महंगाई के डबल अटैक के लिए रहें तैयार, अब अलनीनों का खतरा, रिस्क में ग्रामीण भारत
महंगाई की वजह से लोगों की खरीदने की ताकत कम होगी, तो फिर डिमांड में गिरावट आएगी और मांग में गिरावट का असर, सीधे कंपनियों की बैलेंस शीट को प्रभावित करेगा और इसका असर नौकरी में कमी से लेकर तमाम तरह की चीजों पर नजर आ सकता है.
ज्यादातर लोगों के लिए महंगाई एक डरावना शब्द है. इसका मतलब है खरीदने की ताकत में कमी, ऊंची कीमतें, अधिक खर्च और हाथ में कम पैसा. ईरान और अमेरिका के बीच फरवरी के आखिरी में शुरू हुआ संघर्ष अभी भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका है, लेकिन इस बेनतीजा संघर्ष के की आग में दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं झुलस रही हैं. भारत भी इसमें शामिल है. देश में लगातार बढ़ते फ्यूल के दाम, महंगाई की चिंगारी को हवा देकर आग में तब्दील कर की रूप अख्तियार कर रहे हैं. दूसरी तरफ कमजोर मॉनसून के अनुमान महंगाई की आग की आंच को और तेज होने की आशंका जता रहे हैं.
इन सभी के बीच शिकन की लकीरें आम आदमी के माथे पर उभर आई हैं, क्योंकि आखिरी में इस महंगाई का दबाव उसे ही झेलना है. बाजार में तेल-साबुन, आटा-चावल के लिए अधिक पैसा उन्हें चुकाना होगा, जिसकी वजह से ग्रामीण इकोनॉमी को झटका लगेगा. महंगाई की वजह से लोगों की खरीदने की ताकत कम होगी, तो फिर डिमांड में गिरावट आएगी और मांग में गिरावट का असर, सीधे कंपनियों की बैलेंस शीट को प्रभावित करेगा और इसका असर नौकरी में कमी से लेकर तमाम तरह की चीजों पर नजर आ सकता है.
खुदरा महंगाई से मांग होगी कमजोर
देश के वित्त मंत्रालय ने शनिवार को एक रिपोर्ट में कहा कि हाल ही में ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी और मॉनसून की बारिश सामान्य से कम होने के कारण भारत में खुदरा महंगाई बढ़ सकती है, क्योंकि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के चलते एनर्जी सप्लाई में रुकावटें जारी हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि होर्मुज स्ट्रेट में रुकावट की अवधि भारत के बाहरी और कीमतों से जुड़े आउटलुक के लिए ‘सबसे अधिक असर डालने वाला अकेला फैक्टर’ बनी हुई है.
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि अपस्ट्रीम कीमतों के दबाव में तेजी से बढ़ोतरी, और साथ ही ईंधन की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी से यह संकेत मिलता है कि आने वाले महीनों में परिवहन, ऊर्जा और भोजन से जुड़ी लागतें बढ़ने के कारण खुदरा महंगाई में धीरे-धीरे बढ़ोतरी हो सकती है. रिपोर्ट के अनुसार, बारिश में भारी कमी और मौजूदा भू-राजनीतिक हालात मिलकर भोजन की महंगाई को बढ़ा सकते हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में मांग कमजोर पड़ सकती है और कुल आर्थिक विकास पर भी बुरा असर पड़ सकता है.
5 फीसदी तक बढ़ सकती है महंगाई
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी और सोने-चांदी पर ज्यादा इंपोर्ट ड्यूटी के कारण जून तक खुदरा महंगाई दर 5 फीसदी तक पहुंच सकती है. लेकिन, RBI वित्तीय वर्ष की दूसरी छमाही में ब्याज दरें बढ़ाने से पहले ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी के असर के पूरी तरह से सामने आने तक इंतजार करेगा और स्थिति पर नजर रखेगा.
वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी, रुपये के मूल्य में गिरावट, अपस्ट्रीम लागत के बढ़ते दबाव और सामान्य से कम मॉनसून की संभावना को देखते हुए लगातार नीतिगत सतर्कता बनाए रखने की जरूरत है. अप्रैल में भारत की सालाना खुदरा महंगाई दर मामूली रूप से बढ़कर 3.48 फीसदी हो गई, जो अब भी केंद्रीय बैंक के लक्ष्य से नीचे है.
