कमर्शियल प्रॉपर्टी का टैक्सेशन कैसे किराये की आय और निवेश रिटर्न को प्रभावित करता है, एक्सपर्ट से समझें पूरा गणित

कमर्शियल प्रॉपर्टी में निवेश से पहले उसके टैक्स नियम समझना बेहद जरूरी है. किराये की आय, लोन पर ब्याज, अलग-अलग टैक्स रेजीम और बिक्री के बाद टैक्स छूट जैसे पहलू आपकी कमाई और टैक्स प्लानिंग को सीधे प्रभावित करते हैं. सही जानकारी से बड़े टैक्स नुकसान से बचा जा सकता है.

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Commercial Property Tax Rules India: इस लेख में मैं कमर्शियल प्रॉपर्टी के टैक्सेशन के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करूंगा, जिसमें कमर्शियल प्रॉपर्टी के लिए, लिए गए लोन के टैक्स ट्रीटमेंट को भी शामिल किया गया है.

कमर्शियल प्रॉपर्टी से मिलने वाला किराया किस इनकम हेड के तहत टैक्सेबल होता है?

रेजिडेंशियल और कमर्शियल, दोनों तरह की हाउस प्रॉपर्टी से होने वाली आय, मालिक के हाथों में Income from House Property हेड के तहत टैक्सेबल होती है. इस प्रॉपर्टी से प्राप्त या प्राप्त होने की उम्मीद की जाने वाली किराये की राशि को Annual Value कहा जाता है. इस Annual Value पर कुछ तय खर्चों की कटौती के बाद टैक्स लगाया जाता है.

अगर आप उस कमर्शियल प्रॉपर्टी के मालिक नहीं हैं और उसे सबलेट करते हैं, तो सबलेटिंग से होने वाली आपकी आय Income from Other Sources हेड के तहत टैक्सेबल होगी.

अगर आप एक सही मायने में बिजनेस सेंटर चला रहे हैं और जगह किराये पर देने के साथ-साथ अन्य सेवाओं से मिलने वाली रकम कुल आय का बड़ा हिस्सा है, तो तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर इस आय को Business Income माना जा सकता है.

ऐसे मामलों को छोड़कर, कमर्शियल प्रॉपर्टी से किसी भी नाम से मिलने वाली पूरी आय इसी हेड के तहत टैक्सेबल होती है और किराये की आय के खिलाफ सिर्फ वही डिडक्शन मिलती है जो नीचे बताई गई है, इसके अलावा कोई और छूट उपलब्ध नहीं होती.

Annual Value से मिलने वाली कटौतियां

Income from House Property हेड के तहत टैक्सेबल इनकम निकालने के लिए इनकम टैक्स कानून दो तरह की कटौतियां देता है. पहली कटौती Standard Deduction है, जो Annual Value यानी प्राप्त किराये का 30 प्रतिशत होती है. यह कटौती फ्लैट रेट पर मिलती है, चाहे रिपेयर या मेंटेनेंस पर वास्तविक खर्च कुछ भी हुआ हो.

दूसरी कटौती उस ब्याज के लिए मिलती है जो कमर्शियल प्रॉपर्टी खरीदने, उसका निर्माण करने, रिपेयर या री-कंस्ट्रक्शन के लिए लिए गए लोन पर दिया गया हो. ध्यान देने वाली बात यह है कि लोन से जुड़े प्रोसेसिंग फीस या प्रीपेमेंट चार्ज भी ब्याज ही माने जाते हैं और इस डिडक्शन के लिए योग्य होते हैं.

यह ब्याज डिडक्शन किसी से भी लिए गए लोन पर मिल सकती है, चाहे वह बैंक हो, दोस्त हों या रिश्तेदार. अगर कमर्शियल प्रॉपर्टी किराये पर दी गई है, तो उसके लिए लिए गए लोन पर दिए गए पूरे ब्याज की कटौती क्लेम की जा सकती है. हालांकि, अगर आप ओल्ड टैक्स रेजीम चुनते हैं, तो House Property हेड के तहत होने वाले नुकसान में से सिर्फ 2 लाख रुपये तक का नुकसान ही उसी साल दूसरी इनकम से सेट-ऑफ किया जा सकता है.

