US-Iran टकराव के बीच जर्मनी ने झाड़ा पल्ला! बोला- ‘ये हमारी लड़ाई नहीं’, दुनिया की अर्थव्यवस्था पर बड़ा खतरा
अमेरिका-ईरान युद्ध पर जर्मनी ने साफ रुख अपनाया है. रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने इसे वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए “तबाही” बताया और कहा कि यह उनकी लड़ाई नहीं है. जर्मनी ने युद्ध से दूरी बनाते हुए सीजफायर और कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया है.
Germany’s stance on Iran war: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने दुनिया भर में चिंता बढ़ा दी है, लेकिन जर्मनी ने साफ कर दिया है कि वह इस जंग का हिस्सा नहीं बनना चाहता. जर्मन रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस का बयान यूरोप के उस फैसले को दिखाता है जिसमें युद्ध से दूरी और समाधान के लिए बातचीत को प्राथमिकता दी जा रही है.
“यह हमारी लड़ाई नहीं है”
ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में मीडिया से बात करते हुए जर्मन रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने कहा कि यह युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए “कैटास्ट्रॉफी” है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जर्मनी को इस संघर्ष में पहले से शामिल नहीं किया गया था और “यह हमारी लड़ाई नहीं है, इसलिए हम इसमें खिंचना नहीं चाहते.” साथ ही उन्होंने जल्द से जल्द सीजफायर की अपील भी की.
जर्मनी ने दूरी क्यों बनाई?
जर्मनी के इस फैसले के पीछे कई रणनीतिक और कानूनी कारण हैं. सबसे बड़ा कारण यह है कि इस युद्ध को लेकर न तो NATO, न ही संयुक्त राष्ट्र (UN) या यूरोपीय संघ (EU) का कोई स्पष्ट जनादेश है. जर्मनी के कानून के अनुसार बिना ऐसे अंतरराष्ट्रीय समर्थन के वह किसी सैन्य अभियान में हिस्सा नहीं ले सकता.
इसके अलावा, जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों का कहना है कि अमेरिका और इजरायल ने इस कार्रवाई से पहले अपने सहयोगियों से सलाह नहीं ली, जिससे यूरोप खुद को इस संघर्ष से अलग रख रहा है.
युद्ध के बीच जर्मनी की भूमिका
AP की रिपोर्ट के मुताबिक, जर्मनी सैन्य रूप से इस जंग में शामिल नहीं है, लेकिन उसकी भूमिका पूरी तरह निष्क्रिय भी नहीं है. जर्मनी लगातार कूटनीतिक समाधान पर जोर दे रहा है और युद्ध खत्म होने के बाद शांति स्थापित करने में मदद की पेशकश कर चुका है. इसके अलावा, जर्मनी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बातचीत और सहयोग के लिए तैयार है, लेकिन सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बच रहा है.
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जर्मनी जैसे निर्यात-आधारित देश के लिए यह युद्ध आर्थिक जोखिम भी पैदा कर रहा है. तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक सप्लाई चेन पर असर को देखते हुए जर्मनी इस संघर्ष को लंबा खिंचने से रोकना चाहता है. यही वजह है कि पिस्टोरियस ने इसे “दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए तबाही” बताया.
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