अल नीनो के प्रभाव को लेकर चिंताएं
एलारा कैपिटल की रिपोर्ट के अनुसार, नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने जून-अगस्त 2026 के दौरान अल नीनो के विकसित होने की 60-70 फीसदी संभावना जताई है और 1:4 (रेश्यो 1:4) संभावना यह भी है कि यह एक तीव्र घटना हो सकती है जो साल के अंत तक बनी रहेगी. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के लिए अपने अप्रैल के लॉन्ग टर्म पूर्वानुमान में जून-सितंबर की बारिश को दीर्घकालिक औसत (LPA) का 92 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है, लेकिन इस बात की 35 फीसदी संभावना भी जताई है कि बारिश LPA के 90 फीसदी से नीचे गिर सकती है.
हालांकि, कृषि उत्पादन, महंगाई दर और ग्रामीण मांग पर अल नीनो के प्रभाव को लेकर चिंताएं जायज हैं, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि हाल के वर्षों में ग्रामीण भारत में हुए संरचनात्मक बदलावों के कारण अल नीनो का एग्रीकल्चर ग्रॉस वैल्यू एड (GVA), ग्रामीण आय और समग्र मांग पर पड़ने वाला प्रभाव कमजोर हुआ है. जैसे कि सिंचित क्षेत्र में वृद्धि, फसलों और इनकम का डायवर्सिफिकेशन, मजबूत न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) सहायता, ऋण की गहरी पैठ, बिना शर्त कैश ट्रांसफर योजनाएं और गैर-कृषि ग्रामीण आय में तेजी.
इन फैक्टर्स का अर्थ है कि अल नीनो का मैक्रो-आर्थिक प्रभाव शायद उतना तेज न हो. इसलिए, जहां एक ओर भारत के मॉनसून और आर्थिक विकास पर पड़ने वाले जोखिमों पर नजर रखने की आवश्यकता है, वहीं हमारे विचार से इन चिंताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है.
महंगाई का असर
CPI में खाने का हिस्सा लगभग 37% होता है, जिससे यह महंगाई फैलने का सबसे सीधा जरिया बन जाता है. फिलहाल ऐसी स्थिति देखने को मिल रही है.
- खाने के तेलों की कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव दिख रहा है.
- अनाज और दालों की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं.
- मार्च-अप्रैल में सब्जियों की कीमतें कुछ नरम पड़ी हैं.
हालांकि, पिछले El Niño वाले सालों में सब्जियों की महंगाई में मौसम के हिसाब से तेज उछाल देखा गया है और अगर 2026 में भी ऐसा ही पैटर्न दिखता है, तो यह मुख्य CPI में लगभग 20–25 bps की बढ़ोतरी कर सकता है, भले ही खाने की दूसरी चीजों की कीमतें काबू में रहें.
नीतिगत सुरक्षा उपाय मजबूत बने हुए हैं
भारत मानसून 2026 में मजबूत झटकों को झेलने वाले उपायों के साथ प्रवेश कर रहा है.
- उच्च सिंचाई कवरेज
- बढ़ी हुई उर्वरक सब्सिडी
- पर्याप्त खाद्यान्न भंडार
- स्वस्थ जलाशय जलस्तर
- चल रही ग्रामीण सहायता योजनाएं (पीएम-किसान, एमजीएनआरईजीए, ई-एनएएम)
- ये फैक्टर्स बारिश के झटकों के प्रति महंगाई और विकास की संवेदनशीलता को काफी हद तक कम करते हैं.
दोपहिया वाहनों की बिक्री और FMCG
उत्पादन और बढ़ती कीमतों के लिहाज से अल नीनो की स्थितियों पर नजर रखना जरूरी है. एलारा कैपिटल की रिपोर्ट के अनुसार, दोपहिया वाहनों की बिक्री और FMCG की मात्रा ने अल नीनो के सामने मजबूती दिखाई लेकिन, कंज्यूमर ओरिएंटेड सेक्टर एक बिल्कुल अलग कहानी बताते हैं.अल नीनो वाले वर्षों के दौरान दोपहिया वाहनों की बिक्री में औसतन 8.4 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई, जो अल नीनो-रहित वर्षों में दर्ज 7.2 फीसदी की बढ़ोतरी से अधिक थी. 8 में से 7 मामलों में वृद्धि दर्ज की गई. एकमात्र अपवाद 2019-20 का वर्ष था, जो COVID के कारण प्रभावित हुआ था.
