्यूटी में छूट भी मिलती है, जिससे कुल लागत कम हो सकती है.
यदि प्रॉपर्टी को किराये पर दिया जाता है, तो उससे होने वाली आय भी सभी सह-मालिकों के बीच बंटती है. वहीं, परिवार के मामलों में कई बार एक सह-मालिक की मृत्यु के बाद प्रॉपर्टी का स्वामित्व सीधे दूसरे सह-मालिक को हस्तांतरित हो जाता है, जिससे उत्तराधिकार प्रक्रिया आसान हो जाती है.
क्या हैं इसके जोखिम
ज्वाइंट ओनरशिप के साथ कुछ चुनौतियां भी आती हैं. सबसे बड़ी समस्या निर्णय लेने की होती है. प्रॉपर्टी बेचने, किराये पर देने, गिरवी रखने या उसमें बदलाव करने जैसे फैसलों के लिए सभी सह-मालिकों की सहमति जरूरी हो सकती है. यदि सह-मालिकों के बीच मतभेद पैदा हो जाएं, तो मामला कानूनी विवाद तक पहुंच सकता है. खासकर पारिवारिक मामलों में ऐसे विवाद रिश्तों पर भी असर डाल सकते हैं.
इसके अलावा, यदि प्रॉपर्टी होम लोन के जरिए खरीदी गई है, तो सभी सह-उधारकर्ता EMI चुकाने के लिए जिम्मेदार होते हैं. किसी एक व्यक्ति द्वारा भुगतान में चूक होने पर सभी आवेदकों का क्रेडिट स्कोर प्रभावित हो सकता है.
टैक्स में भी मिलते हैं फायदे
Income Tax Act, 1961 की धारा 26 के तहत, यदि किसी प्रॉपर्टी में सभी सह-मालिकों की हिस्सेदारी स्पष्ट रूप से निर्धारित है, तो उस प्रॉपर्टी से होने वाली आय पर प्रत्येक सह-मालिक को उसकी हिस्सेदारी के अनुसार अलग-अलग टैक्स देना होता है.
इसके अलावा, धारा 24(b) के तहत स्वयं उपयोग की जाने वाली प्रॉपर्टी पर प्रत्येक सह-मालिक होम लोन के ब्याज भुगतान पर सालाना 2 लाख रुपये तक की टैक्स कटौती का दावा कर सकता है. वहीं, धारा 80C के तहत प्रत्येक सह-मालिक होम लोन के मूलधन भुगतान पर प्रति वित्त वर्ष 1.5 लाख रुपये तक की कटौती का लाभ उठा सकता है.
फैसला लेने से पहले रखें इन बातों का ध्यान
ज्वाइंट ओनरशिप उन लोगों के लिए फायदेमंद हो सकती है, जो बड़ी प्रॉपर्टी खरीदना चाहते हैं या वित्तीय बोझ को साझा करना चाहते हैं. हालांकि, प्रॉपर्टी खरीदने से पहले सभी सह-मालिकों की हिस्सेदारी, अधिकार, जिम्मेदारियां और भविष्य की योजनाएं स्पष्ट रूप से तय कर लेना जरूरी है. सही योजना और स्पष्ट समझौते के साथ ज्वाइंट ओनरशिप एक लाभदायक निवेश साबित हो सकती है.
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