न जमीन… न हरियाली, धोखे से मिला था नाम; अब सत्ता के वैश्विक खेल में कीमती मोहरा कैसे बन गया ग्रीनलैंड?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तीखे बयानों ने ग्रीनलैंड को विश्व के पटल पर सुर्खियों में ला दिया है. ट्रंप का रुख ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक भी नजर आता है और इसके पीछे की तमाम वजहें अंगुलियों पर गिनाई भी जा रही हैं. असल में ग्रीनलैंड सदियों से अपनी सामरिक महत्व का दावा कर सकता है.

ग्रीनलैंड कैसे बना दुनिया में चर्चा का केंद्र. Image Credit: Getty image/Money9live

इतिहास अक्सर राजाओं और युद्धों से शुरू होता है. लेकिन बर्फ की चादरों और ऊबड़-खाबड़ टुंड्रा से ढके ग्रीनलैंड के मामले में यह देश निकाला और खोज से शुरू हुआ. उत्तरी अटलांटिक के ठंडे पानी में स्थित और आर्कटिक सर्कल से गुजरने वाले इस इलाके पर कब्जे को लेकर कई लोक कथाएं मशहूर हैं, लेकिन इतिहास के पीले पन्नों में औपचारिक रूप से मालिकाना हक की सफल कवायद 10वीं सदी में दर्ज है. कम आबादी वाला यह इलाका लंबे समय से जियोपॉलिटिक्स और इतिहास के हाशिये पर चुपचाप बैठा हुआ लगता था. लेकिन ग्रीनलैंड हमेशा उतना ही महत्वपूर्ण रहा है जितना सोचा जा सकता है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तीखे बयानों ने ग्रीनलैंड को विश्व के पटल पर सुर्खियों में ला दिया है. ट्रंप का रुख ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक भी नजर आता है और इसके पीछे की तमाम वजहें अंगुलियों पर गिनाई भी जा रही हैं. ग्रीनलैंड की ताकत और खासियतों के वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पिघलती बर्फ की तरह फैलने लगे हैं और उत्तरी अटलांटिक के इलाके में जियोपॉलिटिकल तापमान चढ़ने लगा है.

वाइकिंग्स से लेकर शीत युद्ध तक

असल में ग्रीनलैंड सदियों से अपनी सामरिक महत्व का दावा कर सकता है. यह वाइकिंग्स से लेकर शीत युद्ध की महाशक्तियों तक कई इतिहासों से जुड़ा हुआ है, वे सभी इसपर अपनी सोच थोपना चाहते थे. इस आइलैंड को 1953 में औपचारिक रूप से डेनिश किंगडम में शामिल कर लिया गया था, लेकिन तब से यह अपने संप्रभु राज्य से ज्यादा से ज्यादा से आजाद होता जा रहा है और इसने ऐसे कानून बनाए हैं जिनसे अपने शासन की जिम्मेदारी बढ़ी है.

ग्रीनलैंड आधिकारिक तौर पर एक देश नहीं है, बल्कि डेनमार्क किंगडम का एक इलाका है जो सेल्फ-गवर्नेंस की दिशा में आगे बढ़ रहा है. यह अब ज्यादातर घरेलू मामलों में खुद शासन करता है, जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य और प्राकृतिक संसाधन शामिल हैं, लेकिन डेनमार्क रक्षा और विदेश मामलों पर अपना कंट्रोल रखता है.

हजारों सालों के प्रीहिस्ट्री के दौरान, पैलियो-एस्किमो लोग ग्रीनलैंड में गए और वहां के बड़े शिकार के मैदानों का इस्तेमाल करके उसकी क्षमता को जानने की कोशिश की. लेकिन इन लोगों के लिए जिंदा रहना लगातार एक चुनौती बनी रही. जिंदा रहने के लिए उन्हें बदलती बर्फ की गहरी जानकारी और आर्कटिक मौसमों की लय पर महारत हासिल करना जरूरी था.

मालिकाना हक की शुरुआत

ग्रीनलैंड कम से कम 4,500 वर्षों तक इसी हालत में रहा. छोटे-छोटे समूह, जो इससे होकर गुजरते, उन्हें आसरा देता रहा. यह तब तक चलता रहा, जब तक की एरिक द रेड नहीं आ गया. 982 और 985 ईस्वी के बीच एरिक द रेड ने बर्फ की सफेद चादर पर कदम रखा. ग्रीनलैंड पर औपचारिक रूप से पहला असली ‘मालिकाना हक’ 10वीं सदी के आखिर में एरिक द रेड के आने से जोड़ा जा सकता है.

