क्या लगेज इंडस्ट्री की ‘Indigo’ बन पाएगी Safari? ब्रोकरेज ने गिनाईं लीडर बनने की शर्तें, हाई से 19.5% नीचे है स्टॉक
भारतीय लगेज इंडस्ट्री में एक कंपनी की रणनीति पर निवेशकों की नजर टिकी है. बढ़ती प्रतिस्पर्धा, बदलते बाजार और नए अवसरों के बीच यह सवाल अहम है कि क्या यह कंपनी समय रहते खुद को बाकी खिलाड़ियों से अलग पहचान दिला पाएगी और लीडरशिप की दौड़ में आगे निकल सकेगी.
भारतीय एविएशन सेक्टर में IndiGo ने जिस तरह समय रहते अपनी रणनीति बदली और खुद को बाकी कंपनियों से अलग किया, उसी मॉडल की चर्चा अब लगेज इंडस्ट्री में होने लगी है. ये चर्चा Safari Industries के लिए हो रही है भी लगेज सेक्टर की “Indigo” बन सकती है? ब्रोकरेज फर्म PL Capital का मानना है कि अगर Safari ने अभी से सही कदम उठाए, तो वह खुद को एक अलग और मजबूत मार्केट लीडर के तौर पर स्थापित कर सकती है.
इंडिगो मॉडल से क्या सीख मिलती है
जनवरी से अक्टूबर 2025 के बीच इंडिगो का घरेलू एविएशन मार्केट में 64.5% हिस्सा रहा. Air India और Akasa Air जैसे खिलाड़ी मौजूद होने के बावजूद इंडिगो ने समय रहते प्रीमियम सेगमेंट और लॉन्ग-हॉल इंटरनेशनल रूट्स पर फोकस किया. यही रणनीति उसे बाकी कंपनियों से आगे ले गई.
PL Capital का तर्क है कि Safari भी अब उसी मोड़ पर खड़ी है, जहां आगे की सोच जरूरी हो गई है. सोमवार को कंपनी के शेयरों में मामूली गिरावट देखने को मिली. दोपहर 2.40 बजे कंपनी के शेयर 2,160 रुपये पर ट्रेड कर रही थी. बीते पांच वर्षों में कंपनी के शेयरों ने 724 फीसदी का रिटर्न दिया है. कंपनी का 52 वीक हाई 2686 रुपये है, वहीं इसका लो 1670 रुपये है. यानी मौजूदा कीमत 52 वीक हाई से लगभग 19.5% नीचे है .
Safari की बढ़ती पकड़, लेकिन चुनौती भी
Safari का मार्केट शेयर 1QFY24 में 24.9% था, जो 2QFY26 तक बढ़कर 38% हो गया. यह तेजी दिखाती है कि कंपनी ने बीते कुछ सालों में मजबूत पकड़ बनाई है. लेकिन अब हालात बदल रहे हैं.
VIP Industries में मैनेजमेंट बदलाव के बाद प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है. वहीं Samsonite इंडिया ने भी छह तिमाहियों की गिरावट के बाद 2QFY26 में 8.5% की ग्रोथ दर्ज की है. नए D2C ब्रांड भी बाजार में दबाव बढ़ा रहे हैं.
प्रीमियम सेगमेंट क्यों जरूरी है
Safari ने Urban Jungle और Safari Select जैसे प्रीमियम ब्रांड लॉन्च किए हैं. फिलहाल ये ब्रांड कंपनी की कुल आय में करीब 5% का योगदान दे रहे हैं. समस्या यह है कि खुद से बनाए गए ब्रांड को उपभोक्ताओं की पहली पसंद बनने में समय लगता है. PL Capital का मानना है कि प्रीमियम सेगमेंट में तेजी से स्केल पाने के लिए किसी मजबूत D2C या स्थापित ब्रांड का अधिग्रहण एक व्यावहारिक रास्ता हो सकता है.
नई जियोग्राफी में उतरना चुनौतीपूर्ण है. ब्रांड पहचान, डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क, कच्चे माल की उपलब्धता और सरकारी नियम बड़ी बाधाएं हैं.
| चुनौती | संभावित समाधान | उदाहरण |
|---|---|---|
| ब्रांड पहचान | भारतीय डायस्पोरा वाले क्षेत्र | पड़ोसी, नॉन-होस्टाइल देश |
| डिस्ट्रीब्यूशन | समय लेने वाली प्रक्रिया | सीधा समाधान नहीं |
| कच्चा माल | PP, PC, नायलॉन वाले क्षेत्र | गल्फ रीजन |
| नियम-कानून | फ्री ट्रेड जोन | FTZ वाले देश |
मार्केट लीडर को क्यों मिलता है प्रीमियम
स्टॉक मार्केट “डिस्टिंक्ट लीडर” को ज्यादा वैल्यू देता है. स्टेशनरी में DOMS और हॉस्पिटैलिटी में IHCL इसके उदाहरण हैं, जहां लीडर को peers पर भारी प्रीमियम मिला है. Safari और VIP के वैल्यूएशन में फिलहाल बड़ा अंतर नहीं है. लेकिन अगर Safari खुद को साफ तौर पर लीडर बना लेती है, तो यह अंतर तेजी से बढ़ सकता है.
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PL Capital ने Safari पर BUY रेटिंग दी है, जबकि VIP पर HOLD की सलाह रखी है. ब्रोकरेज का मानना है कि अगर Safari प्रीमियमाइजेशन या विदेशी विस्तार में से किसी एक रणनीति को सफलतापूर्वक लागू कर लेती है, तो वह लगेज इंडस्ट्री की “Indigo” बन सकती है और निवेशकों के लिए बड़ा री-रेटिंग अवसर पैदा कर सकती है.
डिस्क्लेमर: Money9live किसी स्टॉक, म्यूचुअल फंड, आईपीओ में निवेश की सलाह नहीं देता है. यहां पर केवल स्टॉक्स की जानकारी दी गई है. निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय जरूर लें.