LPG संकट में चमका UP का यह गांव, नहीं करते सिलेंडर का इस्तेमाल, खुद बनाते हैं गैस, ₹400 में पकाते हैं महीने भर खाना
पश्चिम एशिया में युद्ध के चलते देशभर में LPG सिलेंडर की किल्लत बढ़ती जा रही है, लेकिन उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले का एकौनी गांव इस संकट से अछूता है. यहां के लोग बायोगैस के जरिए आत्मनिर्भर बन चुके हैं. स्थानीय संसाधनों से तैयार यह मॉडल न सिर्फ सस्ता है, बल्कि ऊर्जा के क्षेत्र में एक मिसाल भी पेश करता है.

How to Produce BioGas: पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के बीच देश में यदि किसी चीज की सबसे अधिक किल्लत महसूस की जा रही है, तो वह LPG सिलेंडर है. इसके पीछे मुख्य वजह होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों और टैंकरों के रास्ते में आई बाधाएं हैं. लेकिन इस संकट के बावजूद उत्तर प्रदेश के वाराणसी से लगभग 40 किलोमीटर दूर चंदौली जिले के एकौनी गांव में इसका कोई असर देखने को नहीं मिल रहा है. इसका कारण यह है कि इस गांव की अधिकांश आबादी LPG सिलेंडर की बजाय ऐसी गैस का उपयोग करती है, जिसके लिए उन्हें किसी बाहरी स्रोत पर निर्भर नहीं रहना पड़ता.
जब देशभर में लोग गैस सिलेंडर के लिए लंबी-लंबी कतारों में खड़े होकर परेशान हो रहे हैं, तब इस गांव के लोग बायोगैस के माध्यम से अपने घरों में ऊर्जा आपूर्ति कर आराम से जीवन व्यतीत कर रहे हैं.
UP के इस गांव ने कर दिखाया कमाल?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, एकौनी गांव के लगभग 500 लोगों को बायोगैस के जरिए दिन में दो बार गैस की सप्लाई की जाती है. सुबह 6:30 बजे से 9 बजे तक और शाम को भी इसी समय में. यह प्लांट गांव के लोगों और इंजीनियर चंद्र प्रकाश सिंह के स्वामित्व वाली 700–750 वर्ग फुट भूमि पर स्थापित किया गया है.
इंडियन एक्सप्रेस को चंद्र ने बताया कि वर्ष 2016 में भोपाल के मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से बीटेक की पढ़ाई पूरी की थी. इसके बाद वे नंद सदन गौशाला का प्रबंधन संभालने के लिए अपने गांव लौट आए. उनके पिता, नागेंद्र प्रताप सिंह, लगभग 50 गायों के साथ 4 एकड़ भूमि पर यह व्यवसाय चला रहे थे. इस गौशाला से प्रतिदिन लगभग 3000 किलोग्राम गोबर निकलता था. इसी गोबर के प्रबंधन के लिए उन्होंने बायोगैस प्लांट स्थापित किया.
वर्तमान संकट के समय इस गांव में लगभग 3.7 किलोमीटर लंबी प्लास्टिक पाइपलाइन के माध्यम से गैस की आपूर्ति की जा रही है. रिपोर्ट के अनुसार, इस प्लांट को स्थापित करने में लगभग 85 लाख रुपये की लागत आई थी. साथ ही, LPG सिलेंडर की तुलना में यहां के लोग आधी लागत में पूरे महीने खाना बना पा रहे हैं. यानी लगभग 400-500 रुपये में पूरे महीने काम चलता है.
क्या होता है Bio Gas Plant?
बायोगैस प्लांट एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें जैविक कचरे (जैसे गोबर, रसोई का कचरा, पौधों के अवशेष) को बिना ऑक्सीजन यानी anaerobic condition के सड़ाकर गैस बनाई जाती है. इस गैस को ही बायोगैस कहते हैं.
बायोगैस प्लांट कैसे काम करता है?
कच्चा माल डालना
- गोबर, सब्जियों के छिलके, खाद्य कचरा आदि पानी के साथ मिलाकर टैंक (डाइजेस्टर) में डाला जाता है.
सड़न प्रक्रिया (Anaerobic Digestion)
- टैंक के अंदर बैक्टीरिया इस कचरे को बिना ऑक्सीजन के तोड़ते हैं.
गैस बनना (Gas Production)
- इस प्रक्रिया से मुख्य रूप से मीथेन (CH₄) गैस बनती है, जो जलने योग्य होती है.
गैस का उपयोग
इस गैस का उपयोग खाना बनाने, लाइट जलाने या बिजली बनाने में किया जाता है.
बचे हुए पदार्थ को Slurry कहते हैं. इससे बहुत अच्छी जैविक खाद बन जाती है.