GPF नॉमिनी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला! 5,000 रुपये से ज्यादा की रकम के लिए सक्सेशन सर्टिफिकेट जरूरी नहीं
सरकारी कर्मचारियों से जुड़ी एक पुरानी कानूनी उलझन पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने प्रोविडेंट फंड से जुड़े अधिकारों की नई व्याख्या सामने रखी है. इस फैसले का असर केवल एक परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नॉमिनेशन, कानूनी दावों और सरकारी प्रक्रिया को लेकर बड़े स्तर पर स्पष्टता देता है.
GPF Nominee Rules: सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने सरकारी कर्मचारियों के जनरल प्रोविडेंट फंड (GPF) से जुड़े एक पुराने और उलझे नियम को साफ कर दिया है. अदालत ने साफ कहा है कि अगर किसी मृत कर्मचारी ने अपने GPF खाते के लिए वैध रूप से किसी को नॉमिनी बनाया है, तो उस नॉमिनी को पूरी राशि दी जाएगी, भले ही रकम 5,000 रुपये से ज्यादा ही क्यों न हो. इसके लिए न तो सक्सेशन सर्टिफिकेट, न प्रोबेट और न ही लेटर ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन दिखाने की कोई जरूरत होगी. यह फैसला न सिर्फ कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि सरकार और विभागों के लिए भी एक स्पष्ट दिशा तय करता है.
क्या था मामला?
यह मामला एक केंद्रीय सरकारी कर्मचारी की मौत के बाद उसके GPF बकाये को लेकर उठा. कर्मचारी ने अपने जीवन में अपने भाई परेश चंद्र मंडल को GPF खाते का एकमात्र नॉमिनी बनाया था. कर्मचारी की मृत्यु के बाद कुछ रिश्तेदारों, जिनमें भतीजे भी शामिल थे, ने इस पर आपत्ति जताई और कहा कि इतनी बड़ी राशि नॉमिनी को देने के लिए कानूनी दस्तावेज जैसे सक्सेशन सर्टिफिकेट जरूरी हैं. इसी आधार पर संबंधित विभाग ने GPF की राशि जारी करने से इनकार कर दिया.
इस फैसले से परेशान होकर नॉमिनी ने पहले सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT), कोलकाता का रुख किया. CAT ने नॉमिनी के पक्ष में फैसला दिया. इसके बाद सेंटर ने इस मामले का विरोध करते हुए, मामला कलकत्ता हाईकोर्ट लेकर गई, यहां भी फैसला नॉमिनी के पक्ष में आया. अंत में केंद्र सरकार मामला सुप्रीम कोर्ट लेकर पहुंची.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन शामिल थे, ने केंद्र सरकार की याचिका खारिज कर दी. अदालत ने अपने 7 जनवरी के आदेश में कहा कि वैध नॉमिनेशन की स्थिति में प्रोविडेंट फंड की पूरी राशि नॉमिनी को ही दी जानी चाहिए.
अदालत ने कहा कि नॉमिनी को रकम पाने का प्राथमिक अधिकार होता है. अगर सरकार की यह दलील मान ली जाए कि 5,000 रुपये से अधिक की राशि के लिए कानूनी दस्तावेज जरूरी होंगे, तो नॉमिनेशन की पूरी व्यवस्था ही बेकार हो जाएगी. नॉमिनेशन का मकसद ही यह है कि कर्मचारी की मृत्यु के बाद रकम बिना देरी और विवाद के तय व्यक्ति तक पहुंचे.
1925 में बना कानून आज के आर्थिक हालात से बेहद अलग हैं
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि 1925 में जब प्रोविडेंट फंड एक्ट बनाया गया था, तब 5,000 रुपये एक बड़ी रकम मानी जाती थी. लेकिन आज, लगभग सौ साल बाद, महंगाई और आर्थिक हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. ऐसे में उस सीमा का कोई मतलब नहीं रह गया है.
अदालत ने यह भी याद दिलाया कि केंद्र सरकार ने खुद 1960 में बनाए गए जनरल प्रोविडेंट फंड (सेंट्रल सर्विसेज) नियमों में साफ कर दिया था कि अगर वैध नॉमिनेशन है, तो रकम कितनी भी हो, नॉमिनी को दी जाएगी.
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नॉमिनी मालिक नहीं, सिर्फ ट्रस्टी
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम कानूनी बात भी साफ की. अदालत ने कहा कि नॉमिनी रकम का अंतिम मालिक नहीं होता, बल्कि वह सिर्फ रकम को हासिल करने वाला ट्रस्टी होता है. अगर किसी अन्य कानूनी वारिस के पास सक्सेशन सर्टिफिकेट, प्रोबेट या लेटर ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन है, तो वह नॉमिनी से अदालत के जरिए अपना हिस्सा मांग सकता है.
इसका मतलब यह है कि सरकार का काम सिर्फ रकम सही व्यक्ति यानी नॉमिनी को देना है. इसके बाद वारिसों के बीच अगर कोई विवाद है, तो वह निजी मामला है और अदालत में तय होगा.