आइसलैंड से हत्या करने के आरोप में निकाले जाने के बाद, एरिक पश्चिम की ओर रवाना हुआ और उसे ग्रीनलैंड मिला. उसने लोगों को इस बर्फीली जमीन पर बसाने के लिए धोखे से इस इलाके को ग्रीनलैंड का नाम दिया. उसकी यह चाल काम कर गई. द्वीप के दक्षिण-पश्चिमी तट पर छोटी-छोटी बस्तियां बस गईं. ये बसने वाले लोग सदियों तक टिके रहे, लेकिन ठंड से जूझते रहे. गुजारा करने के लिए खेती करते या फिर यूरोप के साथ व्यापार करते.

ये वाइकिंग ग्रीनलैंडर इतने मशहूर थे कि वे अपनी खुद की गाथा ‘सागा ऑफ द ग्रीनलैंडर्स’ का विषय बन गए, जो बताती है कि कैसे एरिक के बेटे, लीफ एरिक्सन, ग्रीनलैंड से पश्चिम की ओर रवाना हुए और विनलांड पहुंचे, जिसे अब न्यूफाउंडलैंड के नाम से जाना जाता है. यह गाथा एरिक की बेटी, फ्रेयडिस एरिकस्डॉटिर की नाटकीय कहानी भी बताती है, जिसके साहसी और क्रूर कारनामों ने उसे वाइकिंग लोककथाओं में एक खास जगह दिलाई है.

15वीं सदी तक ग्रीनलैंड से वाइकिंग युग खत्म हो गया. द्वीप पर से नॉर्स बस्तियां गायब हो गईं, जो जलवायु परिवर्तन, अलगाव और बदलते व्यापार मार्गों के चुनौतीपूर्ण संयोजन में समा गईं.

ग्रीनलैंड पर डेनमार्क का दावा

हैंस एगेडे, जो एक डेनिश-नॉर्वेजियन पादरी थे. अगर उनके पास एक साहसी सोच नहीं होती, तो ग्रीनलैंड शायद यूरोपीय नक्शों से गायब हो गया होता. 1711 में एगेडे ने राजा को ग्रीनलैंड की अपनी यात्रा का समर्थन करने के लिए मनाने के लिए एक अभियान शुरू किया, जिसका मकसद बचे हुए नॉर्स बसने वालों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करना था. हैंस एगेडे का मानना था कि बचे हुए नॉर्स मूर्तिपूजा में वापस लौट रहे हैं.

1721 में जहाजों के एक छोटे समूह के साथ एगेडे ग्रीनलैंड पहुंचे. लेकिन उन्हें नॉर्स की बजाय इनुइट समुदायों को एक ऐसी दुनिया में रहते हुए पाया, जो उनकी अपनी दुनिया से और जो उन्होंने सोचा था उससे बहुत अलग थे. इसके बावजूद, एगेडे ग्रीनलैंड में रहे और जिन नॉर्स आबादी को वह खोजने की उम्मीद कर रहे थे, उनके न होने पर उन्होंने ग्रीनलैंडिक इनुइट कालाल्लिट लोगों के साथ संबंध स्थापित किए. इस मिशन ने ग्रीनलैंड पर डेनमार्क के आधुनिक दावे की शुरुआत की और एगेडे ने द्वीप पर अपने समय के दौरान द्वीप की राजधानी, गोथब, जिसे अब नुक के नाम से जाना जाता है, की स्थापना की.

डेनिश उपनिवेशों की जगह

एगेडे के अभियान के बाद, द्वीप बाद में डेनिश उपनिवेशों का एक स्थल बन गया और विस्तार की महत्वकांक्षा के कारण डेनिश राज्य में शामिल हो गया. डेनमार्क एक छोटी यूरोपीय शक्ति था, जिसका प्रभाव कम हो रहा था और वह अपनी स्थिति को मजबूत करना चाहता था. ग्रीनलैंड, हालांकि रहने लायक नहीं था, लेकिन यह लक्ष्य हासिल करने का एक जरिया जरूर था.

सदियों तक, ग्रीनलैंड पर डेनमार्क का कंट्रोल व्यावहारिक से ज्यादा प्रतीकात्मक था. द्वीप का ज्यादातर दुर्गम इलाका दुनिया के मामलों के लिए अधिकतर बेकार लगता था. यानी एक दूर की जमीन जो यूरोप के बड़े साम्राज्यों के लिए ज्यादा दिलचस्प नहीं थी.