पर्सनल और होम केयर कंपनियों के रेवेन्यू
CMIE द्वारा रिपोर्ट की गई पर्सनल और होम केयर कंपनियों के रेवेन्यू में बढ़ोतरी औसतन +8.6% रही, जो अल नीनो-रहित वर्षों के औसत +12.2% से कम थी, लेकिन कभी भी विनाशकारी स्तर तक नहीं गिरी. FMCG की बड़ी कंपनियों (हिंदुस्तान यूनिलीवर, मैरिको, डाबर, ज्योति लैब्स और इमामी) की वॉल्यूम ग्रोथ के हमारे एनालिसिस से (वित्त वर्ष 17 से) यह पता चलता है कि मजबूत (2023-24) और बहुत मजबूत (2015-16) अल नीनो काल के दौरान औसत मात्रा वृद्धि, वास्तव में अल नीनो की घटना के बाद के चार तिमाहियों की बढ़ोतरी से अधिक थी. हाल के वर्षों में, कर्ज की पहुंच और बिना शर्त कैश ट्रांसफर सुरक्षा कवच के रूप में काम कर रहे हैं.
CY26 YTD में, अधिकतम तापमान का सामान्य स्तर से अंतर, 2015-16 और 2023-24 के हाल के मजबूत और बहुत मजबूत अल नीनो दौरों के मुकाबले दोगुना रहा है. यह एयर कंडीशनिंग और रेफ्रिजरेटर सेक्टर के लिए एक मददगार साबित हो सकता है. पिछले अनुभव बताते हैं कि मॉनसून की कमी वाले पांच अल नीनो वर्षों में AC की बिक्री में -5.6% से 19.8% (YoY) की बढ़ोतरी हुई. इनमें 2014-15 और 2009-10 में अल नीनो के सब सैंपल में सबसे मजबूत आंकड़े दर्ज किए गए, जो क्रमशः 19.8% और 18.1% थे.
हालांकि, मौजूदा दौर में मुख्य बात जिस पर नजर रखनी होगी, वह यह है कि क्या AC और रेफ्रिजरेटर सेक्टर को संभावित रुकी हुई मांग को पूरा करने में किसी तरह की सप्लाई संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ता है, खासकर पिछले साल माध्यमिक बिक्री में सुस्ती के कारण इन्वेंट्री की स्थिति के अलावा, भू-राजनीतिक जोखिमों और संबंधित सप्लाई चेन की रुकावटों के चलते.
बढ़ सकती हैं दालों और तिलहनों की कीमतें
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 29 मई को भारत के मॉनसून के पूर्वानुमान को पहले के 92 प्रतिशत से घटाकर लंबी अवधि के औसत (LPA) का 90 प्रतिशत कर दिया. यह लगभग तीन दशकों में सबसे कमजोर शुरुआती लंबी अवधि का पूर्वानुमान है. कमजोर मॉनसून बुवाई में बाधा डाल सकता है, फसलों की पैदावार को नुकसान पहुंचा सकता है और जरूरी खाद्य पदार्थों, खासकर दालों और तिलहनों की कीमतें बढ़ा सकता है.
हालांकि, इसका अंतिम असर न सिर्फ कुल बारिश पर, बल्कि उसके समय और बंटवारे पर भी निर्भर करेगा, लेकिन हालात बिगड़ने पर भारत की दालों, सोयाबीन और कपास के उत्पादन को काफी ज्यादा नुकसान पहुंच सकता है, क्योंकि इन फसलों का उत्पादन उन राज्यों में अधिक होता है जहां सिंचाई की सुविधाएं काफी कमजोर हैं.
अरहर पर सबसे अधिक रिस्क
दालों में, अरहर सबसे अधिक जोखिम में है. महाराष्ट्र और कर्नाटक मिलकर भारत के कुल उत्पादन का 66.8 फीसदी हिस्सा पैदा करते हैं और इन दोनों राज्यों में सिंचाई की सुविधा 43.3 फीसदी है. झारखंड, जो 7 फीसदी का योगदान देता है, प्रमुख उत्पादक राज्यों में सिंचाई की सुविधा के मामले में सबसे कमजोर है, जहां यह सुविधा केवल 17.2 फीसदी है.
कुल मिलाकर, दालों का उत्पादन अभी भी बहुत अधिक जोखिम भरा है. महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक और मध्य प्रदेश मिलकर कुल दाल उत्पादन का 81.8 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं. इनमें से, सिर्फ मध्य प्रदेश में ही सिंचाई का स्तर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है.
