वेनेजुएला में चीन का 2.1 अरब डॉलर फंसा! मादुरो के हटते ही तेल से लेकर टेलीकॉम सेक्टर तक मंडराया संकट

वेनेजुएला में सत्ता बदलाव के बाद चीन के निवेश पर अनिश्चितता बढ़ गई है. चीन ने तेल सेक्टर में 2.1 अरब डॉलर का दांव लगा रखा हैं और रोज 4.7 लाख बैरल तेल खरीदता है. राष्ट्रपति मादुरो के हटने से चीनी समझौतों, कर्ज व टेलीकॉम निवेश की समीक्षा संभव है. अब अमेरिका के अगले मूव पर दुनिया की नजर बनी हुई है.

वेनेजुएला में चीन का निवेश Image Credit: news9

अमेरिका की सैन्य कार्रवाई में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलेस मादुरो के हटाए जाने के बाद लैटिन अमेरिका में चीन के सबसे अहम आर्थिक साझेदारों में से एक को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है. वर्षों से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और आर्थिक संकट से जूझ रहे वेनेजुएला में चीन उन चुनिंदा देशों में रहा है, जिसने लगातार निवेश और खरीद के जरिए अपनी मौजूदगी बनाए रखी. अब सवाल यह है कि चीन का कितना निवेश दांव पर है, किन सेक्टरों में उसकी हिस्सेदारी है और बीजिंग इस पूरे घटनाक्रम को कैसे देख रहा है?

वेनेजुएला में चीन का कितना निवेश

ऊर्जा क्षेत्र वेनेजुएला में चीन के निवेश की सबसे मजबूत कड़ी रहा है. रॉयटर्स और अन्य रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2016 के बाद से चीनी कंपनियों ने वेनेजुएला के तेल सेक्टर में करीब 2.1 अरब डॉलर का निवेश किया है. इसके अलावा चीन, वेनेजुएला के कच्चे तेल का एक बड़ा खरीदार भी है. 2025 में चीन ने औसतन करीब 4.7 लाख बैरल प्रतिदिन वेनेजुएला का तेल आयात किया, जो उसके समुद्री कच्चे तेल आयात का लगभग 4.5% है. इस तेल का एक हिस्सा वेनेजुएला के चीन पर बकाया 10 अरब डॉलर से ज्यादा के कर्ज चुकाने में भी इस्तेमाल होता रहा है. चीन की सरकारी कंपनियां China National Petroleum Corporation और Sinopec वेनेजुएला में सबसे बड़े विदेशी तेल अधिकार भंडार की हिस्सेदार हैं- CNPC के पास करीब 1.6 अरब बैरल और साइनोपेक के पास 2.8 अरब बैरल से जुड़े अधिकार बताए जाते हैं.

टेलीकॉम सेक्टर में भी गहरी पैठ

तेल के अलावा वेनेजुएला में टेलीकॉम सेक्टर में भी चीन की गहरी पैठ है. चीनी कंपनियों ने वेनेजुएला के फाइबर नेटवर्क, 4G सेवाओं और डिजिटल पहचान प्रणालियों के विकास में अहम भूमिका निभाई है. इंफ्रास्ट्रक्चर के मोर्चे पर भी चीन ने बंदरगाहों और अन्य परियोजनाओं में निवेश किया, हालांकि हाल के वर्षों में आर्थिक हालात बिगड़ने से नई परियोजनाएं धीमी पड़ गई थीं. निजी क्षेत्र की कुछ चीनी कंपनियां अब भी तेल उत्पादन और सेवाओं से जुड़े प्रोजेक्ट्स में सक्रिय हैं, जिनमें अरब डॉलर के निवेश की योजनाएं शामिल हैं.

चीन पर असर

मादुरो के हटने के बाद इन निवेशों पर असर पड़ने की आशंका है. अमेरिका समर्थित कोई नई सरकार सीधे तौर पर चीनी परिसंपत्तियों का राष्ट्रीयकरण नहीं करेगी, क्योंकि इससे पश्चिमी निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है. हालांकि मादुरो काल में हुए समझौतों की समीक्षा, शर्तों में बदलाव या चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी घटाने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं. खास तौर पर टेलीकॉम सेक्टर को ज्यादा संवेदनशील माना जा रहा है, जहां राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर चीनी तकनीक पर सवाल उठ सकते हैं.

बीजिंग इस पूरे घटनाक्रम को दोहरे नजरिये से देख रहा है. सार्वजनिक तौर पर चीन अमेरिका की कार्रवाई को संप्रभुता के उल्लंघन के तौर पर पेश कर रहा है और इसे अपनी ‘एकतरफा ताकत’ के खिलाफ नैरेटिव को मजबूत करने का मौका मानता है लेकिन रणनीतिक स्तर पर मादुरो का हटना चीन के लिए झटका भी है. क्योंकि वेनेजुएला दशकों से लैटिन अमेरिका में उसका करीबी सहयोगी रहा है. कुल मिलाकर, यह घटनाक्रम चीन के लिए कूटनीतिक बयानबाजी में भले ही अवसर बने, लेकिन उसके अरबों डॉलर के निवेश और क्षेत्रीय प्रभाव पर अनिश्चितता की छाया भी डाल रहा है.

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