फरवरी में 11 महीने के उच्च स्तर 2.13% पर पहुंची थोक महंगाई दर, इन कारणों से आई तेजी
भारत में फरवरी में थोक महंगाई (WPI) बढ़कर 2.13% पर पहुंच गई, जो 11 महीनों का उच्च स्तर है. खाद्य कीमतों में तेजी और ईंधन महंगा होने से महंगाई बढ़ी. विशेषज्ञों के अनुसार पश्चिम एशिया तनाव के कारण ऊर्जा कीमतें बढ़ने से आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है.
भारत में थोक महंगाई दर (WPI) फरवरी महीने में बढ़कर 11 महीने के उच्च स्तर 2.13 प्रतिशत पर पहुंच गई है. सरकार द्वारा 16 मार्च को जारी आंकड़ों के अनुसार, जनवरी में यह दर 1.81 प्रतिशत थी. थोक महंगाई में यह बढ़ोतरी हाल के महीनों में खुदरा महंगाई में आई तेजी के अनुरूप है. फरवरी में खुदरा महंगाई (CPI) भी बढ़कर 3.2 प्रतिशत हो गई जो जनवरी में 2.7 प्रतिशत थी. इसमें मुख्य भूमिका खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी की रही.
प्राइमरी प्रोडक्ट्स में बढ़ी महंगाई
प्राइमरी प्रोडक्ट्स श्रेणी जिसमें कृषि उत्पाद और खनिज शामिल हैं. फरवरी के दौरान महंगाई दर सालाना आधार पर बढ़कर 3.27 प्रतिशत हो गई. जनवरी में यह 2.21 प्रतिशत और दिसंबर में केवल 0.21 प्रतिशत थी. हालांकि मासिक आधार पर इस श्रेणी में 0.52 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. इसका मुख्य कारण खाद्य वस्तुओं की कीमतों में 1.33 प्रतिशत और खनिजों में 1.21 प्रतिशत की कमी रही. वहीं कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की कीमतों में 4.17 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि नॉन-फूड प्रोडक्ट्स की कीमतों में 0.83 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई.
ईंधन की कीमतों से बढ़ सकता है दबाव
इकोनॉमिस्ट का मानना है कि आने वाले हफ्तों में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है. इसकी वजह पश्चिम एशिया में चल रहे ईरान युद्ध के कारण बढ़ती ईंधन कीमतें हैं. ईंधन महंगा होने से परिवहन, लॉजिस्टिक्स और उत्पादन लागत बढ़ जाती है, जिसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ता है.
थोक महंगाई पर वैश्विक कीमतों का असर
थोक महंगाई वैश्विक कमोडिटी कीमतों के उतार-चढ़ाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती है. इसका कारण यह है कि थोक मूल्य सूचकांक (WPI) में ईंधन, धातु, केमिकल और अन्य औद्योगिक कच्चे माल का बड़ा हिस्सा शामिल होता है. अगर कच्चे तेल या ऊर्जा की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती है तो इसका असर थोक महंगाई पर जल्दी दिखाई देता है.
पहले भी बढ़ चुकी है थोक महंगाई
इससे पहले अप्रैल 2021 से दिसंबर 2022 के बीच वैश्विक कमोडिटी कीमतों में उछाल के कारण भारत में थोक महंगाई औसतन 12.4 प्रतिशत तक पहुंच गई थी. उस समय ऊर्जा, धातु और अन्य औद्योगिक वस्तुओं की कीमतों में तेज वृद्धि देखी गई थी.
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