पुराने मोबाइल से बनेंगे हवाई जहाज के पार्ट, जानें ई-वेस्ट में छिपा ‘सोना’? कैसे होगा कारगर
पुराने स्मार्टफोन केवल इलेक्ट्रॉनिक कचरा नहीं, बल्कि फ्यूचर की एडवांस तकनीकों के लिए कच्चा माल बन सकते हैं. विज्ञान ने यह रास्ता खोल दिया है. अब असली परीक्षा भारत के लिए उस औद्योगिक पुल को खड़ा करने की है, जो दराज में पड़े एक पुराने फोन को कॉकपिट तक पहुंचा सके.
घर के दराज में पड़ा आपका पुराना स्मार्टफोन सिर्फ बेकार सामान नहीं है. वही फोन भविष्य में किसी विमान या फाइटर जेट का अहम हिस्सा बन सकता है. वजह है ई-वेस्ट में मौजूद कीमती धातुएं, जो आधुनिक विमानन और रक्षा उद्योग के लिए बेहद जरूरी होती हैं. आइए जानते हैं कैसे.
ई-वेस्ट: बेकार नहीं, ‘अर्बन माइंस’
पारंपरिक खनन में जहां टनों चट्टानों से सीमित मात्रा में धातु निकलती है, वहीं ई-वेस्ट उच्च सांद्रता वाले खनिजों का सोर्स बन चुका है. पुराने स्मार्टफोन और बैटरियां लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे तत्वों से भरपूर होते हैं. यही तत्व माडर्न विमानन उद्योग में हल्के, मजबूत और हीट रेजिस्टेंस मिश्रधातु (alloys) तैयार करने में अहम भूमिका निभाते हैं.
दरअसल ई-वेस्ट इस मायने में खास है क्योंकि यह प्राकृतिक संसाधनों के दोबारा दोहन की बजाय पहले से निकाले गए तत्वों का दोबारा उपयोग संभव बनाता है. यानी ग्रह पहले ही जिस ऊर्जा की कीमत चुका चुका है, उसे फिर से बर्बाद किए बिना मूल्य निकाला जा सकता है.
ब्लैक मास है रीसाइक्लिंग की केंद्रीय कड़ी
लिथियम-आयन बैटरियों की रीसाइक्लिंग में “ब्लैक मास” सबसे अहम चरण बनकर उभरता है. यह एक गहरे रंग का पाउडर होता है जिसमें लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे कीमती तत्व मौजूद रहते हैं. यही वह कच्चा माल है जिससे आगे उच्च-शुद्धता वाले धातु यौगिक (metal salts) तैयार किए जाते हैं.
खनिजों को अलग करने की प्रक्रिया पारंपरिक स्मेल्टिंग से अलग है. इसमें जटिल रासायनिक और थर्मल तकनीकों का इस्तेमाल होता है, जहां धातुओं को एक-एक कर अलग किया जाता है.
एसिड बनाम केमिकल-फ्री तकनीक
खनिज रीकवर के लिए उद्योग में दो प्रमुख दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं. एक तरीका एसिड-आधारित रासायनिक प्रक्रिया है, जिसमें ब्लैक मास को कंट्रोल एसिड सॉल्यूशंस में घोलकर धातुओं को अलग किया जाता है. यह प्रक्रिया अत्यंत सटीक होती है और माइक्रो-लेवल पर नियंत्रण की मांग करती है.
दूसरा उभरता हुआ विकल्प केमिकल-फ्री या थर्मल रीसाइक्लिंग है. इसमें ऊष्मा (heat) और रिडक्शन-आधारित प्रक्रियाओं से परमाणुओं के व्यवहार को बदला जाता है, ताकि तत्व अलग-अलग चरणों (phase changes) में विभाजित हो सकें. इस पद्धति का प्रमुख लाभ पर्यावरणीय प्रभाव में कमी है, क्योंकि इसमें एसिड लीचिंग की आवश्यकता नहीं होती.
