रातों-रात बदली तेल बाजार की तस्वीर, कीमतों में 5% की गिरावट, क्रूड $119 से गिरकर $90 से नीचे, ये 4 कारण बने जिम्मेदार
रातों-रात अमेरिकी क्रूड 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, जिससे यह आशंका बढ़ गई थी कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक सप्लाई पर बड़ा असर पड़ सकता है. लेकिन दिन चढ़ते-चढ़ते तस्वीर बदल गई. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान के बाद बाजार का मूड पलट गया और तेल की कीमतें तेजी से गिरकर 90 डॉलर से नीचे आ गईं.
crude oil prices fall: दुनिया के तेल बाजार में सोमवार को ऐसा उतार-चढ़ाव देखने को मिला जिसने निवेशकों और ट्रेडर्स दोनों को चौंका दिया. कुछ ही घंटों के भीतर कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने के बाद अचानक नीचे आ गईं. रातों-रात अमेरिकी क्रूड 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, जिससे यह आशंका बढ़ गई थी कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक सप्लाई पर बड़ा असर पड़ सकता है.
लेकिन दिन चढ़ते-चढ़ते तस्वीर बदल गई. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान के बाद बाजार का मूड पलट गया और तेल की कीमतें तेजी से गिरकर 90 डॉलर से नीचे आ गईं. ब्रेंट क्रूड भी 89 डॉलर से नीचे फिसल गया. दरअसल बाजार में पहले जो डर और अनिश्चितता थी, वह अचानक कम हो गई. तेल की कीमतों में आई इस तेज गिरावट के पीछे चार बड़े कारण रहे. इनमें युद्ध खत्म होने के संकेत, G7 देशों की तैयारी, रूस से जुड़ी संभावित नीति बदलाव और बाजार में तकनीकी बिकवाली शामिल हैं.
युद्ध खत्म होने के संकेत से कम हुआ डर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के खिलाफ चल रहा सैन्य अभियान लगभग पूरा हो चुका है. उन्होंने बताया कि ईरान की नौसेना, communication system और एयर फोर्स को काफी नुकसान पहुंचा है. बाजार को पहले उम्मीद थी कि यह युद्ध लंबे समय तक चलेगा और Strait of Hormuz लंबे समय तक बंद रह सकता है. यह रास्ता दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल की सप्लाई के लिए बेहद अहम है. लेकिन ट्रंप के बयान के बाद निवेशकों को लगा कि हालात जल्द सामान्य हो सकते हैं. इसके बाद तेल की कीमतों में शामिल डर का प्रीमियम तेजी से खत्म हो गया.
G7 देशों का बड़ा संकेत
तेल की कीमतें जब 100 डॉलर से ऊपर पहुंचीं तो G7 देशों के वित्त मंत्रियों और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने आपात बैठक की. इस बैठक में कहा गया कि जरूरत पड़ने पर रणनीतिक तेल भंडार से सप्लाई जारी की जा सकती है. इस संकेत का मतलब साफ था कि अगर तेल की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ती हैं तो बाजार में अतिरिक्त सप्लाई डाली जाएगी. इस खबर से ट्रेडर्स को लगा कि कीमतें बहुत ज्यादा समय तक ऊंची नहीं रहेंगी. यही वजह रही कि बाजार में तेजी से बिकवाली शुरू हो गई.

अमेरिका और रूस के बीच बातचीत
तेल की कीमतों में गिरावट का एक कारण अमेरिका और रूस के बीच बढ़ती बातचीत भी रही. रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका रूस के तेल पर लगे कुछ प्रतिबंधों में ढील देने पर विचार कर रहा है. अगर ऐसा होता है तो वैश्विक बाजार में तेल की सप्लाई बढ़ सकती है. इससे कीमतों पर दबाव आ सकता है. अमेरिकी प्रशासन भी चाहता है कि तेल की कीमतें बहुत ज्यादा न बढ़ें, क्योंकि इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था और Consumers पर असर पड़ सकता है.
बाजार में घबराहट और तकनीकी बिकवाली
तेल की कीमतों में गिरावट का चौथा कारण बाजार की तकनीकी स्थिति रही. युद्ध की खबरों के बाद कई ट्रेडर्स ने घबराहट में तेल खरीद लिया था, जिससे कीमतें तेजी से 119 डॉलर तक पहुंच गईं. लेकिन जैसे ही हालात सामान्य होने के संकेत मिले, ट्रेडर्स ने तेजी से मुनाफावसूली शुरू कर दी. इससे बाजार में भारी बिकवाली आई और कीमतें तेजी से गिरकर 85 से 88 डॉलर के बीच पहुंच गईं.
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