होर्मुज संकट के बाद भी अमेरिका को क्यों नहीं तेल की टेंशन, क्या गुजरने वाले जहाज देते हैं टोल टैक्स?
मिडिल ईस्ट में ईरान-अमेरिका-इजरायल तनाव के बीच होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा का सबसे बड़ा फ्लैशपॉइंट बन गया है. दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल की सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है, जिससे भारत समेत कई देशों की चिंता बढ़ गई है. लेकिन सवाल यह है कि अगर यह रास्ता इतना अहम है तो अमेरिका पर इसका असर कम क्यों दिख रहा है? इसके पीछे अमेरिका की बदलती ऊर्जा ताकत, शेल ऑयल क्रांति और बढ़ती घरेलू तेल उत्पादन क्षमता बड़ी वजह मानी जा रही है.
Hormuz Strait Tension and US Impact: होर्मुज स्ट्रेट को लेकर दुनिया में तेल को लेकर जितनी चिंता दिखाई दे रही है, उतनी अमेरिका में नहीं दिखती. सवाल यही है कि आखिर ऐसा क्यों है? मिडिल ईस्ट में ईरान की गतिविधियों और जहाजों की आवाजाही पर बढ़ते खतरे ने दुनिया के कई देशों की नींद उड़ा दी है. भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप जैसे देश इस रास्ते पर निर्भर हैं, क्योंकि उनके लिए यही रास्ता खाड़ी से निकलने वाले तेल का सबसे बड़ा दरवाजा है. लेकिन अमेरिका का रवैया अपनी जरूरतों के लिए अपेक्षाकृत शांत दिखाई देता है. ऐसा इसलिए नहीं कि उसे इस समुद्री रास्ते की अहमियत समझ नहीं है, बल्कि इसलिए क्योंकि पिछले एक दशक में अमेरिका की ऊर्जा व्यवस्था पूरी तरह बदल चुकी है.
होर्मुज स्ट्रेट की अहमियत
अगर इस मसले को समझना है तो सबसे पहले होर्मुज स्ट्रेट की अहमियत समझनी होगी. फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित यह संकरा समुद्री रास्ता दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा कॉरिडोर में गिना जाता है. हर दिन करीब 2 करोड़ बैरल तेल यानी दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. सऊदी अरब, इराक, कुवैत, यूएई और कतर जैसे बड़े तेल उत्पादक देशों का तेल इसी मार्ग से एशिया और यूरोप की तरफ जाता है. इसलिए अगर यहां थोड़ी भी अस्थिरता पैदा होती है तो उसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.
अमेरिका को क्यों नहीं है टेंशन?
अब सवाल फिर वहीं आता है कि जब दुनिया के इतने देश परेशान हैं तो अमेरिका को ज्यादा चिंता क्यों नहीं है? इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिका की बदलती ऊर्जा ताकत है. पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल प्रोड्यूसर बन चुका है. अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन की 2024 के रिपोर्ट के मुताबिक 2026 तक अमेरिका का प्रोडक्शन लगभग 13.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकता है और 2027 तक यह करीब 13.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक जाने का अनुमान है. अमेरिका के पास करीब 83.7 अरब बैरल के प्रमाणित तेल भंडार भी हैं. सबसे बड़ा बदलाव यह है कि 2020 के बाद से अमेरिका कुल पेट्रोलियम के मामले में शुद्ध निर्यातक बन चुका है.
यानी वह जितना आयात करता है उससे ज्यादा पेट्रोलियम प्रोडक्ट निर्यात करता है. अमेरिका की शेल ऑयल क्रांति ने उसकी ऊर्जा निर्भरता को काफी कम कर दिया है. वह घरेलू स्तर पर बड़े पैमाने पर हल्का शेल ऑयल पैदा करता है और दुनिया के कई हिस्सों में इसे निर्यात भी करता है. हालांकि अमेरिका अभी भी कुछ मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है, लेकिन वह मुख्य रूप से भारी ग्रेड का तेल होता है जिसे उसकी रिफाइनरियां प्रोसेस करती हैं. इसी बीच अमेरिका अपने हल्के घरेलू शेल ऑयल को दुनिया के बाजार में बेचता है. इस ऊर्जा संरचना की वजह से होर्मुज जैसे समुद्री रास्तों पर उसकी निर्भरता पहले के मुकाबले काफी कम हो गई है.
तेल को लेकर बड़ी तैयारी में है अमेरिका!
ऊर्जा क्षेत्र में अमेरिका लगातार नए निवेश भी कर रहा है. टेक्सास के ब्राउनस्विल में करीब 160 हजार बैरल प्रतिदिन क्षमता वाली एक नई रिफाइनरी विकसित की जा रही है, जो लगभग 50 वर्षों में बनने वाली पहली नई अमेरिकी रिफाइनरी मानी जा रही है. इसके अलावा टेक्सास में करीब 300 अरब डॉलर के निवेश से एक बड़ा रिफाइनिंग प्रोजेक्ट भी विकसित किया जा रहा है जिसमें रिलायंस इंडस्ट्रीज और अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग जैसी कंपनियां शामिल हैं.
