NSE का IPO फिर अटका! दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका से लिस्टिंग में हो सकती है देरी, जानें क्या है पूरा मामला
NSE 2016 से ही पब्लिक होने की कोशिश कर रहा है, लेकिन रेगुलेटरी जांच और पुराने विवादों के चलते यह योजना बार बार टलती रही है. दिल्ली हाई कोर्ट इस मामले पर सोमवार या इसी हफ्ते सुनवाई कर सकता है. कोर्ट का फैसला NSE की लिस्टिंग की आगे की दिशा तय कर सकता है.
स्टॉक एक्सचेंज National Stock Exchange of India यानी NSE के लंबे समय से इंतजार किए जा रहे IPO पर एक बार फिर कानूनी अड़चन आ गई है. NSE के प्रस्तावित IPO के लिए Securities and Exchange Board of India यानी सेबी द्वारा जारी नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है. यह रिट याचिका 10 फरवरी को नई दिल्ली के निवासी और पूर्व न्यायिक अधिकारी केसी अग्रवाल ने दायर की है. उन्होंने 30 जनवरी को सेबी द्वारा दी गई मंजूरी पर सवाल उठाए हैं. इससे NSE की लिस्टिंग में फिर देरी हो सकती है.
2016 से अटका है IPO
NSE 2016 से ही पब्लिक होने की कोशिश कर रहा है, लेकिन रेगुलेटरी जांच और पुराने विवादों के चलते यह योजना बार बार टलती रही है. इकॉनोमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली हाई कोर्ट इस मामले पर सोमवार या इसी हफ्ते सुनवाई कर सकता है. कोर्ट का फैसला NSE की लिस्टिंग की आगे की दिशा तय कर सकता है.
क्या है पूरा विवाद?
याचिका का मुख्य मुद्दा सेबी का कॉरपोरेट एक्शन एडजस्टमेंट यानी CAA फ्रेमवर्क है. यह नियम बोनस, स्टॉक स्प्लिट और असाधारण डिविडेंड जैसे मामलों में डेरिवेटिव ट्रेडर्स की पोजीशन को वैल्यू न्यूट्रल रखने के लिए बनाया गया था. केसी अग्रवाल का आरोप है कि NSE ने इस नियम का सही तरीके से पालन नहीं किया. उनके मुताबिक एक्सचेंज ने कीमत में तो बदलाव किया, लेकिन क्वांटिटी में एडजस्टमेंट नहीं किया. इसके बजाय डिविडेंड के बराबर रकम सीधे डेरिवेटिव ट्रेडर्स के खातों से काट ली गई, जिसमें उनका खुद का खाता भी शामिल है. उन्होंने याचिका में कहा है कि सिक्योरिटीज कॉन्ट्रैक्ट्स रेगुलेशन एक्ट के तहत डिविडेंड का हक केवल शेयरहोल्डर्स को होता है, डेरिवेटिव ट्रेडर्स को नहीं. ऐसे में यह डेबिट कानून के दायरे से बाहर है.
शिकायतों पर सुनवाई नहीं, RTI भी खारिज
अग्रवाल का कहना है कि उनकी शिकायतों को NSE ने बिना सुनवाई के बंद कर दिया. सेबी ने भी एक्सचेंज के फैसले को बिना स्वतंत्र जांच के सही ठहरा दिया. RTI के जरिए डेबिट की गई रकम की जानकारी मांगी गई, लेकिन उसे भी बार बार खारिज कर दिया गया. जनवरी 2026 तक सेबी चेयरपर्सन को भेजे गए ईमेल का भी जवाब नहीं मिला. उन्होंने सेबी से मांग की थी कि जब तक पूरे मामले की जांच न हो जाए, तब तक NSE के IPO को मंजूरी न दी जाए.
सेबी की मंजूरी पर सवाल
याचिका में कहा गया है कि कथित वैधानिक उल्लंघन, फंड फ्लो में पारदर्शिता की कमी और सिस्टम से जुड़े सवालों के बावजूद सेबी ने IPO को मंजूरी दे दी. रिट याचिका में रेगुलेटरी जवाबदेही तय करने, नियमों के पालन को लागू कराने और पब्लिक निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए अंतरिम रोक की मांग की गई है. सेबी ने इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है.
30 जनवरी को मिला था NOC
30 जनवरी को सेबी द्वारा जारी NOC के बाद NSE औपचारिक रूप से IPO प्रक्रिया शुरू कर सकता है, जिसमें मर्चेंट बैंकर और कानूनी सलाहकारों की नियुक्ति और ड्राफ्ट डॉक्युमेंट तैयार करना शामिल है. NSE का IPO भारत के सबसे लंबे समय से लंबित और सबसे ज्यादा चर्चा में रहे IPO में से एक है. पहली बार 18 अक्टूबर 2016 को आवेदन दिया गया था. शुरुआत में को लोकेशन मामले, गवर्नेंस से जुड़ी खामियों और टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर उठे सवालों के चलते मंजूरी रोकी गई थी. मार्च 2025 में तुहिन कांत पांडे ने सेबी प्रमुख का पद संभालने के बाद NSE IPO मामले की जांच के लिए एक आंतरिक समिति भी बनाई थी. अब सबकी नजर दिल्ली हाई कोर्ट की सुनवाई पर है, क्योंकि वही तय करेगी कि NSE का बहुप्रतीक्षित IPO आगे बढ़ेगा या फिर इंतजार और लंबा होगा.
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