दुनिया के केंद्र में आया ग्रीनलैंड

लेकिन 20वीं सदी में यह सोच नाटकीय रूप से बदल गई, जब ग्रीनलैंड अचानक खुद को दुनिया के मामलों के केंद्र में पाया. 1940 में डेनमार्क पर जर्मनी के कब्जे ने ग्रीनलैंड को चर्चा में ला दिया. अपने औपनिवेशिक संरक्षक से अलग होने के बाद, ग्रीनलैंड ने अब सुरक्षा के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर रुख किया. उत्तरी अटलांटिक में ग्रीनलैंड की रणनीतिक स्थिति को देखते हुए, अमेरिकियों ने नाजी हमलों से बचने के लिए वहां तेजी से बेस बना लिए.

ये बेस पश्चिमी और पूर्वी तटों पर यूरोप में विमान भेजने और ऐसे बेस उपलब्ध कराने के लिए बनाए गए थे, जहां से मित्र देशों की सेनाएं जर्मन पनडुब्बियों पर हमले कर सकें. इससे यह द्वीप अटलांटिक की लड़ाई के दौरान एक अहम बेस बना, जो युद्ध में सबसे लंबा लगातार चलने वाला सैन्य अभियान था.

इस बीच, ग्रीनलैंड ने मौसम की भविष्यवाणी के लिए मौसम संबंधी जानकारी इकट्ठा करने के अनोखे मौके दिए, क्योंकि सहयोगी देश जर्मन सेना पर बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रहे थे. इसलिए 1941 में ग्रीनलैंड के लोगों और अमेरिकियों ने मिलकर द स्लेज पेट्रोल बनाया, जिसमें ग्रीनलैंड के लोगों और स्लेज कुत्तों की छोटी और फुर्तीली टीमें थीं, जो नए बने जर्मन स्टेशनों को ढूंढती और उन्हें खत्म करती.

ग्लोबल सिक्योरिटी और ग्रीनलैंड

जब 1945 में दूसरा विश्व युद्ध खत्म हुआ, तो ग्लोबल सिक्योरिटी में ग्रीनलैंड की जगह अब एकदम साफ हो गई थी. फिर जल्द ही शीत युद्ध शुरू हुआ, तो आर्कटिक इलाके, जिन्हें पहले नजरअंदाज किया जाता था वो अब बहुत ज्यादा रणनीतिक महत्व का थिएटर बन गए थे. इसलिए, यूनाइटेड स्टेट्स ने ग्रीनलैंड के मौकों का फायदा उठाने के लिए डेनमार्क से जमीन लीज पर ली और थुले एयर बेस (मौजूदा नाम- पिटुफिक स्पेस बेस) बनाया, जो सोवियत मिसाइल हमलों के खिलाफ उसके शुरुआती चेतावनी सिस्टम में एक अहम कड़ी था. अमेरिका वर्ल्ड वॉर टू से पिटुफिक स्पेस बेस चला रहा है. यह अभी मिसाइलों पर नजर रखता है.

अमेरिकी सेना के लिए, ग्रीनलैंड अब सिर्फ एक जमी हुई बंजर जमीन नहीं थी, बल्कि पावर के ग्लोबल खेल में एक कीमती मोहरा था. नॉर्थ अमेरिका और यूरोप के बीच इसकी लोकेशन ने इसे बहुत जरूरी बना दिया था. हालांकि, थुले के पास रहने वाले इनुइट लोगों ने इस अचानक आए बदलाव की बड़ी कीमत चुकाई. बेस बनाने के लिए पूरे समुदायों को विस्थापित कर दिया गया और हजारों मील दूर लिए गए फैसलों से उनकी जिंदगी अस्त-व्यस्त हो गई. शीत युद्ध खत्म हो गया, लेकिन जियोपॉलिटिक्स के खेल में ग्रीनलैंड की क्षमता न सिर्फ बढ़ी ही थी, बल्कि रणनीतिक रूप से मजबूत भी हुई.

