ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर क्यों लिया यू-टर्न, नाटो बिखरने का डर या सहयोगियों का दबाव; जानें इनसाइड स्टोरी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर सैन्य कार्रवाई से पीछे हटने का फैसला किया है. रिपोर्ट के मुताबिक व्हाइट हाउस के वरिष्ठ सहयोगियों ने इस कदम का विरोध किया था. नाटो सहयोगियों के साथ रिश्ते बिगड़ने, यूरोप पर टैरिफ से बाजार में बेचैनी और कूटनीतिक जोखिम इस फैसले की बड़ी वजह बने.
Donald Trump Greenland: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर अपने आक्रामक रुख से अचानक यू टर्न ले लिया है. कई हफ्तों तक सैन्य कार्रवाई से इनकार न करने और यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाने की धमकी देने के बाद ट्रंप ने अब साफ कर दिया है कि अमेरिका ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए ताकत का इस्तेमाल नहीं करेगा. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान यह ऐलान ऐसे समय आया जब व्हाइट हाउस के भीतर मतभेद, नाटो सहयोगियों की नाराजगी और बाजार की बेचैनी लगातार बढ़ रही थी.
ग्रीनलैंड पर सैन्य ताकत का इस्तेमाल न करने का ट्रंप का फैसला कई कारणों का नतीजा है. व्हाइट हाउस के भीतर विरोध, नाटो सहयोगियों का दबाव, बाजार की चिंता और रणनीतिक हकीकत ने मिलकर इस फैसले को आकार दिया. यह मामला दिखाता है कि आक्रामक बयानबाजी के बावजूद ट्रंप प्रशासन आखिरकार व्यावहारिक और कूटनीतिक रास्ता अपनाने को मजबूर हुआ.
व्हाइट हाउस के भीतर बढ़ता विरोध
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप के कई वरिष्ठ सहयोगी शुरू से ही सैन्य विकल्प के पक्ष में नहीं थे. उन्हें आशंका थी कि ग्रीनलैंड जैसे संवेदनशील इलाके में ताकत का इस्तेमाल अमेरिका को अपने ही सहयोगियों से टकराव की ओर ले जा सकता है. अंदरूनी बैठकों में ज्यादातर अधिकारी टकराव की बजाय बातचीत और कूटनीतिक समाधान पर जोर दे रहे थे. यही वजह रही कि ट्रंप के रुख को धीरे-धीरे नरम किया गया.
नाटो सहयोगियों के साथ रिश्तों का खतरा
ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और नाटो के दायरे में आता है. ऐसे में वहां सैन्य कार्रवाई करना अमेरिका के लिए बेहद जटिल स्थिति पैदा कर सकता था. यूरोपीय देशों ने साफ संकेत दिया था कि इस तरह का कदम ट्रांस अटलांटिक रिश्तों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है. डच और इटैलियन नेताओं ने ट्रंप के फैसले का स्वागत किया, जिससे यह साफ हुआ कि सहयोगी देशों का दबाव इस फैसले में अहम रहा.
टैरिफ और बाजार की बढ़ती चिंता
ग्रीनलैंड से जुड़ी धमकियों के साथ ट्रंप द्वारा यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाने की चेतावनी ने वित्तीय बाजारों में बेचैनी बढ़ा दी थी. जानकारों ने चेताया था कि अमेरिका और यूरोप के बीच ट्रेड वॉर से दोनों की अर्थव्यवस्था को नुकसान हो सकता है. बाजार की इस नेगेटिव रिएक्शन ने भी प्रशासन को सतर्क किया और टैरिफ के साथ सैन्य विकल्प पर दोबारा सोचने को मजबूर किया.
जबरदस्ती की जरूरत नहीं
अमेरिका को पहले से ही ग्रीनलैंड में रणनीतिक बढ़त हासिल है. डेनमार्क के साथ 1951 का समझौता अमेरिका को वहां सुरक्षा से जुड़े व्यापक अधिकार देता है और पहले से अमेरिकी सैन्य बेस भी मौजूद है. ऐसे में जबरन कब्जा करने का कोई ठोस कारण नहीं बनता. व्हाइट हाउस के कई अधिकारियों का मानना था कि बातचीत के जरिये अमेरिका अपने हित कम जोखिम और कम लागत में हासिल कर सकता है.
ट्रंप पॉलिसी का पुराना पैटर्न
ग्रीनलैंड मामला ट्रंप की दूसरी पारी की एक जानी पहचानी रणनीति को भी दिखाता है. पहले कड़े बयान और धमकी, फिर दबाव बढ़ने पर रुख में बदलाव. टैरिफ से लेकर विदेश नीति तक ट्रंप पहले भी इस तरह का रवैया अपनाते रहे हैं. ग्रीनलैंड पर सैन्य कार्रवाई से पीछे हटना इसी पैटर्न का ताजा उदाहरण माना जा रहा है.
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