रोजमर्रा के उल्लंघनों के लिए सजा खत्म करेगा जन विश्वास बिल 2026, मेट्रो में सिगरेट पीने पर अब नहीं होगी जेल
इसका मकसद 23 मंत्रालयों द्वारा प्रशासित 79 केंद्रीय कानूनों के तहत 717 प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर करना और 67 प्रावधानों में संशोधन करना है, ताकि लोगों का जीवन आसान हो सके.

संसद ने गुरुवार को ‘जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) विधेयक, 2026’ पारित किया. इस विधेयक का उद्देश्य विभिन्न कानूनों में कुछ प्रावधानों में संशोधन करके, छोटे-मोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से हटाना और उन्हें तर्कसंगत बनाना है, ताकि व्यापार करने और जीवन जीने में आसानी को और बढ़ावा दिया जा सके. इसका मकसद 23 मंत्रालयों द्वारा प्रशासित 79 केंद्रीय कानूनों के तहत 717 प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर करना और 67 प्रावधानों में संशोधन करना है, ताकि लोगों का जीवन आसान हो सके. यहां वह सब कुछ है जो आपको उस बिल के बारे में जानना चाहिए, जो छोटी-मोटी रेगुलेटरी गलतियों के लिए जेल की सजा को जुर्माने, चेतावनियों और एक व्यवस्थित अपील प्रक्रिया से बदल देता है.
जन विश्वास बिल 2026 क्या है?
PIB ने एक बयान में कहा कि दर्जनों केंद्रीय कानूनों में छोटी-मोटी, तकनीकी या प्रक्रिया से जुड़ी गलतियों के लिए जेल की सजा का प्रावधान था, जिसमें प्रक्रिया से जुड़ी गलतियों को असली आपराधिक अपराधों के बराबर माना जाता था. जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) विधेयक, 2026 का उद्देश्य इस स्थिति को समाप्त करना है. इसके तहत, ऐसे उल्लंघनों के लिए आपराधिक दंडों को हटाकर उनके स्थान पर नागरिक दंड, चेतावनियां और एक व्यवस्थित निर्णय प्रक्रिया लागू की जाएगी. इससे यह सुनिश्चित होगा कि नागरिकों और व्यवसायों को ऐसी गलतियों के लिए जेल न जाना पड़े, जिनसे जान-बूझकर कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया हो.
ईज ऑफ लिविंग
PIB के अनुसार, यह बिल ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ (व्यापार करने में आसानी) और ‘ईज ऑफ लिविंग’ (जीवन जीने में आसानी) को बढ़ावा देने के सरकार के प्रयासों में एक अहम पड़ाव है. साथ ही, यह भरोसे और सही अनुपात वाले रेगुलेशन पर आधारित शासन व्यवस्था को भी आगे बढ़ाता है.
इसे संसद के दोनों सदनों ने पास कर दिया है. pmindia.gov.in पर दिए गए एक बयान के अनुसार, 2 अप्रैल को इसके पास होने पर प्रतिक्रिया देते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ‘ईज ऑफ लिविंग’ (जीवन की सुगमता) और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ (व्यापार करने की सुगमता) के लिए एक बड़ा बढ़ावा बताया. उन्होंने कहा कि यह बिल उन नियमों और कानूनों को खत्म करता है जो अब पुराने हो चुके हैं और मामलों के जल्द निपटारे को सुनिश्चित करता है.
आगे चलकर कानून का पालन कैसे करवाया जाएगा?
कानून का पालन न करने पर, राज्य अब पहली प्रतिक्रिया के तौर पर आपराधिक मुकदमा चलाने के बजाय, एक क्रमबद्ध तरीका अपनाएगा. PIB के अनुसार, इस बिल में छोटे, तकनीकी या प्रक्रिया से जुड़ी गलतियों के लिए आपराधिक सजाओं से हटकर, सिविल और प्रशासनिक तरीकों से कानून का पालन करवाने पर जोर दिया गया है.
मुख्य उपायों में जेल की सजा की जगह आर्थिक जुर्माना या चेतावनी देना, पहली बार नियम तोड़ने पर चेतावनी देने जैसे अलग-अलग तरह के लागू करने के तरीके अपनाना, और अपराध की गंभीरता के हिसाब से जुर्माने और सजा को सही अनुपात में तय करना शामिल है.
आसान शब्दों में कहें तो, इसका मतलब है कि कई कैटेगरी में पहली बार गलती करने वाले को सिर्फ एक सलाह दी जाएगी. बार-बार गलती करने पर चेतावनी मिल सकती है. सिर्फ लगातार नियमों का पालन न करने पर ही सिविल पेनल्टी लगेगी और वह पेनल्टी भी किसी क्रिमिनल कोर्ट के बजाय एक तय प्रक्रिया के जरिए तय की जाएगी.
समय-सीमा के भीतर कानून का पालन सुनिश्चित करने के लिए, इस बिल में निर्णायक अधिकारियों की नियुक्ति और अपीलीय प्राधिकरणों की स्थापना का प्रावधान किया गया है. इन उपायों का उद्देश्य मामलों का त्वरित निपटारा करना और अदालतों पर मुकदमों का बोझ कम करना है, साथ ही यह सुनिश्चित करना है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन हो.
नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी में क्या बदलाव आएंगे?
कारोबार से जुड़े सुधारों के अलावा, यह बिल कुछ ऐसे खास बदलाव भी करता है जिनका सीधा असर नागरिकों पर पड़ता है. प्रेस रिलीज के मुताबिक, जिंदगी को आसान बनाने वाले 67 संशोधन नई दिल्ली म्युनिसिपल काउंसिल एक्ट, 1994 और मोटर वाहन एक्ट, 1988 से जुड़े हैं. इनका मकसद प्रक्रियाओं को आसान बनाना और नागरिकों की सुविधा बढ़ाना है.
मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत, अनुपालन से जुड़ी प्रक्रियाओं को आसान बनाया जा रहा है, जिससे छोटी-मोटी गलतियों के लिए आपराधिक दायित्व बनने की गुंजाइश कम हो जाएगी. NDMC अधिनियम, 1994 के तहत, संपत्ति कर को पुनर्गठित करके इसे अलग-अलग घटकों-भवन कर और खाली जमीन टैक्स में बांट दिया गया है.
इस कानून पर PIB द्वारा 2025 में जारी विज्ञप्ति के अनुसार, औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 और विधिक माप विज्ञान अधिनियम, 2009 उन अधिनियमों में शामिल हैं, जिनके तहत इस विधेयक के माध्यम से अपराधों को और कम करने (Decriminalisation) का प्रस्ताव है.
यह बिल कैसे तैयार किया गया?
प्रस्तावित सुधार एक व्यापक परामर्श प्रक्रिया पर आधारित हैं, जिसमें अंतर-मंत्रालयी समिति की बैठकें, NITI Aayog के तहत उच्च-स्तरीय समिति की बैठकें, उद्योग संघों और नागरिक समाज संगठनों के साथ बातचीत शामिल है.
जन विश्वास (संशोधन) विधेयक, 2025 पर बनी चयन समिति ने अकेले ही एक परामर्श प्रक्रिया पूरी की, जिसमें समिति के सदस्यों, संबंधित मंत्रालयों, बाहरी हितधारकों और विषय विशेषज्ञों के साथ 49 बैठकें शामिल थीं.
pmindia.gov.in के अनुसार, संसद द्वारा बिल पास किए जाने के बाद अपने बयान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खास तौर पर इस सलाह-मशवरे वाले तरीके का जिक्र किया. उन्होंने इसे एक अहम बात बताया और उन सभी लोगों की तारीफ की जिन्होंने इसे बनाने की प्रक्रिया में अपने सुझाव दिए.
पहल की शुरुआत
2026 का बिल, अपराध-मुक्त करने की उस मुहिम का तीसरा और सबसे बड़ा रूप है, जो 2023 से चल रही है. इस पहल की शुरुआत ‘जन विश्वास अधिनियम, 2023’ से हुई थी, जिसने 19 मंत्रालयों और विभागों द्वारा प्रशासित 42 केंद्रीय कानूनों के 183 प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था.
इसके बाद ‘जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) विधेयक, 2025’ आया, जिसे अगस्त 2025 में लोकसभा में पेश किया गया. इस विधेयक में 16 केंद्रीय कानूनों के 355 प्रावधानों में संशोधन का प्रस्ताव रखा गया था. इस विधेयक को तेजस्वी सूर्या की अध्यक्षता वाली एक ‘चयन समिति’ (Select Committee) को सौंप दिया गया.
समिति ने 49 बैठकें कीं, विचाराधीन प्रावधानों की जांच की और फिर उससे भी आगे बढ़कर, मूल प्रस्ताव से अलग 62 और केंद्रीय कानूनों में अपराध को खत्म करने की सिफारिश की. 2025 का बिल मार्च 2026 में वापस ले लिया गया, और उसकी जगह 2026 का कहीं ज्यादा व्यापक संस्करण पेश किया गया.
यह बढ़त अपने आप में एक कहानी कहती है. 2023 में 183 प्रावधान, 2025 में 355, और अब 2026 में 784. हर बार इसका दायरा बढ़ता गया, क्योंकि ज्यादा मंत्रालयों और ज्यादा कानूनों को सुधार के इस दायरे में लाया गया.
बड़ा लक्ष्य क्या है?
राज्यसभा में चर्चा का जवाब देते हुए वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि दशकों से नागरिकों पर ऐसे कानूनों के तहत शासन किया गया है, जिनकी सोच औपनिवेशिक थी, जहां न्याय के बजाय सजा को ज्यादा महत्व दिया जाता था.
उन्होंने कहा, ‘हमारा मानना है कि छोटे-मोटे अपराधों के लिए, जिनसे दूसरों या समाज को कोई नुकसान नहीं पहुंचता और जहां कानून तोड़ने की कोई जान-बूझकर की गई कोशिश नहीं होती, वहां हमें उस व्यक्ति को चेतावनी, सुधार नोटिस या छोटे जुर्माने के ज़रिए एक मौका जरूर देना चाहिए. अगर वह बार-बार वही गलती दोहराता है, तो इस सजा को बढ़ाया जा सकता है.
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