आज का ग्रीनलैंड

तब से पिघलती बर्फ ने तेल, गैस और दुर्लभ खनिज पदार्थों के विशाल भंडार उजागर किए हैं, जिससे अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों और सरकारों की दिलचस्पी बढ़ी है. जलवायु परिवर्तन के कारण नए शिपिंग रास्ते बने हैं, जिससे ग्रीनलैंड आर्कटिक व्यापार के केंद्र में आ गया है, हालांकि द्वीप पर डेनिश नियंत्रण कम हो गया है. 1979 में होम रूल हासिल करने और 2009 में और अधिक स्वायत्तता मिलने के बाद, ग्रीनलैंड ने आत्मनिर्णय की दिशा में एक रास्ता बनाया है, जबकि डेनिश क्षेत्र के रूप में अपनी स्थिति बनाए रखी है.

ग्रीनलैंड पर क्यों है ट्रंप की नजर?

ग्रीनलैंड अमेरिका और यूरोप के बीच और तथाकथित GIUK गैप के पास स्थित है. यह ग्रीनलैंड, आइसलैंड और UK के बीच एक समुद्री रास्ता है जो आर्कटिक को अटलांटिक महासागर से जोड़ता है. यह जगह इसे व्यापार और सुरक्षा दोनों के लिए नॉर्थ अटलांटिक तक पहुंच को कंट्रोल करने के लिए जरूरी बनाती है.

रिसोर्स की कुल जियोलॉजिकल वैल्यू

यूरो न्यूज में छपी रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकन एक्शन फोरम (AAF) द्वारा पब्लिश एक स्टडी के अनुमानों के अनुसार, ग्रीनलैंड के ज्ञात मिनरल रिसोर्स की कुल जियोलॉजिकल वैल्यू, थ्योरी में 4 ट्रिलियन डॉलर (€3.66 ट्रिलियन) से अधिक हो सकती है. हालांकि, मौजूदा मार्केट, रेगुलेटरी और टेक्नोलॉजिकल स्थितियों में इसका सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा, लगभग 186 अरब डॉलर, ही असल में निकाला जा सकता है.

इसके भरपूर प्राकृतिक संसाधन, जिनमें तेल, गैस और दुर्लभ खनिज शामिल हैं, इसकी रणनीतिक अहमियत को बढ़ाते हैं, क्योंकि चीन दुर्लभ खनिज इंडस्ट्री पर अपने दबदबे का इस्तेमाल करके अमेरिका पर दबाव डालता है. ये खनिज ग्लोबल इकॉनमी के लिए बहुत जरूरी हैं, क्योंकि इलेक्ट्रिक कारों और विंड टर्बाइन से लेकर मिलिट्री इक्विपमेंट तक सब कुछ बनाने के लिए इनकी जरूरत होती है.

व्यापार और सुरक्षा

जलवायु संकट की वजह से आर्कटिक की बर्फ पिघलने से ग्रीनलैंड के खनिजों तक पहुंच आसान हो सकती है, लेकिन पहाड़ी इलाका, इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और मौजूदा पर्यावरण नियमों को देखते हुए असल में इनकी माइनिंग करना मुश्किल साबित हो सकता है. बर्फ पिघलने से उत्तरी शिपिंग रास्ते भी साल के ज्यादातर समय तक जहाज चलाने लायक हो जाते हैं, जिसका असर व्यापार और सुरक्षा दोनों पर पड़ता है.

ट्रंप ने ग्रीनलैंड के प्राकृतिक संसाधनों के महत्व को कम करके बताया है. पिछले महीने रिपोर्टर्स से कहा था, ‘हमें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड चाहिए, मिनरल्स के लिए नहीं.’

लेकिन उनके पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइक वॉल्ट्ज़ ने जनवरी 2024 में सुझाव दिया था कि ट्रंप का ध्यान प्राकृतिक संसाधनों पर था. फॉक्स न्यूज से कहा था कि प्रशासन का ध्यान ग्रीनलैंड पर “महत्वपूर्ण मिनरल्स” और “प्राकृतिक संसाधनों” पर था.

कैसे बदल रही है ज्योग्राफी

रूस का एक चौथाई से ज्यादा इलाका आर्कटिक में है, इसलिए मॉस्को हमेशा से इस क्षेत्र को अपनी सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी मानता रहा है. हाल के सालों में चीन भी इस होड़ में शामिल हो गया है, उसने 2018 में खुद को “नियर-आर्कटिक देश” घोषित किया और आर्कटिक शिपिंग के लिए “पोलर सिल्क रोड” का लक्ष्य रखा है. इन सबका मतलब है कि अब अमेरिका, चीन और रूस आर्कटिक क्षेत्र को लेकर आपस में भिड़ रहे हैं, क्योंकि क्लाइमेट संकट इसकी ज्योग्राफी को बदल रहा है.