$90 के पार पहुंचा क्रूड ऑयल, $100 का खतरा कितना बड़ा? जानें भारत के लिए क्यों है ये बुरी खबर, कहां पड़ेगा ज्यादा असर

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतें तेजी से उछलकर 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं. अगर यह 100 डॉलर तक पहुंचता है तो भारत के आयात बिल, महंगाई और रुपये पर बड़ा असर पड़ सकता है. जानिए पूरी तस्वीर.

मिडिल ईस्ट टेंशन और बढ़ता क्रूड ऑयल Image Credit: @AI

Middle East Tension and Surge Crude Oil Price: मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच वैश्विक तेल बाजार में जबरदस्त उथल-पुथल देखने को मिल रही है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है और अमेरिकी क्रूड ऑयल शुरुआती कारोबार में 9 फीसदी से ज्यादा उछलकर 91 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया, जो अक्टूबर 2023 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है. वहीं ब्रेंट क्रूड भी 90 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया और अप्रैल 2024 के बाद के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया. विश्लेषकों का कहना है कि अगर जियो पॉलिटिकल टेंशन जारी रहता है और वैश्विक सप्लाई बाधित होती है तो तेल की कीमतें जल्द ही 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच सकती हैं, जिसका असर दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ भारत पर भी साफ दिख सकता है.

क्यों बढ़ रही कीमत?

तेल बाजार में यह उछाल मुख्य रूप से ईरान से जुड़े संघर्ष और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण आया है. स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, पर जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है. इस संकरे समुद्री मार्ग से रोजाना लगभग 2.08 करोड़ बैरल तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट गुजरते हैं, जिनमें से 80 फीसदी से अधिक एशियाई देशों की ओर जाते हैं. जहाजों की निगरानी करने वाले डेटा के अनुसार, सुरक्षा जोखिम और बीमा लागत बढ़ने के कारण इस रास्ते से गुजरने वाले तेल टैंकरों की संख्या सामान्य स्तर की तुलना में करीब 90 फीसदी तक घट गई है. कई जहाज खाड़ी क्षेत्र के बाहर इंतजार कर रहे हैं क्योंकि तनाव के चलते इस मार्ग से गुजरना जोखिम भरा माना जा रहा है.

कच्चे तेल की कीमत पर नहीं लगी ब्रेक तो?

रिपोर्ट्स की माने तो अगर यह बाधा कुछ दिनों से ज्यादा समय तक बनी रहती है तो इसका असर ग्लोबल ऑयल सप्लाई पर गंभीर रूप से पड़ सकता है. S&P Global के विश्लेषण के मुताबिक, अगर होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल का प्रवाह बाधित रहता है तो करीब 1.5 करोड़ बैरल प्रतिदिन तक सप्लाई खतरे में पड़ सकती है. यहां तक कि अगर सप्लाई में 7-8 मिलियन बैरल प्रतिदिन की भी कमी आती है तो यह असर 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध या 1990 में कुवैत पर इराक के हमले के बाद हुए शुरुआती तेल झटके से भी बड़ा हो सकता है.

अमेरिकी शेयर बाजार में दबाव में

एनर्जी मार्केट में बढ़ते जोखिम के बीच वैश्विक वित्तीय बाजार भी दबाव में आ गए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट किया जिसके बाद यूएस मार्केट में गिरावट देखी जाने लगी. ट्रंप ने पोस्ट करते हुए लिखा कि “ईरान के साथ किसी तरह की डील नहीं होगी सिवाय उसके सरेंडर के!”.

इसके बाद बाजार में गिरावट आई जहां डाउ जोंस इंडेक्स करीब 900 अंक तक गिर गया, जबकि S&P 500 में 1.6 फीसदी और नैस्डैक में लगभग 1.4 फीसदी की गिरावट आई. इसी बीच अमेरिका से आए कमजोर रोजगार आंकड़ों ने भी बाजार की चिंताओं को बढ़ा दिया है. फरवरी में अमेरिकी अर्थव्यवस्था से 92,000 नौकरियां कम हो गईं, जिससे आर्थिक सुस्ती और महंगाई के एक साथ बढ़ने यानी स्टैगफ्लेशन की आशंका बढ़ने लगी है.

कच्चा तेल 100 डॉलर पहुंच तब?

अगर कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंचती हैं तो इसका सबसे बड़ा असर उन देशों पर पड़ेगा जो बड़ी मात्रा में तेल आयात करते हैं, और भारत उनमें प्रमुख है. भारत अपनी कुल जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी सीधे देश के आयात बिल और चालू खाते के संतुलन को प्रभावित करती है. रेटिंग एजेंसी ICRA के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का आयात बिल लगभग 13–14 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है और चालू खाते का घाटा GDP का लगभग 0.3 फीसदी बढ़ सकता है.

ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर पार का मतलब?

अगर ब्रेंट क्रूड 85 डॉलर से बढ़कर 100 डॉलर तक पहुंचता है तो भारत का सालाना तेल इंपोर्ट बिल करीब 20 से 25 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है. इससे न केवल विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ेगा बल्कि रुपया भी कमजोर हो सकता है क्योंकि तेल आयात का भुगतान डॉलर में किया जाता है. रुपये में गिरावट होने पर आयात और महंगा हो जाता है, जिससे महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है.

ग्राहकों पर गिरेगी पूरी गाज?

तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता. महंगा क्रूड परिवहन लागत बढ़ाता है, जिससे लॉजिस्टिक्स, मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन की लागत भी बढ़ जाती है. कंपनियां इन बढ़ी हुई लागतों को धीरे-धीरे उपभोक्ताओं पर डालती हैं, जिससे महंगाई का दायरा व्यापक हो जाता है. ऐसी स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक के लिए भी नीतिगत फैसले लेना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि केंद्रीय बैंक का लक्ष्य महंगाई को करीब 4 फीसदी के आसपास बनाए रखना है.

30 दिन की छूट से मिलेगी राहत?

हालांकि मौजूदा स्थिति में भारत के लिए एक छोटी राहत भी सामने आई है. अमेरिका ने भारतीय रिफाइनरियों को 30 दिन की अस्थायी छूट दी है, जिसके तहत वे समुद्र में पहले से लोड हो चुके रूसी कच्चे तेल के कार्गो खरीद सकते हैं. यह व्यवस्था मार्च की शुरुआत से पहले लोड किए गए तेल को अप्रैल की शुरुआत तक भारत पहुंचाने की अनुमति देती है. इससे वैश्विक सप्लाई में थोड़ी स्थिरता बनी रह सकती है और भारतीय रिफाइनरियों को वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदने का समय मिल सकता है.

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