अगर आप न्यू टैक्स रेजीम चुनते हैं, तो House Property हेड का कोई भी नुकसान उसी साल दूसरी इनकम से सेट-ऑफ करने की अनुमति नहीं होती. इसका मतलब यह है कि न्यू टैक्स रेजीम में ब्याज की कटौती केवल सभी प्रॉपर्टीज की कुल किराये की आय के 70 प्रतिशत तक ही किराये की आय के खिलाफ ली जा सकती है.

अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी के लिए दिए गए ब्याज की कटौती केवल उस साल से मिलती है, जिस साल निर्माण पूरा हो जाता है और प्रॉपर्टी का पजेशन मिल जाता है. पजेशन से पहले दिए गए ब्याज को पांच बराबर किस्तों में बांटकर, निर्माण पूरा होने वाले साल से लेकर अगले चार सालों तक क्लेम किया जा सकता है, साथ ही उस साल के चालू ब्याज के साथ.

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि कमर्शियल प्रॉपर्टी के लिए लिए गए लोन के रीपेमेंट पर Section 80C के तहत कोई डिडक्शन उपलब्ध नहीं होती. यह सुविधा केवल रेजिडेंशियल हाउस प्रॉपर्टी के लिए, वह भी ओल्ड टैक्स रेजीम में, मिलती है.

खुद के बिजनेस या प्रोफेशन में इस्तेमाल की जा रही कमर्शियल प्रॉपर्टी का टैक्स ट्रीटमेंट

अगर आप कमर्शियल प्रॉपर्टी का पूरा या आंशिक रूप से अपने बिजनेस या प्रोफेशन के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, तो उस हिस्से को Income from House Property हेड के तहत टैक्सेबल नहीं माना जाएगा. साथ ही, उस प्रॉपर्टी के लिए कोई नोटेशनल रेंट भी आपकी बिजनेस इनकम में नहीं जोड़ा जाएगा.

हालांकि, आप उस प्रॉपर्टी के रिपेयर और मेंटेनेंस पर हुए वास्तविक खर्च को अपने बिजनेस खर्च के रूप में क्लेम कर सकते हैं. इसके अलावा, उस कमर्शियल प्रॉपर्टी पर आपको डिप्रिसिएशन (मूल्यह्रास) का फायदा भी मिलता है और उसे खरीदने के लिए लिए गए लोन पर दिए गए पूरे ब्याज की कटौती भी बिजनेस इनकम में ली जा सकती है.

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कैपिटल गेन से जुड़े नियम

अगर आप कमर्शियल प्रॉपर्टी को दो साल के बाद बेचते हैं, तो होने वाला मुनाफा Long Term Capital Gain माना जाता है. ऐसे में आप Section 54F के तहत छूट ले सकते हैं, बशर्ते आप कमर्शियल प्रॉपर्टी की बिक्री से मिली नेट सेल कंसिडरेशन को तय समय सीमा के भीतर किसी रेजिडेंशियल हाउस प्रॉपर्टी में निवेश करें.

रेजिडेंशियल हाउस प्रॉपर्टी को कमर्शियल प्रॉपर्टी की बिक्री की तारीख से दो साल के भीतर खरीदा जाना चाहिए. अगर रेजिडेंशियल हाउस प्रॉपर्टी बिक्री की तारीख से एक साल पहले खरीदी गई हो, तब भी यह छूट उपलब्ध रहती है. अगर आप खुद निर्माण करते हैं या अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी बुक करते हैं, तो निर्माण बिक्री की तारीख से तीन साल के भीतर पूरा होना चाहिए.

इसके अलावा, आप Section 54EC के तहत भी छूट ले सकते हैं, अगर आप कैपिटल गेन को तय फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस के कैपिटल गेन बॉन्ड्स में निवेश करते हैं. यह निवेश बिक्री की तारीख से छह महीने के भीतर करना जरूरी होता है और इसकी अधिकतम सीमा 50 लाख रुपये है.

हालांकि, कमर्शियल प्रॉपर्टी में दोबारा निवेश करके Long Term Capital Gain पर कोई छूट उपलब्ध नहीं होती.

ऊपर दी गई चर्चा से मुझे उम्मीद है कि अब आप कमर्शियल प्रॉपर्टी के टैक्सेशन से जुड़े सभी जरूरी पहलुओं को अच्छी तरह समझ चुके होंगे.

लेखक एक टैक्स और इंवेस्टमेंट एक्सपर्ट हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं. आप उन्हें jainbalwant@gmail.com पर या ट्विटर हैंडल @jainbalwant पर संपर्क कर सकते हैं.