उड़ान के ‘साइलेंट हीरोज’: रेयर अर्थ मैग्नेट्स
आधुनिक विमानों की जटिल प्रणालियों में रेयर अर्थ मैग्नेट्स की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है. नियोडिमियम जैसे तत्वों से बने ये मैग्नेट हल्के होते हुए भी अत्यधिक चुंबकीय शक्ति प्रदान करते हैं. यही गुण फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम्स, सेंसर, एक्ट्यूएटर्स और हाई-स्पीड जनरेटर्स में इन्हें अपरिहार्य बनाता है. इन मैग्नेट्स के बिना विमानन प्रणालियां भारी, कम दक्ष और तकनीकी रूप से सीमित हो सकती हैं.
शुद्धता के मामले में 0.1% ही जोखिम
रीसाइकल्ड धातुओं के लिए 99.9% शुद्धता उद्योग का सामान्य मानक माना जाता है. लेकिन एयरोस्पेस और डिफेंस जैसे क्षेत्रों में यही अंतिम 0.1% निर्णायक बन जाता है. अत्यंत सूक्ष्म अशुद्धियां उच्च तापमान, कंपन और लगातार तनाव की स्थितियों में धातु की संरचना को कमजोर कर सकती हैं. धातु के क्रिस्टल लैटिस में विदेशी परमाणुओं की उपस्थिति माइक्रोस्कोपिक कमजोर बिंदु (weak points) बना सकती है, जो वास्तविक उड़ान परिस्थितियों में विफलता का कारण बन सकते हैं.
मैग्नेट्स का ‘फायर रीबर्थ’
रेयर अर्थ मैग्नेट्स की पुनर्स्थापना (restoration) के लिए उच्च तापमान पर थर्मल प्रोसेसिंग का उपयोग किया जाता है. लगभग 900 डिग्री सेल्सियस पर सामग्री के भीतर संरचनात्मक बदलाव होते हैं, जिससे माइक्रो-क्रैक्स भर सकते हैं और चुंबकीय गुणों की पुनर्बहाली संभव होती है. हालांकि, यह प्रक्रिया अत्यंत संवेदनशील है. तापमान नियंत्रण में मामूली त्रुटि से ऑक्सिडेशन का जोखिम बढ़ जाता है, जिससे मैग्नेट पूरी तरह निष्प्रभावी पाउडर में बदल सकते हैं.
जेट इंजन की गर्मी और ‘एटॉमिक हीट शील्ड’
नियोडिमियम मैग्नेट्स की कार्यक्षमता एक निश्चित तापमान, यानी Curie Point, के बाद घटने लगती है. जेट इंजन जैसे उच्च तापमान वाले वातावरण में टिके रहने के लिए मैग्नेट्स में डिस्प्रोसियम जैसे तत्वों का उपयोग किया जाता है.
डिस्प्रोसियम मैग्नेट की कोएर्सिविटी बढ़ाता है, जिससे उच्च तापमान में भी चुंबकीय गुण स्थिर रह सकें.
विज्ञान मौजूद, पर ‘डोमेस्टिक किचन’ गायब
भारत में खनिज रिकवरी और रीसाइक्लिंग तकनीक तेजी से विकसित हो रही है. लेकिन असली समस्या डाउनस्ट्रीम मैन्युफैक्चरिंग में दिखाई देती है. देश में अभी बड़े पैमाने पर सेल मैन्युफैक्चरिंग या रेयर अर्थ मैग्नेट उत्पादन संयंत्रों की कमी है.
इसका परिणाम यह है कि बैटरियों को ब्लैक मास में बदलने के बाद अधिकांश सामग्री निर्यात कर दी जाती है.
‘लूप क्लोजिंग’ ही असली गेम-चेंजर
वैश्विक स्तर पर सफल मॉडल वही रहे हैं जहां रीसाइक्लिंग से लेकर अंतिम उत्पाद निर्माण तक पूरा चक्र घरेलू स्तर पर नियंत्रित किया गया. जब तक भारत रिकवरी, रिफाइनिंग और मैन्युफैक्चरिंग के बीच की इस कड़ी को नहीं जोड़ता, तब तक “अर्बन गोल्ड” का वास्तविक आर्थिक और रणनीतिक लाभ सीमित रहेगा.
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