इन प्रोजेक्ट्स का उद्देश्य घरेलू शेल ऑयल को बड़े पैमाने पर प्रोसेस करना और ऊर्जा आपूर्ति को और मजबूत बनाना है. यही कारण है कि जहां भारत और कई एशियाई देश होर्मुज के संकट से सीधे प्रभावित हो सकते हैं, वहीं अमेरिका पर इसका असर अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देता है. उसके पास घरेलू उत्पादन, रणनीतिक तेल भंडार और निर्यात क्षमता का ऐसा संयोजन है जो उसे वैश्विक झटकों से काफी हद तक बचा लेता है.
होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाज देते हैं टोल?
अब एक और दिलचस्प सवाल उठता है कि क्या होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों को कोई टोल टैक्स देना पड़ता है? जवाब है नहीं. होर्मुज स्ट्रेट एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग है और इसके दोनों तरफ अलग-अलग देश मौजूद हैं. अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून यानी UNCLOS के मुताबिक ऐसे समुद्री मार्गों से गुजरने वाले जहाजों पर कोई शुल्क नहीं लगाया जा सकता. इस स्ट्रेट का प्रबंधन अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत ईरान और ओमान की समुद्री सीमाओं के बीच होता है, जबकि सुरक्षा के लिहाज से यहां अक्सर अमेरिकी नौसेना की मौजूदगी भी रहती है. UNCLOS के नियमों के मुताबिक ईरान अपनी तटरेखा से 12 समुद्री मील तक संप्रभुता रखता है, लेकिन उसे अंतरराष्ट्रीय जहाजों के सुरक्षित आवागमन की अनुमति देनी होती है. यानी वह ट्रांजिट पैसेज को पूरी तरह रोक नहीं सकता.
टोल वसूलने की कोशिश में ईरान
हालांकि ईरान की संसद में कभी-कभी ऐसा प्रस्ताव चर्चा में आता है कि इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूला जाए, क्योंकि सबसे संकरे हिस्से में यह स्ट्रेट सिर्फ 21 मील चौड़ा है और जहाजों को ईरानी जलक्षेत्र के करीब से गुजरना पड़ता है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत ऐसा करना संभव नहीं है. टोल सिर्फ उन जलमार्गों पर लगाया जा सकता है जो मानव निर्मित हों और जिनके दोनों किनारों पर एक ही देश का नियंत्रण हो, जैसे स्वेज नहर या पनामा नहर. अगर ईरान होर्मुज में टोल लगाने या जहाजों की आवाजाही रोकने की कोशिश करता है तो यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माना जाएगा और कई देशों की नौसैनिक ताकतें इसमें हस्तक्षेप कर सकती हैं.
बड़े स्तर पर इंपोर्ट करता है भारत
भारत के लिए यह रास्ता और भी ज्यादा अहम है. भारत रोजाना करीब 2.1 मिलियन बैरल कच्चा तेल इसी स्ट्रेट से होकर आने वाले रास्तों से मंगाता है, जिससे वह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा इंपोर्टर बन जाता है. इस मात्रा के साथ भारत तीसरे स्थान पर है. इस रास्ते से गुजरने वाले तेल का सबसे बड़ा आयातक चीन है. वह प्रतिदिन 5.4 मिलियन बैरल तेल इसी रास्ते से मंगाता है. भारत का ज्यादार तेल इराक के बसरा पोर्ट, सऊदी अरब के रस तनुरा और यूएई के फुजैराह जैसे टर्मिनलों से आता है. इनमें से कई पोर्ट सीधे उस इलाके में आते हैं जो होर्मुज के आसपास की जियो पॉलिटिकल हलचल से प्रभावित होते हैं. यही वजह है कि अगर इस समुद्री रास्ते में बाधा आती है तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ सकता है. जो कि मौजूदा समय में पड़ता हुआ दिख रहा है.
भारत पर दिखने लगा है असर!
इसका आर्थिक असर भी अब दिखने लगा है. फरवरी में जहां भारत का औसत क्रूड बास्केट लगभग 69 डॉलर प्रति बैरल था, वहीं मार्च की शुरुआत तक यह करीब 98 डॉलर तक पहुंच गया. यानी महज कुछ हफ्तों में करीब 42 फीसदी की बढ़ोतरी. अगर कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं और 120 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गईं तो भारत का तेल आयात बिल तेजी से बढ़ सकता है. कुछ आकलनों के मुताबिक ऐसी स्थिति में भारत का तेल व्यापार घाटा वित्त वर्ष 2027 तक बढ़कर 220 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है और चालू खाता घाटा 3 फीसदी से ऊपर जा सकता है.
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