सोना एक लेकिन टैक्स अलग-अलग, ज्वेलरी, ETF और SGB पर कितना टैक्स; समझें पूरा गणित

सोने की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर हैं और भारतीय निवेशक अलग अलग रूपों में गोल्ड खरीद रहे हैं. लेकिन टैक्स के मामले में हर गोल्ड प्रोडक्ट का नियम अलग है. ज्वेलरी और डिजिटल गोल्ड पर जीएसटी और कैपिटल गेन टैक्स लगता है, जबकि गोल्ड ईटीएफ और म्यूचुअल फंड को फाइनेंशियल एसेट माना जाता है.

भारत में सोने के प्रोडक्ट्स पर अलग-अलग टैक्स लगते हैं. Image Credit: money9live

Gold Taxation India: सोने की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर हैं और इसके साथ ही भारतीय निवेशकों का रुझान भी तेजी से बढ़ा है. आज सोना केवल गहनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक निवेश प्रोडक्ट बन चुका है. कोई ज्वेलरी खरीद रहा है, कोई गोल्ड ETF, कोई सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड तो कोई डिजिटल गोल्ड. देखने में ये सभी एक ही मेटल से जुड़े हैं, लेकिन टैक्स कानून की नजर में ये अलग- अलग एसेट हैं. यही वजह है कि सोने के हर रूप पर टैक्स का नियम अलग है और यही बात निवेशकों को सबसे ज्यादा उलझन में डालती है.

एक जैसा टैक्स क्यों नहीं

इनकम टैक्स कानून सोने को उसकी बनावट और उपयोग के आधार पर अलग- अलग कैटेगरी में बांटता है. फिजिकल गोल्ड जैसे ज्वेलरी और सिक्के को कंज्मपशन और इंवेस्टमेंट दोनों माना जाता है, इसलिए इस पर GST भी लगता है और बेचने पर कैपिटल गेन टैक्स भी. वहीं गोल्ड ETF और गोल्ड म्यूचुअल फंड को फाइनेंशियल एसेट माना जाता है, ठीक वैसे ही जैसे शेयर या डेट फंड. इसी कारण इनके टैक्स नियम अलग हैं. सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड को सरकार का उधार माना जाता है, इसलिए इसमें टैक्स छूट का फायदा मिलता है.

टैक्स क्यों लगता है ज्यादा

ज्वेलरी और डिजिटल गोल्ड खरीदते समय निवेशक सबसे पहले GST चुकाता है. इसके बाद जब इसे बेचा जाता है तो कैपिटल गेन टैक्स लगता है. अगर होल्डिंग अवधि पूरी नहीं हुई तो शॉर्ट टर्म टैक्स स्लैब के हिसाब से लगता है, जो काफी भारी हो सकता है. सरकार इन्हें सीधे धातु की खरीद मानती है, इसलिए टैक्स बोझ ज्यादा पड़ता है. यही कारण है कि सोना बेचते समय कई लोगों को असली मुनाफा उम्मीद से कम दिखता है.

सोने का प्रोडक्टGST (खरीद पर)Capital Gains Tax (बेचते समय)होल्डिंग पीरियड
फिजिकल गोल्ड (ज्वेलरी / बार / सिक्के)3% (मेकिंग चार्ज पर 5%)Short Term: आपकी आयकर स्लैब के अनुसार Long Term: 12.5% (बिना इंडेक्सेशन)24 महीने से अधिक
(Long Term)
डिजिटल गोल्ड3%Short Term: आयकर स्लैब अनुसार
Long Term: 12.5%
24 महीने से अधिक
(Long Term)
गोल्ड ईटीएफ0%Short Term: आयकर स्लैब अनुसार
Long Term: 12.5%
12 महीने से अधिक
(Long Term)
गोल्ड म्यूचुअल फंड0%Short Term: आयकर स्लैब अनुसार
Long Term: 12.5%
12 महीने से अधिक
(Long Term)
सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB)0%ब्याज सालाना टैक्स योग्य
Capital Gains
मैच्योरिटी पर 100% टैक्स फ्री
मैच्योरिटी तक
(Long Term)

गोल्ड ETF और म्यूचुअल फंड अलग क्यों हैं

गोल्ड ETF और गोल्ड म्यूचुअल फंड दिखने में सोने जैसे लगते हैं, लेकिन टैक्स के लिहाज से ये फाइनेंशियल प्रोडक्ट हैं. इनमें GST नहीं लगता, लेकिन बेचने पर कैपिटल गेन टैक्स लगता है. पहले इनमें इंडेक्सेशन का फायदा मिलता था, लेकिन अब यह खत्म हो चुका है. सरकार का तर्क है कि चूंकि ये बाजार से जुड़े निवेश साधन हैं, इसलिए इन्हें म्यूचुअल फंड की तरह टैक्स किया जाए.

सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड को खास दर्जा क्यों

सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड सरकार द्वारा जारी किए जाते हैं, इसलिए इन्हें सबसे ज्यादा टैक्स फ्रेंडली माना जाता है. इनमें सालाना ब्याज पर टैक्स लगता है, लेकिन मैच्योरिटी पर कैपिटल गेन पूरी तरह टैक्स फ्री होता है. सरकार इन्हें इसलिए बढ़ावा देती है ताकि लोग फिजिकल गोल्ड की जगह फाइनेंशियल गोल्ड में निवेश करें और देश का आयात बिल कम हो. यही वजह है कि टैक्स नियमों में इन्हें सबसे ज्यादा छूट दी गई है.

होल्डिंग पीरियड क्यों बन जाता है सबसे बड़ा जाल

सोने पर टैक्स तय करने में होल्डिंग पीरियड सबसे अहम भूमिका निभाता है. फिजिकल और डिजिटल गोल्ड में लंबी अवधि की परिभाषा अलग है, जबकि गोल्ड ETF और म्यूचुअल फंड में यह जल्दी पूरी हो जाती है. कई निवेशक कुछ महीने पहले बेच देते हैं और उनका मुनाफा शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन में चला जाता है, जिस पर ज्यादा टैक्स लगता है. यही गलती सबसे ज्यादा रिटर्न को नुकसान पहुंचाती है.

कहां निवेशक सबसे ज्यादा चूक करते हैं

अधिकांश निवेशक यह मान लेते हैं कि सभी गोल्ड प्रोडक्ट पर टैक्स एक जैसा होगा. कई लोग डिजिटल गोल्ड को टैक्स फ्री समझ लेते हैं, तो कुछ गोल्ड ETF में इंडेक्सेशन मानकर चलते हैं. ज्वेलरी की खरीद का बिल संभाल कर न रखना, GST को लागत में न जोड़ना और नियम बदले जाने की जानकारी न होना भी बड़ी गलतियां हैं. ये छोटी लगने वाली चूक बाद में बड़ा टैक्स बोझ बन जाती हैं.

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एक ही सोना पांच अलग एसेट क्यों बन जाता है

टैक्स कानून की नजर में सोना एक मेटल नहीं, बल्कि उसका फॉर्म तय करता है कि वह एसेट कैसे माना जाएगा. ज्वेलरी एक कंज्यूमर गुड्स है, डिजिटल गोल्ड एक कमोडिटी है, ETF एक फाइनेंशियल प्रोडक्ट है और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड सरकार का उधार. इसी वजह से एक ही सोना टैक्स सिस्टम में पांच अलग- अलग पहचान बना लेता है.