ट्रंप टैरिफ पर कोर्ट के फैसले के बाद कंपनियों को टैक्स रिफंड का मौका! जानिए पैसा वापस लेने की पूरी प्रक्रिया और शर्तें

अमेरिका की शीर्ष अदालत के फैसले के बाद ट्रंप टैरिफ अब सवालों के घेरे में हैं. भारत समेत कई देशों से वसूले गए अरबों डॉलर के व्यापार शुल्क संभावित रिफंड के दायरे में आ गए हैं. इस फैसले से निर्यातकों को राहत मिल सकती है, लेकिन रिफंड की प्रक्रिया कैसे होगी, इस जानकारी के लिए पढ़ें रिपोर्ट.

Trump Tariff Refund Image Credit: AI Generated

ट्रंप टैरिफ के खिलाफ अमेरिकी कोर्ट के फैसले ने बाजार में कई सवाल खड़े कर दिए हैं. अदालत ने यह साफ कर दिया है कि राष्ट्रीय आपातकाल के नाम पर लगाए गए कुछ आयात शुल्क कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं थे. इस फैसले के बाद अब दुनिया के कई देशों से वसूले गए अरबों डॉलर के टैरिफ संभावित रिफंड के दायरे में आ गए हैं.यह भारत समेत कई देशों के निर्यातकों के लिए राहत की खबर है. सवाल अब यह है कि किन देशों से कितना टैक्स वसूला गया, और कंपनियां इस पैसे को वापस पाने के लिए क्या प्रक्रिया अपना सकती हैं.

ट्रंप टैरिफ पर अदालत का फैसला क्यों अहम है

ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन ने अमेरिका में राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक आपातकाल का हवाला देकर कई देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाए थे. इन टैरिफ का मकसद आयात को महंगा करना और घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना बताया गया. लेकिन अब अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट और उससे जुड़े व्यापारिक मामलों की अदालतों ने कहा है कि इन टैरिफ को लगाने की प्रक्रिया में कानूनी सीमाओं का पालन नहीं किया गया. अदालत ने साफ तौर पर यह नहीं कहा कि तुरंत सभी टैरिफ रिफंड होंगे, लेकिन यह जरूर माना कि इन टैरिफ के खिलाफ कंपनियों का दावा मजबूत है. इसी वजह से “पोटेंशियल रिफंड” की चर्चा तेज हो गई है.

किन देशों से कितना टैरिफ वसूला गया

PwC के आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2025 तक जिन टैरिफ को अब संभावित रिफंड के दायरे में माना जा रहा है, उनकी कुल रकम करीब 108 अरब डॉलर बैठती है. इसमें सबसे बड़ा हिस्सा उन देशों का है जिन पर अमेरिका ने रेसिप्रोकल यानी जवाबी टैरिफ लगाए थे. इन सभी देशों से मिलाकर लगभग 63.95 अरब डॉलर का टैरिफ वसूला गया.

चीन और हांगकांग से लिया गया टैरिफ भी बहुत बड़ा है. इन दोनों से करीब 34.19 अरब डॉलर की वसूली हुई. इसके अलावा मेक्सिको से लगभग 6.20 अरब डॉलर, कनाडा से 2.19 अरब डॉलर और ब्राजील से करीब 632 मिलियन डॉलर का टैरिफ लिया गया.

भारत की बात करें तो भारतीय निर्यात से 487.27 मिलियन डॉलर का टैरिफ वसूला गया है. जापान से भी लगभग 359.57 मिलियन डॉलर की वसूली हुई. अब ये सभी रकम उस दायरे में आ गई हैं, जिन पर कंपनियां रिफंड का दावा कर सकती हैं.

भारत के लिए इस फैसले का क्या मतलब है

भारत के कई निर्यातक, खासकर स्टील, एल्युमिनियम और इंजीनियरिंग प्रोडक्ट्स से जुड़ी कंपनियां, इन टैरिफ से प्रभावित हुई थीं. अगर रिफंड की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो इससे भारतीय कंपनियों की लागत घटेगी और उनकी बैलेंस शीट पर सीधा सकारात्मक असर पड़ेगा.

हालांकि यह फैसला राहत देने वाला है, लेकिन रिफंड अपने आप नहीं मिलेगा. अमेरिकी कानून के तहत टैरिफ रिफंड की प्रक्रिया काफी जटिल है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पहले से ही अमेरिका की कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में एक हजार से ज्यादा मुकदमे दर्ज हो चुके हैं, जिनमें कंपनियां अपने पैसे वापस मांग रही हैं. अदालत ने यह भी माना है कि रिफंड बांटना एक प्रशासनिक चुनौती हो सकती है, क्योंकि हर आयात, हर शिपमेंट और हर कंपनी का मामला अलग-अलग है.

कंपनियां रिफंड कैसे क्लेम कर सकती हैं

रॉयटर्स रिपोर्ट के मुताबिक, अगर कोई कंपनी यह मानती है कि उसने गलत तरीके से टैरिफ चुकाया है, तो उसे सबसे पहले अमेरिका की कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन एजेंसी के रिकॉर्ड के आधार पर यह साबित करना होगा कि टैरिफ का भुगतान उसी ने किया था. इसके बाद कंपनी को कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में याचिका दायर करनी पड़ सकती है. कई मामलों में आयातक को यह भी दिखाना होता है कि टैरिफ का बोझ उसने आगे ग्राहकों पर नहीं डाला, बल्कि खुद वहन किया.

एक और अहम बात यह है कि अमेरिका में “इंपोर्टर ऑफ रिकॉर्ड” की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है. वही इकाई रिफंड की हकदार मानी जाती है, जिसका नाम आधिकारिक आयात दस्तावेजों में दर्ज होता है. अगर आयात किसी और के नाम से हुआ है, तो रिफंड उसी को मिलेगा, न कि उस कंपनी को जिसने अप्रत्यक्ष रूप से लागत झेली हो.

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रिफंड में कितना समय लग सकता है

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रक्रिया जल्दी पूरी होने वाली नहीं है. कुछ मामलों में रिफंड आने में कई साल लग सकते हैं. पहले अदालतों में यह तय होगा कि कौन से टैरिफ पूरी तरह अवैध थे, फिर सरकार को यह तय करना होगा कि रिफंड किस आधार पर और किस क्रम में दिया जाए. छोटे आयातकों के लिए यह प्रक्रिया महंगी और लंबी साबित हो सकती है, जबकि बड़ी कंपनियां कानूनी खर्च उठाकर अपने दावे मजबूत कर सकती हैं.