नहीं संभल रहा रुपया! RBI के हस्तक्षेप के बावजूद रिकॉर्ड लो पर, एशियाई करेंसी में सबसे खराब प्रदर्शन
अगर यह संघर्ष लंबा चलता है और तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत का करंट अकाउंट घाटा बढ़ सकता है, विकास दर धीमी हो सकती है और महंगाई बढ़ सकती है. विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी दबाव बढ़ा रही है. मार्च से मई के बीच अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 20 अरब डॉलर से अधिक की नेट बिकवाली की है.
Dollar Vs Rupee : मंगलवार को डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया. अमेरिकी-ईरान संघर्ष के कारण खाड़ी क्षेत्र में बढ़े तनाव और वैश्विक बाजारों में उथल-पुथल से सेंटीमेंट बिगड़ गया है. रुपया मंगलवार को 95.39 प्रति डॉलर तक कमजोर हो गया. इसने पिछले सप्ताह गुरुवार को बने 95.33 के अपने पुराने रिकॉर्ड लो को भी तोड़ दिया. इससे पहले 6 अप्रैल को रुपये में रिकॉर्ड तेजी देखने को मिली थी. यह 2013 के बाद सबसे बड़ी तेजी थी. यह तेजी यूं ही नहीं आई थी, बल्कि इसके पीछे RBI का हस्तक्षेप एक बड़ा कारण था. अब सवाल यह है कि RBI के बार-बार हस्तक्षेप के बावजूद रुपया क्यों लगातार गिर रहा है?
RBI की कोशिशों के बावजूद नहीं संभल रहे हालात
- भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने हाल ही में रुपये की अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए ऑफशोर डेरिवेटिव (NDF) बाजार पर कुछ प्रतिबंधों में ढील दी है. इससे पहले बैंक ने ऑनशोर फॉरवर्ड मार्केट में बैंकों की नेट ओपन पोजीशन को 100 मिलियन डॉलर तक सीमित किया था, जिससे कई ट्रेड्स को बंद करना पड़ा. इसका असर यह हुआ कि रुपये में कुछ समय के लिए मजबूत तेजी देखने को मिली थी.
- हालांकि, RBI के लगातार हस्तक्षेप के बावजूद रुपया दबाव में बना हुआ है. पिछले एक साल में रुपया 8.2 फीसदी गिर चुका है, जिससे यह एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गया है.
ये हैं चिंताएं
इस दौरान इंडोनेशियाई रुपिया और फिलीपींस पेसो जैसी अन्य एशियाई मुद्राएं भी कमजोर हुई हैं, क्योंकि मध्य पूर्व में तनावपूर्ण स्थिति और नाजुक संघर्ष विराम ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है. जानकारों का मानना है कि अगर यह संघर्ष लंबा चलता है और तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत का करंट अकाउंट घाटा बढ़ सकता है, विकास दर धीमी हो सकती है और महंगाई बढ़ सकती है.
विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी दबाव बढ़ा रही है. मार्च से मई के बीच अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 20 अरब डॉलर से अधिक की नेट बिकवाली की है.
अप्रैल के अंतिम 7 दिन में भयंकर बिकवाली
| तारीख | नेट खरीदारी (Cr.) | नेट बिक्री (Cr.) | नेट खरीद/बिक्री (Cr.) |
|---|---|---|---|
| 30 अप्रैल 2026 | 15,049.55 | 23,097.41 | -8,047.86 |
| 29 अप्रैल 2026 | 14,271.22 | 16,739.64 | -2,468.42 |
| 28 अप्रैल 2026 | 17,231.50 | 19,335.24 | -2,103.74 |
| 27 अप्रैल 2026 | 30,263.32 | 31,414.80 | -1,151.48 |
| 24 अप्रैल 2026 | 9,837.20 | 18,665.07 | -8,827.87 |
| 23 अप्रैल 2026 | 12,829.12 | 16,083.83 | -3,254.71 |
| 22 अप्रैल 2026 | 13,895.07 | 15,973.43 | -2,078.36 |
क्या है जानकारों की राय?
LKP Securities के कमोडिटी और करेंसी रिसर्च के वाइस प्रेसिडेंट जतिन त्रिवेदी ने कहा कि रुपया 95.05 के नीचे फिसल गया है, क्योंकि लगातार FII (विदेशी निवेश) की निकासी और कच्चे तेल की कीमतों का 100 डॉलर से ऊपर बने रहना मुद्रा पर दबाव बना रहा है. ऊंचे तेल दाम भारत के आयात बिल को बढ़ा रहे हैं और महंगाई की चिंता को मजबूत कर रहे हैं, जिससे रुपये में रिकवरी सीमित है. उन्होंने आगे कहा कि मौजूदा ट्रेंड कमजोर बना हुआ है, जिसमें 94.50 तत्काल रेजिस्टेंस और 95.40 निकट अवधि में महत्वपूर्ण सपोर्ट स्तर के रूप में काम कर रहे हैं.
अक्टूबर में RBI ने डॉलर की भारी बिकवाली की थी
- अक्टूबर महीने में डॉलर के मुकाबले रुपया 87–88 की रेंज में कारोबार कर रहा था, लेकिन इसके बाद इसमें लगातार गिरावट देखने को मिली. इस गिरावट के पीछे प्रमुख कारण विदेशी निवेशकों (FII) की भारतीय बाजारों से लगातार बिकवाली को माना जा रहा था. जिसके बाद रुपया गिरकर 91 के स्तर के पार चला गया था, जिसके बाद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को मुद्रा में और तेज गिरावट रोकने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा था.
- अस्थिरता को काबू में रखने के प्रयासों के तहत RBI ने अक्टूबर में बड़े पैमाने पर डॉलर बेचे थे. केंद्रीय बैंक ने इस महीने 11.88 अरब डॉलर की नेट बिकवाली की, जो दिसंबर 2024 के बाद किसी एक महीने में सबसे अधिक है. इससे पहले सितंबर में भी RBI ने 7.9 अरब डॉलर की नेट बिकवाली की थी.
ईरान तनाव और कच्चे तेल की कीमतों का असर
रुपये पर दबाव बढ़ाने में ईरान से जुड़े जियो-पॉलिटिकल टेंशन भी एक महत्वपूर्ण कारण रहे हैं. इस तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है, जिससे भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ गया है और विदेशी मुद्रा बाजार पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है.
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