ऐसा लगता है कि सोयाबीन सबसे अधिक खतरे में है. महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश मिलकर भारत के कुल सोयाबीन उत्पादन का 83.6 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं. अकेले महाराष्ट्र का योगदान 48.3 प्रतिशत है, लेकिन वहां सिंचाई की सुविधा सिर्फ 43.3 प्रतिशत है, जो कि राष्ट्रीय औसत 59.9 प्रतिशत से कम है. मध्य प्रदेश, जिसका योगदान 35.3 प्रतिशत है, वहां सिंचाई की सुविधा अधिक है, यानी 60.2 फीसदी.
ग्रामीण आय का डायवर्सिफिकेशन
ग्रामीण आय के डायवर्सिफिकेशन से इसे और मजबूती मिली है. NABARD 2022 सर्वे के अनुसार, ग्रामीण परिवारों की कुल आय में कृषि से होने वाली आय का हिस्सा महज एक-तिहाई है. बाकी आय मजदूरी (16%), अन्य उद्यमों (15%), सरकारी और निजी नौकरियों (23%), और पशुधन से होने वाली आमदनी (12%) से आती है. आय का यह डायवर्सिफाइड आधार एक ‘संरचनात्मक बफर’ (सुरक्षा कवच) का काम करता है, जो मॉनसून से पड़ने वाले किसी भी झटके के असर को परिवारों की आय और बाजार की मांग पर पड़ने से रोकता है.
अर्थव्यवस्था का अहम आधार
कोटक म्यूचुअल फंड की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून सिर्फ मौसम में होने वाला एक बदलाव ही नहीं है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था का एक अहम आधार है. मॉनसून भारत में होने वाली कुल बारिश का लगभग 70 फीसदी हिस्सा लाता है और खेती-बाड़ी के क्षेत्र को सहारा देता है. यह क्षेत्र लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में करीब 18 फीसदी का योगदान देता है और देश की लगभग आधी आबादी को रोजगार मुहैया कराता है. जब बारिश कम होती है, तो चावल, कपास और सोयाबीन जैसी फसलों पर बुरा असर पड़ सकता है. बारिश कम होने से मिट्टी में नमी भी कम हो जाती है, जिसका असर गेहूं और रेपसीड जैसी सर्दियों की फसलों पर भी पड़ सकता है.
इसका असर सिर्फ खेती-बाड़ी तक ही सीमित नहीं है. मॉनसून का असर गांव के लोगों की आमदनी, खाने-पीने की चीजों की कीमतों और पूरी आर्थिक गतिविधियों पर पड़ता है. भले ही समय के साथ सिंचाई, सप्लाई चेन और सरकारी मदद में सुधार हुआ हो, फिर भी जून से सितंबर के बीच होने वाली बारिश पूरे देश में हालात तय करने में एक अहम भूमिका निभाती है.
ऐतिहासिक संदर्भ: कमजोर मॉनसून असामान्य नहीं हैं
2000 के दशक की शुरुआत से, भारत में हर 3-4 साल में सामान्य से कम मानसून देखा गया है. 2015-16 जैसी स्थितियों में सुरक्षा उपायों के कारण व्यापक स्तर पर नुकसान सीमित रहा, जबकि 2023 में असमान वर्षा वितरण के कारण खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि हुई. यह इस बात को पुष्ट करता है कि केवल वर्षा के आंकड़े ही तनाव का सटीक पूर्वानुमान नहीं लगा सकते.
मैक्रो-आर्थिक चुनौती
कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड की सीनियर एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट, फंड मैनेजर और इक्विटी रिसर्च की हेड शिबानी कुरियन कहती हैं, ‘एक तरफ, मॉनसून के कमजोर रहने की संभावना भारत के लिए एक हल्की मैक्रो-आर्थिक चुनौती फिर से खड़ी कर सकती है. दूसरी तरफ, भारतीय अर्थव्यवस्था और कॉरपोरेट कमाई पर इसका कुल असर कई ढांचागत सुरक्षा उपायों (structural buffers) की वजह से लगातार कम होता जा रहा है. पिछले एक दशक में, सिंचाई के दायरे में विस्तार, जलाशयों के बेहतर जलस्तर और बेहतर फसल प्रबंधन ने बारिश पर सीधी निर्भरता को कम किया है. इसके अलावा, मॉनसून का असल असर सिर्फ़ बारिश की मात्रा पर ही नहीं, बल्कि उसके भौगोलिक और समय के हिसाब से वितरण पर भी निर्भर करता है. मैक्रो-स्तर पर, भारत के विकास के अलग-अलग फैक्टर्स भी पिछली साइकिल की तुलना में मॉनसून के व्यवस्थित असर को सीमित करते हैं.’
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